Tuesday, April 21, 2026
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धर्मग्रंथों की समीक्षा के निहितार्थ

SAMVAD


01 18जाति भगवान ने नहीं, पंडितों ने बनाई है’ जैसे बयान के बाद उठ खड़ा हुआ तूफान अभी थम भी नहीं पाया था कि आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत एक नयी थीसिस लेकर आ गए हैं। इस बार उनके निशाने पर वेद, पुराण, उपनिषद, ब्राह्मण, गीता, रामायण,महाभारत सब कुछ है। एक पुराने विज्ञापन के अंदाज में वे एक साथ सब के सब बदल डालने पर आमादा हैं। नागपुर में एक कार्यक्रम में बोलते हुए संघ प्रमुख भागवत ने कहा कि ‘हिंदू धर्म ग्रंथों की दोबारा समीक्षा की जानी चाहिए। हमारे यहां पहले ग्रंथ नहीं थे। हमारा धर्म मौखिक परंपरा से चलता आ रहा था। बाद में ग्रंथ इधर-उधर हो गए और कुछ स्वार्थी लोगों ने ग्रंथ में कुछ-कुछ घुसाया जो गलत है। उन ग्रंथों, परंपराओं के ज्ञान की फिर एक बार समीक्षा जरूरी है।’ इस बयान की पहली रोचकता तो इसे देने के लिए चुना गया स्थान है। उन्होंने यह बात आर्यभट्ट एस्ट्रोनॉमी पार्क के उद्घाटन के दौरान बोली। यह दिलचस्प इसलिए है कि उनके नियंत्रण में चलने वाली भाजपा सरकारें एस्ट्रोनॉमी-खगोल विज्ञान-में नहीं एस्ट्रोलॉजी-फलित ज्योतिष-में ज्यादा विश्वास करती हैं।

इतना ज्यादा कि जिन-जिन विश्वविद्यालयों में उनकी चली उन उन विश्वविद्यालयों में उन्होंने फलित ज्योतिष को पाठ्यक्रमों में भी लगवा दिया। इस भाषण में भी वे इसका साफ इजहार करने से भी नहीं चूके। उन्होंने कहा कि ‘भारत का पारंपरिक ज्ञान का आधार बहुत बड़ा है, हमारी कुछ प्राचीन किताबें खो गर्इं, जबकि कुछ मामलों में स्वार्थी लोगों ने इनमें गलत दृष्टिकोण डाला। लेकिन नई शिक्षा नीति के तहत तैयार किए गए सिलेबस में अब ऐसी चीजें भी शामिल हैं, जो पहले नहीं थीं।’

वे किन ग्रंथों की बात कर रहे हैं? तुलसी की रामचरितमानस को लेकर हाल में हुए तीखे आक्रोश को लेकर समझा जा सकता है कि यह कुहासा क्यों खड़ा किया जा रहा है। बहरहाल यहां सवाल उस आसन्न महापरियोजना को समझने का है जिसे इतिहास बदलने की संघी साजिश के साथ आने वाले दिनों में चलाया जाने वाला है; प्राचीन ग्रंथों में संघ के मनोनुकूल बदलाव कर उन्हें नए तरीके से गढ़ने, उनका पुनर्लेखन करने की यह नयी परियोजना है-जिसे शुरू करने के एलान के लिए उन्होंने आर्यभट्ट के नाम पर बने एस्ट्रोनॉमी पार्क को चुना।

ऐसा करके वे सचमुच में कुछ करना चाहते हैं या जिन्हें वे हिंदू धर्म के ग्रंथ कह रहे हैं, उनकी ऐतिहासिकता को अपनी तात्कालिक परियोजना के जाल के अनुकूल और कारगर बनाना चाहते हैं? तुर्रा यह है कि आए थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास की तर्ज पर दावा था इतिहास बदलने का बदलने लग गए धर्म!! भागवत हिंदुओं के जिन धर्म-ग्रंथों की बात कर रहे हैं उनके प्राचीनतम ग्रंथ वेदों को ही ले लें तो यह प्रामाणिक सत्य है कि वे तीन चरणों से गुजरे; पहले वे रचने वाले के हिसाब से मंत्र-द्रष्टा हुए, फिर बार-बार दोहराए जाने और सुने जाने के चलते श्रुति हुए और उसके बाद याद में समाहित हो जाने के पश्चात स्मृति हो गए। बहुत बाद में जाकर इन्हें लिखित रूप दिया जा सका।

ऐसा स्वाभाविक भी था; आर्यों के पास भाषा थी, मगर कोई लिपि नहीं थी। वे घुमंतू और पशुपालक थे, इसलिए लिपि की ऐसी कोई खास जरूरत भी नहीं थी। जहां गए वहीं की लिपि अपना ली। भाषा विज्ञान के हिसाब से वेदों की भाषा में सप्तम शाखा का प्राचीनतम नमूना ऋग्वेद में मिलता है; इसकी भाषा ई. पू.1250 से 1000 वर्ष पहले की है।

