Tuesday, April 21, 2026
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त्योहारों पर महंगाई की मार

NAZARIYA


NIRMAL RANIभारत सरकार ने पिछले दिनों करोड़ों की तादाद में मजबूत थैले सिलवाकर उन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बड़ा सा चित्र छपवाकर उन्हीं थैलों में मुफ़्त राशन वितरित करवाकर प्रधानमंत्री को ‘गरीबों के मसीहा’ के रूप में प्रचारित करने की कोशिश की। देश भर में कोरोना निरोधक वैक्सीन लगाने वालों को जो प्रमाण पत्र जारी किया गया उन पर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चित्र अनिवार्य रूप से छपा नजर आया। और इस टीकाकरण अभियान के दौरान जब भाजपाई मंत्रियों व मुख्यमंत्रियों की ओर से ‘धन्यवाद मोदी जी’ नामक जो महा प्रचार अभियान छेड़ा गया उससे भी यही एहसास हुआ कि गोया यदि ‘मोदी जी’ न होते तो देश की जनता वैक्सीन जैसे कोरोना के एकमात्र कवच को हासिल करने से वंचित रह जाती।  परंतु यही सरकार जब बढ़ती बेरोजगारी के आंकड़े छिपाती है, रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजों, खाद्य वस्तुओं, दलहन व तिलहन के मूल्यों में लगती आग पर चर्चा ही नहीं करती, पेट्रोल डीजल व रसोई गैस की कीमतों से नियंत्रण खो बैठती है तो निश्चित रूप से सरकार व सरकार के मुखिया की मसीहाई न केवल संदिग्ध लगने लगती है बल्कि यह प्रचार तंत्र का एक फंडा मात्र प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री ने कोरोना काल की शुरुआत में देश के लोगों को ‘आपदा में अवसर तलाश करने का जो महा मंत्र दिया था उससे जनता भले ही लाभान्वित न हो सकी हो, परंतु सरकार व उसके चतुर सलाहकारों ने आपदा में अवसर ढूंढ निकालने का कोई भी अवसर नहीं गंवाया।

उदाहरण के तौर पर कोरोना काल में सवारी-मेल-एक्सप्रेस रेल गाड़ियों का परिचालन पूरी तरह बंद कर दिया गया था। उसके बाद जब सबसे पहले दो महीने बाद आहिस्ता आहिस्ता  रेल परिचालन शुरू किया गया तो सबसे पहले राजधानी ट्रेन्स की शुरुआत की गई। फिर धीरे-धीरे अन्य ट्रेन्स शुरू की गई। अभी भी पूरी क्षमता के साथ सभी ट्रेन्स का संचालन नहीं हो पा रहा है। परंतु कोरोना काल के दौरान या उसके बाद शुरू की गई रेल गाड़ियों में ‘रणनीतिकारों’ ने ‘आपदा में अवसर’ की तलाश करते हुए कुछ ऐसी चतुराई की जिसकी गाज उन गरीब व साधारण रेल यात्रियों पर पड़ी जो कोरोना काल में या तो बेरोजगार हो चुके थे या उनकी तनख़्वाहें आधी हो चुकी थीं। सरकार ने लंबी दूरी की अनेकानेक नियमित रेल गाड़ियों के आवागमन के समय में थोड़ा परिवर्तन किया, किसी के रुट में कुछ बदलाव किया, कुछ ट्रेन्स के कुछ पड़ाव कम कर दिए, जिससे यात्रियों को ही परेशानी उठानी पड़ी।

इसके बाद ट्रेन नंबर में मामूली फेर बदल कर उन्हें ‘विशेष रेलगाड़ियों’ की श्रेणी में डाल दिया। इस चतुराई के बाद सरकार ने इन ट्रेनों के किराये में भी बढ़ोतरी तो कर ही दी साथ-साथ वरिष्ठ नागरिकों व अन्य श्रेणी के लोगों को किराये में मिलने वाली छूट भी समाप्त कर दी।

