Saturday, December 4, 2021
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कहानियों को फिल्म की नहीं, फिल्म को कहानियों की जरूरत है: विमल चंद्र पांडे, फिल्म निर्देशक 

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जनवाणी संवाददाता, बनारस !

साहित्य और सकारात्मक सामाजिक बदलाव के अंतसंर्बंध को स्थापित करने वाला ‘मंथन लिटरेचर फेस्टिवल’ 25 तारीख दिसंबर को ‘कलामंथन’ के आॅफिशियल फेसबुक पेज पर शुरू हुआ। 25, 26 और 27 दिसंबर को आयोजित हुए इस तीन दिवसीय आयोजन साहित्य लेखन और पठन-पाठन के माध्यम से समाज में आवश्यक परिवर्तन और जागरूकता को उद्देश्य बनाने वाले मंच ‘कलामंथन’ की ओर से आयोजित गया। यह इस उत्सव का दूसरा वर्ष है।

25 दिसंबर को पहले दिन पहले सत्र में अतिथि वक्ता थे ”Not-null’’ प्रकाशन के फाउंडर  नीलाभ श्रीवास्तव। कलामंथन की संस्थापक निर्झरा सरिता से बातचीत करते हुए नीलाभ ने ई-बुक्सके भविष्य के प्रति अपनी प्रबल अपेक्षाओं और संभावनाओं पर विस्तृत बातचीत की और विशेष रूप से कोविड-19 के बाद किताबों की दुनिया में आए उस बदलाव पर प्रकाश डाला, जहां पर अब लोग ज्यादा से ज्यादा ई-बुक्स को पढ़ने में रुचि दिखा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य इन्हीं किताबों का है जिन्हें हम अपने मोबाइल पर भी सुविधानुसार पढ़ सकेंगे।

पहले दिन का दूसरा सत्र  सुविख्यात लेखक और फिल्म निर्देशक विमल चंद्र पांडे  और  चर्चित गीतकार  स्वप्निल  तिवारी का था , जिसमें उन्होंने हिंदी साहित्य में  फिल्मों में कितना बचा है, साहित्य विषय पर  अपने विचार खुलकर रखे। फेस्टिवल डायरेक्टर प्रतिमा सिन्हा से बातचीत करते हुए लेखक विमल ने स्पष्ट रूप से माना कि कहानियों को फिल्मों की आवश्यकता नहीं है, लेकिन फिल्म को अच्छी कहानियों की आवश्यकता हमेशा थी और रहेगी। फिल्म भले ही दृश्य माध्यम है,  लेकिन बिना अच्छी कहानी के इसका दीर्घकालिक होना मुश्किल है। दूसरी तरफ गीतकार और शायर स्वप्निल तिवारी ने बताया कि फिल्म के गीत अक्सर सिचुएशन की मांग पर लिखे जाते हैं, लेकिन गीतकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह भाषा की शालीनता और मौलिकता को बरकरार रखे। अच्छा गीत वर्षों तक याद रखा जाता है।

पहले दिन का तीसरा सत्र बेहद महत्वपूर्ण था, जिसमें समाज सेविका, नारी अधिकारों की पैरोकार एवं चर्चित लेखिका सुश्री कमला भसीन ने कलामंथन की संस्थापक निर्झरा सरिता से संवाद स्थापित किया। परिचर्चा के दौरान कमला भसीन ने बेहद बेबाक तरीके से अपने विचार रखते हुए कहा कि हमारे पितृसत्तात्मक समाज में एक लड़की का लिखना पढ़ना खराब माना जाता है। स्त्रीयोचित प्रतीकों को धारण करना उसके लिए अनिवार्य बताया जाता है। एक आत्मनिर्भर और स्वतंत्र स्त्री को यह सब के खिलाफ खड़ा होना होगा तब जाकर वह सशक्त बनेगी। पहले दिन के तीनों साथ में बहुत  कामयाब रहे।

पहले दिन की शाम आयोजित होने वाला आलमी मुशायरा उर्दू के सुविख्यात विद्वान जनाब शम्सुर्रहमान फारुकी के निधन के कारण स्थगित कर दिया गया, जो 27 दिसंबर की शाम आयोजित होगा। इस आॅनलाइन कार्यक्रम के संयोजन में क्रिएटिव डायरेक्टर बासब चंदना और कम्युनिटी मैनेजर अंशु सक्सेना श्रीवास्तव के साथ ही सुरभि और  रूबी जैन  ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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