
जावेद अनीस |
यह भारतीय राजनीति और समाज के लिए भारी उठापटक भरा दौर है, साल 2014 के बाद से एक राष्ट्र और समाज के तौर पर भारत को पुनर्परिभाषित करने के सुव्यवस्थित प्रयास किए गए हैं, जाहिर है इससे फिल्में भी अछूती नहीं हैं। इस दौरान हिन्दुस्तान का सॉफ्ट पॉवर कहा जाने वाला हिंदी सिनेमा को सॉफ्ट टारगेट बनाया गया, कभी देवताओं की तरह पूजे जाने वाले उसके सितारों को घृणा और बायकॉट अभियानों का शिकार बनाया गया, हिंदी सिनेमा को हिन्दू-मुस्लिम के साम्प्रदायिक बहस के चपेट में ढकेला गया। देश में अचानक ऐसी फिल्मों की बाढ़ आ गयी जिसमें मुसलमानों,वामपंथियों और उदारवादियों को खलनायक के तौर पर पेश किया गया है। इन सबका जुड़ाव 2014 के भगवा उभार, बॉलीवुड में खान सितारों के वर्चस्व व फिल्मी दुनिया की धर्मनिरपेक्ष मिजाज से है जो हिन्दुत्वादीयों को कभी भी रास नहीं आयी।
दरअसल पिछले दस वर्षों में हिंदी सिनेमा को सांस्कृतिक वर्चस्व की लड़ाई का मैदान बना दिया है। इसके पीछे कई कारण हैं, इसमें कोई संदेह नहीं कि आजादी के बाद दशकों तक भारतीय सिनेमा पर नेहरुवादी समाजवाद और वामपंथी प्रभाव रहा है। अब सत्ता के केंद्र में आने के बाद हिन्दुत्वादी ताकतें सिनेमा के इस सॉफ्ट पॉवर की सीधे तौर पर नियंत्रित करते हुये इसका अपने तरीके से उपयोग करना चाहती हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जो खुद को एक सांस्कृतिक संगठन के तौर पर पर पेश करता है, बॉलीवुड को धर्मनिरपेक्षता के गढ़ के रूप में देखता रहा है और लम्बे समय से इसके मिजाज को बदलने का मंसूबा पाले हुये हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तीन मई को कर्नाटक में एक चुनावी जनसभा में ‘द केरल स्टोरीह्ण का जिक्र करते हुये कहा कि इस फिल्म में केरल में चल रही ‘आतंकी साजिशह्ण (लव जिहाद) का खुलासा किया गया। इससे पूर्व फरवरी 2024 में प्रधानमंत्री जम्मू कश्मीर की एक सभा में लोगों को ’आर्टिकल 370’ फिल्म देखने की सलाह देते हुये कह चुके हैं कि ‘मैंने सुना है कि ’इस हफ्ते ‘आर्टिकल 370‘ पर एक फिल्म रिलीज होने वाली हैङ्घ ये अच्छी बात है, क्योंकि इससे लोगों को सही जानकारी हासिल करने में मदद मिलेगी’ दरअसल पिछले एक दशक में हिन्दुत्वादी एजेंडे पर आधरित फिल्मों को भाजपा के केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा जबरदस्त तरीके से प्रचार किया जाता रहा है जिसमें प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक शामिल रहते हैं।
लेकिन 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का एक खेमा संघ और भाजपा विचारधारा पर केन्द्रित ऐसी फिल्मों का निर्माण कर रहा है जो बहुत ही खुले तौर पर साम्प्रदायिक विभाजन के नैरेटिव को बढ़ावा देती हैं। इन फिल्मों के फेहरिस्त में द एक्सिडेन्टल प्राइम मिनिस्टर, द केरला स्टोरी, द कश्मीर फाइल्स, पीएम नरेन्द्र मोदी, 72 हूरें, द वैक्सीन वार, मैं अटल हूं, वीर सावरकर, आर्टिकल 370, बस्तर-द नक्सल स्टोरी जैसी फिल्में प्रमुख रूप से शामिल हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले ाास्तर द नक्सल स्टोरी’ रिलीज हुई जिसको लेकर दावा किया गया है कि फिल्म पिछले 60 वर्षों से भारत में व्याप्त माओवाद-नक्सलवाद वामपंथ के गहरे गठजोड़ को उजागर करती है, फिल्म के निर्देशक सुदीप्तो सेन हैं जिनकी पिछली फिल्म ‘द केरला स्टोरी’ भी काफी विवादित रही थी। इसी प्रकार से ‘जेएनयू: जहांगीर नेशनल यूनिवर्सिटी’ 5 अप्रैल को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली थी, जिसे बाद में स्थगित कर दिया गया, इसी प्रकार से गोधरा कांड पर बनी फिल्म ‘एक्सीडेंट आॅर कॉन्सपिरेसी गोधरा’ जो इस साल मार्च को रिलीज होने वाली थी, सेंसर बोर्ड सर्टिफिकेट ना मिलने की वजह से तय समय रिलीज नहीं हो पाई।
कुछ और फिल्में भी लाईन में हैं जिसमें ‘रजाकर: साइलेंट जेनोसाइड आॅफ हैदराबाद’ प्रमुख रूप से शामिल है जिसका निर्माण भाजपा तेलंगाना राज्य कार्यकारी समिति के सदस्य, गुडुर नारायण रेड्डी द्वारा किया गया है। इसके अलावा दीनदयाल उपाध्याय, आरएसएस के संस्थापक डॉ।हेडगेवार की जीवनी पर भी फिल्में बन रही हैं।
लेकिन इन तमाम प्रयासों के बावजूद बॉलीवुड की पुरानी जमीन अभी भी बची हुई है, इस दिशा में साल 2023 के शुरू में रिलीज हुई फिल्म ‘पठान’ ने बॉयकॉट अभियान के चक्रव्यूह को तोड़ने का काम किया है और एक प्रकार से मुश्किल में पड़े बॉलीवुड के वापसी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हैं। इस फिल्म ने एक प्रकार से बॉलीवुड को लेकर बनाये गये खास नैरेटिव को तोड़ने का काम किया। शायद इसी वजह से फिल्मकार अनुराग कश्यप ने पठान की सफलता को सोशियो-पॉलिटिकल उल्लास बताया था।
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने 2013 में अपने सौ साल पूरे कर लिए थे। अपने तमाम सीमाओं के बावजूद पूरी दुनिया में इसकी पहचान अपनी खास तरह की फिल्मों के लिए है। यह हमारे उन चंद पेशेवर स्थानों में है जो समावेशी हैं और जिनका दरवाजा सभी के लिये खुला है। यही बात बहुसंख्यक दक्षिणपंथियों को हमेशा से ही खटकता रहा है। इसलिए आज वे बॉलीवुड को भी अपना भोंपू बना लेना चाहते हैं और इसके लिए वे हर हथकंडा अपना रहे हैं। आने वाले समय मे बॉलीवुड पर नियंत्रण के प्रयास और तेज होंगें लेकिन अपनी पहचान और अस्तित्व बनाए रखने के लिए उसके पास कोई और चारा भी तो नहीं है।