देश को भली भांति याद होगा जब गत वर्ष बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के अंतिम दिन एक नवंबर 2020 को प्रधानमंत्री मोदी ने छपरा में एक रैली को संबोधित करते हुए छठ पूजा का जिक्र करते हुए बिहार की मां-बहनों से अत्यंत मार्मिक शब्दों में संबोधन करते हुए कहा था-‘कोरोना काल में आप छठ पूजा कैसे मनाएं, इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है। आपका बेटा दिल्ली में बैठा है।

आप तो बस छठ पूजा की तैयारी करो। उन्होंने कहा कि दुनिया में आज कोई ऐसा नहीं है, जिसे कोरोना ने प्रभावित न किया हो और जिसका इस महामारी ने नुकसान न किया हो। एनडीए की सरकार ने कोरोना की शुरूआत से ही प्रयास किया है कि वो इस संकट काल में देश के गरीब, बिहार के गरीब के साथ खड़ी रहे। हम गरीबों को मुफ़्त अनाज दे रहे हैं। कोरोना के काल में किसी मां को ये चिंता करने की जरूरत नहीं है कि छठ पूजा को कैसे मनाएंगे। अरे मेरी मां! आपने अपने बेटे को दिल्ली में बैठाया है, तो क्या वो छठ की चिंता नहीं करेगा? मां, तुम छठ की तैयारी करो, दिल्ली में तुम्हारा बेटा बैठा है।’ प्रधानमंत्री का यह कितना हृदयस्पर्शी भाषण था?

आज इस भाषण को पूरे एक वर्ष बीत चुका है। दुर्गा पूजा दशहरा के बाद एक बार फिर छठ व दीपावली के त्योहार सिर पर हैं। आम आदमी की कोरोना काल से टूटी कमर अभी सीधी भी नहीं हुई है कि मंहंगाई गत वर्ष की तुलना में काफी अधिक बढ़ चुकी है। परंतु सरकार इसमें भी अवसर तलाशने में जुट गई है। झाखंड-बिहार-दिल्ली-पंजाब-महाराष्ट्र-बंगाल जैसे कई राज्यों में कई ‘विशेष त्योहारी रेलगाड़ियों’ का परिचालन शुरू किया गया है तो कई गाड़ियों के फेरे बढ़ा दिए गए हैं। कहने को तो रेलवे त्योहार मनाने हेतु घर-गांव जाने वाले लोगों की ‘सुविधा’ के लिए यह व्यवस्था कर रहा है। परंतु इन स्पेशल रेलगाड़ियों में सभी श्रेणियों के यात्रियों से 30 प्रतिशत अतिरिक्त किराया वसूल किया जा रहा है।

यदि सरकार संवेदनशील व वास्तव में जनहितैषी होती तो उसे किराये में 30 प्रतिशत बढ़ोतरी करने के बजाये 20-30 प्रतिशत की छूट देनी चाहिए और वरिष्ठ नागरिकों व अन्य श्रेणी के लोगों को किराये में दी जाने वाली छूट भी बहाल करनी चाहिये। परन्तु सरकार कोरोना की मार झेलने वाले श्रमिकों से अतिरिक्त किराया वसूल रही है। ‘बिहार की मांओं’ पर क्या गुजरेगी, जब उनका ‘बेटा’ 30 प्रतिशत अतिरिक्त रेल किराया भरकर और कमर तोड़ मंहगाई में खाली हाथ अपने घर आंगन पहुंचेगा? कमर तोड़ मंहगाई के साथ साथ रेल भाड़ों में भी वृद्धि कर देना और सभी छूट समाप्त कर देना तो यही एहसास कराता है कि यह सब जुमलेबाजियां हैं जो सुनने में कानों को तो भले ही मधुर लगती हों परंतु यह जनता को ‘छलने’ के प्रयास के सिवा कुछ भी नहीं।


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