Monday, May 17, 2021
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केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट से पर्यावरण को क्षति

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देश में नदियों को आपस में जोड़ने की महत्वाकांक्षी योजना में केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट पहली बड़ी परियोजना है, जिस पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बहुत जोड़ दिया था। इसे हाल ही में विश्व जल दिवस यानी 22 मार्च को देश में नदियों को जोड़ने की आजाद भारत की पहली बड़ी परियोजना की शुरुआत को हरी झंडी मिल तो मिल गई है लेकिन साथ में ही स्थानीय लोगों और पर्यावरण विशेषज्ञों द्वारा विरोध के स्वर भी बुलंद हो रहे हैं। इस प्रोजेक्ट लिए केंद्र सरकार एक खास केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट अथॉरिटी बनाएगी। यह प्रोजेक्ट 8 वर्षों में पूरा होगा। अटल जी के सपनों को साकार करने वाले इस प्रोजेक्ट की वर्षों से मांग होती रही है। केन-बेतवा लिंक परियोजना नदियों को आपस में जोड़ने की परियोजना है, जिसका उद्देश्य उत्तर प्रदेश के सूखाग्रस्त बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने हेतु मध्य प्रदेश की केन नदी के अधिशेष जल को बेतवा नदी में हस्तांतरित करना है। यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश के झांसी, बांदा, ललितपुर और महोबा जिलों तथा मध्य प्रदेश के टीकमगढ़, पन्ना और छतरपुर जिलों में फैला है।

इस परियोजना में 77 मीटर लंबा और 2 किमी चौड़ा दौधन बांध एवं 230 किलोमीटर लंबी नहर का निर्माण कार्य शामिल है। केन-बेतवा देश की 30 नदियों को जोड़ने हेतु शुरू की गई नदी जोड़ो परियोजनाओं में से एक है। हाल के कुछ दिनों में फिर से स्थानीय लोगों के द्वारा व्यापक पैमाने पर विरोध किया जा रहा है, जिसका सीधा कारण नदियों के जल स्तर के वर्तमान स्थिति का आकलन न करना और पर्यावरण में हो रहे व्यापक क्षति को बताया जा रहा है। इसके लिंक करने वाले नहर में जो 12500 हेक्टेयर भूमि आ रही है, उसमें से लगभग 9000 हेक्टेयर भूमि वन क्षेत्र है। यहीं नहीं इस वन भूमि में ही पन्ना टाइगर रिजर्व का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा शामिल है, जिसके अंतर्गत लगभग 7 लाख पेड़ नष्ट हो जाएंगे, जो बहुत ही बड़ा मुद्दा बन बैठा है। ऐसे ही पर्यावरण की स्थिति बहुत ही खराब है। ऐसे में यह प्रोजेक्ट कितना उचित है, यह सरकार द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट के फायदे को देखने पर पता चलेगा।

सेंट्रल ऐम्पावर्ड कमेटी ने प्रोजेक्ट पर सवाल उठाए। पन्ना टाइगर रिजर्व के साथ ही घड़ियाल अभ्यारण्य को नुकसान की संभावना जताई गई। बताया गया कि पानी के बहाव में मुड़ाव से और भी नुकसान संभव है। कमेटी ने पानी की उपलब्धता पर भी सवाल उठाए, क्योंकि रिपोर्ट्स बताती हैं कि दोनों ही बेसिन में अनुमान से कम का पानी मौजूद होता है। कमेटी ने यह भी कहा था कि इस प्रोजेक्ट में 28 हजार करोड़ रुपए का पब्लिक फंड शामिल है, जो इस तरह के काम से बर्बाद हो सकता है। एक बड़ा प्रश्न यह भी उठता है कि क्या केन नदी में पर्याप्त जल उपलब्ध है, जिसे बेतवा में ले जाने तक उपलब्धता हो। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले के अपेक्षा इस नदी में जल स्तर काफी कम हो चुका है और इस स्थिति में इसका जल कहीं और शिफ्ट करना जायज नहीं है। स्थानीय लोगों के विस्थापन से जुड़े समस्याएं भी आन पडेंगी। परियोजना के कार्यान्वयन से उत्पन्न विस्थापन के कारण पुनर्निर्माण और पुनर्वास के साथ-साथ इसमें सामाजिक लागत भी शामिल होगी।

2017 में वन सलाहकार समिति ने सिफारिश की थी कि प्रस्तावित पावर हाउस का निर्माण वन क्षेत्र में न किया जाए। रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रोजेक्ट की लागत भी लगातार बढ़ती जा रही है। शुरुआत में 1994-95 के मूल्य स्तर पर इसकी लागत 1,998 करोड़ रुपए रखी गई थी। साल 2015 में यह 10,000 करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी थी। अभी प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 28,000 करोड़ रुपए बताई जा रही थी, लेकिन सरकार ने कहा है कि 37,611 रुपए की लागत आएगी। सरकार का उसके फायदे के बारे में कुछ तर्क दिए गए हैं। जैसे कि नदियों को आपस में जोड़ने से बुंदेलखंड क्षेत्र में सूखे की पुनरावृत्ति का समाधान होगा। इसके अलावा इससे किसानों की आत्महत्या की दर पर अंकुश लगेगा और सिंचाई के स्थायी साधन प्रदान करके तथा भूजल पर अत्यधिक निर्भरता को कम करके उनके लिए स्थायी आजीविका सुनिश्चित करेगा। इससे कुछ लाभ विद्युत क्षेत्र में भी दिख रहा है। बहुउद्देशीय बांध के निर्माण से न केवल जल संरक्षण में तेजी आएगी, बल्कि 103 मेगावाट जल-विद्युत का उत्पादन भी होगा और 62 लाख लोगों को पीने के पानी की आपूर्ति की जा सकेगी। कुछ विचारकों का मानना है कि पन्ना टाइगर रिजर्व के जल संकट वाले क्षेत्रों में बांधों का निर्माण होने से इस रिजर्व के जंगलों का जीर्णोद्धार होगा जो इस क्षेत्र में जैव विविधता को समृद्ध करेगा।

इस परियोजना के अंतर्गत कुछ अन्य कार्यों को भी रेखांकित किया गया है। जैसे कि परियोजना के अन्तर्गत बरियारपुर पिकप बीयर के डाउनस्ट्रीम में दो नए बैराजों का निर्माण कर, लगभग-188 मिलियन क्यूबिक मीटर जल भंडारण किया जा सकेगा। इस प्रोजेक्ट के कुछ फायदे हैं, तो कुछ चुनौतियां भी हैं। ऐसे में सरकार को चाहिए कि स्थानीय लोगों से वार्ता कर समस्याओं का समाधान करे। यही नहीं, उस समय जब कि पूरी दुनिया कोरोना के बाद आॅक्सीजन के लिए जूझ रही है, उस समय में बड़े पैमाने पर पेड़ों को नष्ट करना भी उचित नहीं है, लेकिन अन्य जगह पर वनीकरण कर के इसका समाधान किया जा सकता है। इसके अलावा केन नदी में घट रहे जल स्तर को बढ़ाने का भी प्रयास करना जरूरी है, जिससे कि केन नदी में जल स्तर बना रहे, ताकि बेतवा नदी को पर्याप्त जल आपूर्ति मिलती रहे।


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