
कृष्ण को देव कहें या मानव, ईश्वर कहें या मानव, सुधारक कहें या दंडाधिकारी हर रूप में वह लोक से जुड़े मिलते हैं। चाहे एक ग्वाले के रूप में देखें या माखनचोर के रूप में । बाल लीला में हो या द्वारिकाधीश के रूप में कृष्ण हर वक्त हर पल लोक कल्याण में रत मिलते हैं। वह श्री राम की तरह धीरोद्दात या मर्यार्दा पुरुषोत्तम न सही एक खिलंदड़ किस्म के ऐसे नायक हैं जिन पर लोक यानि जनसाधार मर मिटता है, अपना सब कुछ उन पर न्योछावर कर देता है और मानव होते हुए भी वह भगवान का दर्जा पा जाते हैं।