Monday, June 15, 2026
- Advertisement -

जंग-ए-आजादी का गवाह शहर का अहमद रोड

  • यहां पेड़ों पर लटका दिए गए थे आजादी के मतवालों के शव

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: शहर के प्रमुख मार्गों में शुमार अहमद रोड भले ही आज जाम के झाम व अतिक्रमण से जुझ रहा हो लेकिन ये भी सच है कि जंग ए आजादी के दौरान इस मार्ग पर क्रांतिकारियों को अंग्रेजी फौजों ने फांसी पर लटकाया था। इसके अलावा हिन्दुस्तान के शाही परिवारों की कब्रें भी यहां अभी तक भी वजूद में हैं।

एक ओर जहां शहर की शाही व एतिहासिक इमारतों के प्रति पुरातत्व विभाग आंखे मूंदे हैं वहीं लगता है कि स्थानीय प्रशासन भी अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ चुका है। अगर यही हाल रहा तो एक बारगी उस पल की कल्पना भी की जा सकती है कि इस शहर की एतिहासिकता का वजूद ही हिचकोले लेने लगे।

पेड़ों पर लटका दिए गए थे आजादी के मतवाले

फिरंगी बेड़ियों से अपने वतन को आजाद कराने की चाह में इसी अहमद रोड पर आजादी के मतवालों को अंग्रेजी फौजों ने फांसी पर लटका दिया था। उस जमाने में इस मार्ग के इर्द गिर्द वीरानी थी तथा दोनों ओर बड़े बड़े पेड़ थे। इन्ही पेड़ों पर आजाद के मतवालों को फांसी पर लटकाया गया था।

हांलाकिं अग्रेंजी फौजों की इस क्रूर कार्रवाई का क्रांतिकारियों पर कोई असर नहीं हुआ और जंग ए आजादी की लड़ाई का सफर यूं ही जारी रहा। जानकारों के अनुसार इस मार्ग पर उस जमाने में बड़े और घने पेड़ हुआ करते थे जिसकी वजह से अंग्रेजी फौजें क्रांतिकारियों को इन पेड़ों पर फांसी दिया करती थीं।

37 6

बताया तो यहां तक जाता है कि फांसी दिए जाने के बाद अंग्रेज कई कई दिनों तक इनके शवों को यहीं लटका रहने देते थे। अंग्रेजी शासन के बाद यहां शहीद हुए क्रांतिकारियों को श्रद्धांजलि देते हुए म्यूनिसिपल बोर्ड के तत्कालीन चेयरमेन असद उल्ला खां ने इस मार्ग का चौड़ीकरण करवाकर इसे विस्तार दिया। क्रांतिकारियों के बलिदान के अलावा इस मार्ग की अपनी शाही महत्ता भी है।

शाही परिवारों के कब्रिस्तान का वजूद आज भी कायम

यह मार्ग जहां क्रांतिकारियों की शहादत के लिए हमेशा याद किया जाएगा वहीं इस मार्ग पर शाही जमाने के कुछ निशां अभी भी बाकी हैं। इतिहास के जानकारों के अनुसार शाही फौजों में वजीर रहे नवाब खैरंदेश खां की तेहरवीं पीढ़ी के लोगों की कब्रें आज भी अहमद रोड स्थित जिला अस्पताल परिसर में मौजूद हैं।

हांलाकि देखभाल के आभाव में इस कब्रिस्तान का वजूद लगभग समाप्त हो गया है लेकिन खैरंदेश खां की तेहरवीं पीढ़ी के नवाब अफजाल अहमद खां ने स्थानीय लोगों की मदद से इस कब्रिस्तान की कुछ निशानियों को जिन्दा रखा है। हांलाकिं यहां यह भी बताते चलें कि नवाब अफजाल अहमद खां का भी कुछ समय पूर्व निधन हो चुका है।

