Friday, May 15, 2026
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अपनी चिंताएं ईश्वर को सौंप दें

Sanskar 8

चंद्र प्रभा सूद |

हम सब जानते हैं कि चिंता करने से कोई लाभ नहीं होता। इसके समान शरीर को सुखाने वाली और कोई वस्तु नहीं है। होनी तो होकर ही रहती है और हमारे कहने से वह टलने वाली भी नहीं है। फिर भी यह इंसानी कमजोरी है जो हर पल मनुष्य को घेर कर रखती है। उसका सुख-चैन सब हर लेती है। यद्यपि घर-परिवार के सदस्यों का एक दूसरे के प्रति चिन्तित रहना उनके परस्पर प्रेम का परिचायक है। तथापि अनावश्यक चिंता कभी-कभी अकारण ही विवाद का रूप ले लेती है। आजकल बच्चे-बड़े सभी इसे अपने कार्यों में दखलअंदाजी समझते हैं। वे सोचते हैं कि हम समझदार हो गए हैं फिर हम किसी के प्रति जवाबदेह क्यों
पद्मपुराण का कहना है कि कुटुम्ब की चिन्ता से ग्रसित व्यक्ति के श्रुत ज्ञान, शील और गुण उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जिस प्रकार कच्चे घड़े में रखा हुआ जल।
चिन्ता के कई कारण हैं-बच्चों की पढ़ाई, उनका सेटल होना, शादी, स्वास्थ्य, किसी सदस्य का घर देर से आना, पड़ोसी की समृद्धि या उनके घर कोई नई वस्तु का आना, धन-समृद्धि की कमी अथवा घर में खटपट रहना आदि। हमारे नेताओं को देखिए जिन्हें देश की बहुत चिंता रहती है। व्यवसायियों को हमेशा कर्मचारियों और हर प्रकार के टैक्स की चिन्ता रहती है जो स्वाभाविक भी है। भूतकाल में जो हो चुका है उसे छोड़ देना चाहिए। उससे शिक्षा अवश्य लेनी चाहिए पर उसको पकडकर घुलते रहना या चिन्ता करना बुद्धिमानी नहीं कहलाती।
इसी प्रकार भविष्य के गर्भ में क्या है? कोई भी सांसारिक व्यक्ति नहीं जानता। इसलिए उसे ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए। नाहक चिन्ता करके सभी परिजनों को कभी व्यथित नहीं करना चाहिए। अत: भविष्य में आने वाले संभावित अनिष्टों की चिन्ता करने वालों की शांति भंग हो जाती है। बस केवल उसी के विषय में विचार कीजिए जो हमारे सामने प्रत्यक्ष विद्यमान है। वर्तमान की तथाकथित चिन्ता ही बहुत है संतप्त रहने के लिए।
मनुष्य को नदी की तरह गंभीर होना चाहिए। नदी को पार करने में जो मनुष्य लगा हुआ है वह जल की गहराई की चिन्ता कभी नहीं करता। उसी तरह जिस व्यक्ति का चित्त स्थिर है वह इस संसार सागर के नाना विध कष्टों का सामना करने पर भी उनसे नहीं घबराता। उनका दृढ़ता पूर्वक सामना करता है। यह सिद्धांत हमेशा स्मरण रखिए कि समय से पहले और भाग्य से अधिक न किसी को मिला है और न ही मिलेगा। फिर हमारे कर्म प्रधान हैं जो हमें सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय, सुख एवं समृद्धि देते हैं। तो फिर चिन्ता करके बदहाल क्यों होना अपनी सारी चिंताएं उस जगत जननी माता के हवाले करके निश्चिंत हो जाइए जैसे बच्चे अपनी माता से अपने दुख बांट कर चैन की नींद सो जाते हैं। शेष ईश्वर सब शुभ करेगा।