जिन ग्रंथों के पुनरीक्षण से पुनर्लेखन तक की आवश्यकता वे प्रतिपादित कर रहे हैं ये वे ही ग्रंथ हैं जिनके आधार पर हिंदू राष्ट्र के निर्माण के एकमात्र उद्देश्य को हासिल करने के लिए उनका संगठन अस्तित्व में आया है। स्वयं भागवत का संगठन आरएसएस इन ग्रंथों की प्रामाणिकता और प्रासंगिकता दोनों के बारे में एकदम दृढ़प्रतिज्ञ है ; इन्हें अपौरुषेय मानता है। इन्हें इनके वर्तमान रूप में स्वीकारने से मुकरने के साथ क्या भागवत अपने ही सावरकर और गोलवलकर जैसे पुरखों के कहे लिखे का खंडन करेंगे? क्या उन्हें याद नहीं कि उनके आराध्य और हिंदुत्व,शब्द जिसका खुद उनके अनुसार हिंदू धर्म की परंपराओं से कोई संबंध नहीं, के जनक सावरकर ने कहा था कि ‘मनुस्मृति वह शास्त्र है जो हमारे हिंदू राष्ट्र के लिए वेदों के बाद सबसे अधिक पूजनीय है और जो प्राचीन काल से ही हमारी संस्कृति-रीति-रिवाज, विचार और व्यवहार का आधार बना हुआ है।

सदियों से इस पुस्तक ने हमारे राष्ट्र के आध्यात्मिक और दैवीय पथ को संहिताबद्ध किया है। आज भी करोड़ों हिन्दू अपने जीवन और व्यवहार में जिन नियमों का पालन करते हैं, वे मनुस्मृति पर आधारित हैं। आज मनुस्मृति हिंदू कानून है। यह मौलिक है।’ क्या भागवत जब बोल रहे थे तब उन्हें पता नहीं था कि उनके प.पू. गुरुजी गोलवलकर वर्णाश्रम की ताईद करते हुए कह गए हैं कि ‘आज हम अज्ञानतावश वर्ण व्यवस्था को नीचे गिराने का प्रयास करते हैं। लेकिन यह इस प्रणाली के माध्यम से था कि स्वामित्व को नियंत्रित करने का एक बड़ा प्रयास किया जा सकता था ङ्घ समाज में कुछ लोग बुद्धिजीवी होते हैं, कुछ उत्पादन और धन की कमाई में विशेषज्ञ होते हैं और कुछ में श्रम करने की क्षमता है।

हमारे पूर्वजों ने समाज में इन चार व्यापक विभाजनों को देखा। वर्ण व्यवस्था का अर्थ और कुछ नहीं है, बल्कि इन विभाजनों का एक उचित समन्वय है और व्यक्ति को एक वंशानुगत के माध्यम से कार्यों का विकास जिसके लिए वह सबसे उपयुक्त है, अपनी क्षमता के अनुसार समाज की सेवा करने में सक्षम बनाता है। यदि यह प्रणाली जारी रहती है तो प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके जन्म से ही आजीविका का एक साधन पहले से ही आरक्षित है।’ (आॅर्गनाइजर, 2 जनवरी, 1961, पृष्ठ 5 और 16 में प्रकाशित)

भागवत यदि अपनी बात के प्रति संजीदा हैं तो कायदे से उन्हें मनुस्मृति सहित उन सारे ग्रंथों की निंदा और भर्त्सना करना चाहिए, जिनके नाम पर, जिनके लिखे के आधार पर सदियों तक इस जम्बूद्वीपे भारतखंडे की जनता के 90 फीसद हिस्से को सताया गया। देश, उसकी सभ्यता, उसकी मनुष्यता को बेड़ियों में बांधकर कर करीब डेढ़ हजार वर्ष तक उसकी प्रगति को अवरुद्ध करके रखा। वे तनिक भी गंभीर हैं तो उन्हें इन सबको महान हिंदू धर्म की अनुल्लंघनीय परम्परा और पहचान बताने वाले सावरकर और गोलवलकर के कहे का खंडन करना चाहिए, उनके कहे को गलत और अनुचित बताना चाहिए?

मगर वे इनमें से कुछ भी नहीं करेंगे। उनका मकसद अर्थ बदले बिना सिर्फ शब्द परिवर्तन का है। थोड़ा सा पावडर, जरा सी क्रीम पोत कर बाहरी कुरूपता को ढांपने और इस तरह अरक्षणीय की रक्षा कर उसे बदस्तूर जारी रखने का है। यह भाषाई शुद्दीकरण की कोशिश है, कुरीतियों के खात्मे या सुधार का इरादा नहीं है।


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