1920 तक दफनाए जाते थे यहां नवाबी खानदान के लोग

तत्कालीन कलक्टर लोडी पोटर ने जब यहां अस्पताल बनवाना चाहा तो शाही व नवाबी खानदान का वजूद आड़े आ गया। लेकिन नवाबी खानदान के वरिष्ठ लोगों से बात कर 1907 में तत्कालीन कलक्टर ने इस अस्पताल का निर्माण शुरु करवा दिया। बाद में तत्कालीन गर्वनर बी वी डफरिन के नाम पर ही इस अस्पताल का निर्माण हुआ।

spot_imgspot_img
[tds_leads title_text="Subscribe" input_placeholder="Email address" btn_horiz_align="content-horiz-center" pp_checkbox="yes" pp_msg="SSd2ZSUyMHJlYWQlMjBhbmQlMjBhY2NlcHQlMjB0aGUlMjAlM0NhJTIwaHJlZiUzRCUyMiUyMyUyMiUzRVByaXZhY3klMjBQb2xpY3klM0MlMkZhJTNFLg==" f_title_font_family="467" f_title_font_size="eyJhbGwiOiIyNCIsInBvcnRyYWl0IjoiMjAiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIyMiIsInBob25lIjoiMzAifQ==" f_title_font_line_height="1" f_title_font_weight="700" msg_composer="success" display="column" gap="10" input_padd="eyJhbGwiOiIxNXB4IDEwcHgiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIxMnB4IDhweCIsInBvcnRyYWl0IjoiMTBweCA2cHgifQ==" input_border="1" btn_text="I want in" btn_icon_size="eyJsYW5kc2NhcGUiOiIxNyIsInBvcnRyYWl0IjoiMTUifQ==" btn_icon_space="eyJwb3J0cmFpdCI6IjMifQ==" btn_radius="3" input_radius="3" f_msg_font_family="394" f_msg_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsInBvcnRyYWl0IjoiMTEiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIxMiJ9" f_msg_font_weight="500" f_msg_font_line_height="1.4" f_input_font_family="394" f_input_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsInBvcnRyYWl0IjoiMTEiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIxMiJ9" f_input_font_line_height="1.2" f_btn_font_family="394" f_input_font_weight="500" f_btn_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsImxhbmRzY2FwZSI6IjExIiwicG9ydHJhaXQiOiIxMCJ9" f_btn_font_line_height="1.2" f_btn_font_weight="700" f_pp_font_family="394" f_pp_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsImxhbmRzY2FwZSI6IjEyIiwicG9ydHJhaXQiOiIxMSJ9" f_pp_font_line_height="1.2" pp_check_color="#000000" pp_check_color_a="var(--metro-blue)" pp_check_color_a_h="var(--metro-blue-acc)" f_btn_font_transform="uppercase" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLWJvdHRvbSI6IjYwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9LCJsYW5kc2NhcGUiOnsibWFyZ2luLWJvdHRvbSI6IjUwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9LCJsYW5kc2NhcGVfbWF4X3dpZHRoIjoxMTQwLCJsYW5kc2NhcGVfbWluX3dpZHRoIjoxMDE5LCJwb3J0cmFpdCI6eyJtYXJnaW4tYm90dG9tIjoiNDAiLCJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBvcnRyYWl0X21heF93aWR0aCI6MTAxOCwicG9ydHJhaXRfbWluX3dpZHRoIjo3NjgsInBob25lIjp7ImRpc3BsYXkiOiIifSwicGhvbmVfbWF4X3dpZHRoIjo3Njd9" msg_succ_radius="2" btn_bg="var(--metro-blue)" btn_bg_h="var(--metro-blue-acc)" title_space="eyJwb3J0cmFpdCI6IjEyIiwibGFuZHNjYXBlIjoiMTQiLCJhbGwiOiIxOCJ9" msg_space="eyJsYW5kc2NhcGUiOiIwIDAgMTJweCJ9" btn_padd="eyJsYW5kc2NhcGUiOiIxMiIsInBvcnRyYWl0IjoiMTBweCJ9" msg_padd="eyJwb3J0cmFpdCI6IjZweCAxMHB4In0=" f_pp_font_weight="500"]

Related articles

spot_imgspot_img