भाग्य के अनुसार समय पर ही मिलता है
ईश्वर के साथ चाल चलने में किसी तरह का कोई आनन्द नहीं आता। अपने को मनुष्य कितना भी तीस मारखां क्यों न समझ ले हार तो उसी के खाते में ही आती है। उस मालिक से जीत जाना या पार पा सकना इस क्षुद्र मनुष्य नामक जीव के बस की बात नहीं है। मनुष्य तो गलतियों का पुतला है। वह कितना ही चौकस क्यों न रह ले, अवश्य ही कहीं-न-कहीं चूक कर देगा। यहां उसकी मात सौ प्रतिशत निश्चित होती है। मनुष्य को उसके भाग्य के अनुसार समय पर ही मिलता है। न उससे रत्ती भर कम और न ही उससे अधिक। उसके भाग्य में जो होता हैं वह बिना कहे ही पता नहीं कैसे भी करके उसके पास आ जाता है परन्तु जो उसके भाग्य में नही होता, वह उसके पास आकर भी हाथ से निकल जाता है। वह बस मूक दर्शक की तरह देखता रहता है और बिलबिलाता रह जाता है।
बचपन में एक कथा सुनी थी कि किसी राजा की एक बेटी ने उससे कहा था कि पिता उसे नमक की तरह अच्छा लगता है तो वह नाराज हो गया था। पिता ने उस नाराजगी के कारण उसे दंड देने का निश्चय किया। राजा ने उसकी शादी एक राह चलते किसी भिखारी जैसे दिखने वाले किसी इंसान से करवा दी। मां तो आखिर मां होती है, उसे बेटी के दुर्भाग्य पर बहुत रोना आया। उसने राजा से छिपाकर कुछ धन उसे दे दिया ताकि उसे शादी के एकदम बाद उसे किसी तरह से परेशान न होना पड़े। राजकुमारी बहुत हिम्मत वाली थी। उसने हार नहीं मानी और अपने पति के साथ मिलकर बहुत श्रम किया। अन्तत: उन्होंने अपना मनचाहा प्राप्त कर लिया। यानी एक सुन्दर-सा महल बना लिया और अपने राजसी ठाठ-बाठ जुटा लिए। फिर एक दिन बिना अपना परिचय दिए, पति को भेजकर अपने पिता को भोजन के लिए आमंत्रण भिजवा दिया। पिता बेटी का वह ऐश्वर्य देखकर प्रभावित हुए बिना न रह सका। अब भोजन करने की बारी थी। सामने न आते हुए बेटी ने बहुत सारे व्यंजन खाने के लिए भेजे। उनमें एक भी नमकीन खाद्य नहीं था। राजा इतने सारे मीठे व्यंजन खाकर उकता गया और पूछ बैठा कि नमकीन कुछ भी नहीं है क्या
तब वह बेटी बाहर आई और पिता से बोली कि मैं आपकी वही बेटी हूं जिसने आपको कहा था कि आप मुझे नमक की तरह अच्छे लगते हो तो आपने मुझे घर से बाहर निकाल दिया था। केवल मीठा कोई नहीं खा सकता पर नमकीन कितना भी हो खाया जा सकता है। जब तक मीठे के साथ नमकीन न हो तो वह नहीं खाया जा सकता। उसकी बात सुनकर पिता को अपनी उस गलती का अहसास हुआ और पश्चाताप भी। उसने बेटी से अपने उस कुकृत्य के लिए क्षमा मांगी और उसे अपने गले से लगा लिया।
कहने का तात्पर्य यही है कि जब राजकुमारी के भाग्य में नहीं था तो राजा की बेटी होते हुए भी सभी सुखों-ऐश्वर्यों से उसे वंचित होना पड़ा। इससे भी बढ़कर मां के द्वारा गई सहायता भी उसके काम न आ सकी। जब भाग्य देने पर आया तो उसने उस राजकुमारी को सब कुछ दे दिया और मालामाल कर दिया।


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