Saturday, June 15, 2024
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बुध-गुरु आदित्य योग में होली, प्रदोषकाल में पाताल वासिनी भद्रा

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  • होली का धार्मिक उत्सव बुराई पर अच्छाई की जीत का होता है प्रतीक
  • शास्त्रीय मान्यता में होली पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है प्रदोष काल

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक होली का धार्मिक उत्सव बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। यह त्योहार हिंदू कैलेंडर में फाल्गुन पूर्णिमा व उसके अगले दिन मनाया जाता है। फाल्गुन पूर्णिमा पर 17 मार्च को होलिका का पूजन होगा। शास्त्रीय मान्यता में होली पूजन के लिए प्रदोष काल सर्वश्रेष्ठ है। इस बार होली बुध-गुरु आदित्य योग की साक्षी में आ रही है। प्रदोष काल में पाताल वासिनी भद्रा भी रहेगी। धर्मशास्त्र के जानकारों का मत है कि इस विशिष्ट योग में परिवार की सुख शांति तथा संतान के दीर्घायु जीवन के लिए होलिका का पूजन करना शुभफल प्रदान करेगा।

ज्योतिषाचार्य अमित गुप्ता ने बताया फाल्गुन पूर्णिमा 17 मार्च को गुरुवार के दिन पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र, शूल योग, वाणिज्य उपरांत बव करण तथा कन्या राशि के चंद्रमा की साक्षी में आ रही है। खास बात यह है कि होली पर दोपहर 1 बजकर 31 मिनट से रात 1 बज कर 10 मिनट तक पाताल वासिनी भद्रा रहेगी। आमतौर पर भद्रा में शुभ व मांगलिक कार्य निषेध माने गए हैं, लेकिन पाताल वासिनी भद्रा में होलिका का पूजन धन दायक माना गया है। इस दिन प्रदोष काल में शाम 6 बजकर 40 से रात 8 बजकर 45 तक पूजन का सर्वश्रेष्ठ समय रहेगा।

बुध-गुरु आदित्य योग विशेष फलदायी

पंचांगीय गणना के अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा के दिन कुंभ राशि पर सूर्य, बुध व गुरु का गोचर रहेगा। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य का शनि की राशि पर परिभ्रमण साधना व आराधना के लिए सर्वोत्तम बताया गया है साथ ही गोचर में बुध व गुरु भी युतित हो तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।

होलिका दहन कथा

जहां एक तरफ जैमिनी सूत्र में इसका आरम्भिक शब्द रूप होलाका बताया गया हैं, वहीं हेमाद्रि, कालविवेक में होलिका को हुताशनी कहा गया है। वहीं भारतीय इतिहास में इस दिन को भक्त प्रहलाद की जीत से जोड़कर देखा जाता है। शास्त्रों में इस दिन होली मनाने के पीछे कई पौराणिक कथा दी गई हैं, लेकिन इन सबमें सबसे ज्यादा भक्त प्रहलाद और हिरण्यकश्यप की कहानी प्रचलित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को बुराई पर अच्छाई की जीत को याद करते हुए होलिका दहन किया जाता है।

कथा के अनुसार असुर हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था, लेकिन यह बात हिरण्यकश्यप को बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थी। बालक प्रह्लाद को भगवान कि भक्ति से विमुख करने का कार्य उसने अपनी बहन होलिका को सौंपा जिसके पास वरदान था कि अग्नि उसके शरीर को जला नहीं सकती। भक्तराज प्रह्लाद को मारने के उद्देश्य से होलिका उन्हें अपनी गोद में लेकर अग्नि में प्रविष्ट हो गयी, लेकिन प्रह्लाद की भक्ति के प्रताप और भगवान के फलस्वरूप खुद होलिका ही आग में जल गई। अग्नि में प्रह्लाद के शरीर को कोई नुकसान नहीं हुआ। इस प्रकार होली का यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है।

होलिका दहन शुभ मुहूर्त

  • होली शुक्रवार मार्च 18 को
  • होलिका दहन बृहस्पतिवार मार्च 17 को
  • पूर्णिमा तिथि प्रारंभ मार्च 17 को 1 बजकर 29 मिनट से
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त मार्च 18 को 12 बजकर 47 मिनट पर
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