- क्रांतिधरा बनेगी ‘त्रिमूर्ति’ के दर्शन की गवाहा
- धारावाहिक रामायण के राम के बाद लक्ष्मण और मां सीता का होगा दीदार
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: चर्चित सीरियल रामायण में भगवान राम का मुख्य किरदार निभाने वाले अरुण गोविल के कदम मेरठ में पड़ने के बाद अब उसी सीरियल में उनके हमसाया लक्ष्मण और मां सीता के कदम भी इस क्रांतिधरा पर पड़ेंगे। रील लाइफ के इन किरदारों को मेरठ में एक साथ देखकर लोग जरूर रोमांचित होंगे। जब 1987 में इस धारावाहिक का प्रसारण हुआ था तब भगवान राम के रूप में अरुण गोविल, लक्ष्मण के रुप में सुनील लहरी और मां सीता के रूप में दीपिका चिखलिया काफी चर्चित हो गए थे।
घर घर लोग उन्हें जानने और पहचानने लगे थे। हालत यह थे कि धारावाहिक से अलग हटकर जब ये तीनों कहीं भी जाते तो लोग इनमें भगवान राम से लेकर लक्ष्मण और मां सीता की छवि देखते और उनका आशीर्वाद लेते। अब चूंकि अरुण गोविल मेरठ-हापुड़ लोकसभा से भाजपा के उम्मीदवार हैं लिहाजा उनके प्रचार के लिए अब मेरठ में शीघ्र ही लक्ष्मण और सीता (दीपिका चिखलिया एवं सुनील लहरी) भी आएंगे।

रामायण धारावाहिक चूंकि काफी वर्षों पूर्व प्रसारित हुआ था लिहाजा नई पीढ़ी उक्त तीनों किरदारों से कम वाकिफ थी, लेकिन जब कोरोनाकाल में इस धारावाहिक का फिर से प्रसारण हुआ तो नई पीढ़ी भी इन किरदारों को अच्छी तरह जान और पहचान गई। इसके बाद यह त्रिमूर्ति फिर से लाइमलाइट में आ गई। भाजपा सूत्रों के अनुसार अब शीघ्र ही यह तीनों कलाकार मेरठ में मंच साझा करेंगे।
पार्टी सूत्र यह भी बताते हैं कि मेरठ में भगवान राम के लिए लक्ष्मण और सीता भी वोट मांगेगे। हालांकि अभी तारीख और स्थान का चयन होना बाकी है। बताया जाता है कि जब अरुण गोविल अपना नामांकन दाखिल कर देंगे तो उसके बाद शीघ्र ही जनसभा का कार्यक्रम तय कर दिया जाएगा।
…जब आदर्शों पर आधारित होती थी राजनीति
सेवानिवृत्ति प्रशासनिक अधिकारी प्रभात राय (आईएएस) का कहना है कि एक दौर वह था, जब राजनीति आदर्शों पर आधारित हुआ करती थी। अब इसके मायने बदल गए हैं, और आज की राजनीति जातिवाद धर्मवाद और पूंजीवाद पर आधारित हो गई है। प्रभात राय का कहना है कि स्वतंत्रता आंदोलन में अंग्रेजों से आजादी के साथ-साथ समाज सुधार, आर्थिक समता, सांस्कृतिक एकता और आपसी सौहार्द को भी सर्वोपरि रखा गया। स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े पन्नों को पलट कर देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि उसमें कहीं जातिवाद या संप्रदायवाद का कोई स्थान नहीं था।
मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा जैसे संगठनों को सामाजिक मान्यता नहीं थी, हालांकि अंग्रेजों ने दोनों ही संगठनों को बढ़ावा देकर यूनिटी को खत्म करने की कोशिश की थी। यही कोशिश भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के रूप में सामने भी आई। इसके बावजूद भारत में सांप्रदायिकता हावी नहीं हो पाई। वर्ष 1991 में ग्लोबलाइजेशन शुरू हुआ, यहीं से सामाजिक करण के बजाय सरकारी करण का दौर शुरू हुआ। निजीकरण और आर्थिक सुधारों का नाम पर एक घृणित पूंजीवाद का जन्म हुआ, उसी का प्रतिफल आहिस्ता आहिस्ता करके वटवृक्ष बनता चला गया।
समाजवाद का नाम लेने वालों ने समाजवाद को त्याग दिया। जिसके बाद सामाजिक विषमता शुरू हो गई। सांप्रदायिकता के विरुद्ध आंदोलन के बजाय इसकी शुरुआत हुई। जातिवाद, समुदायवाद और सांप्रदायिक राजनीति का उदय हुआ। जाति-धर्म देखकर वोट दिए जाने लगे। आज यह भाव गौण होकर रह गया है कि हम सब भारतीय हैं। प्रभात राय का कहना है कि राजनीति में अपराधीकरण की स्थिति यह होती चली गई कि भले ही एक चपरासी की नौकरी देने के लिए उसका चरित्र प्रमाण पत्र लिया जाता हो।
अगर किसी के विरुद्ध कोई मुकदमा कोर्ट में विचाराधीन है तो उसको सरकारी नौकरी नहीं मिलती थी। लेकिन राजनीति को लेकर स्थिति यह बनी कि गंभीर आपराधिक मुकदमे कोर्ट में चलने के बावजूद राजनेता सरकार चलाने वाले बनने लगे। प्रभात राय का कहना है कि राजनीतिक सेवा नहीं, बल्कि धंधा बन चुका है। आज समर्पित कार्यकर्ताओं का नितांत अभाव है इसका स्थान पेड वर्करों ने ले लिया है।
कांग्रेस: जिला और शहर अध्यक्षों के पत्ते फिटने शुरू
मेरठ: लोकसभा चुनावों की तैयारियों के बीच कांग्रेस ने कई शहर व जिलाध्यक्ष बदल दिए हैं। इनमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक के अध्यक्ष शामिल हैं। चुनावी तैयारियों के बीच पार्टी ने यह निर्णय क्यों लिया इसका कोई पुख्ता कारण तो पता नहीं चल पाया, लेकिन पार्टी सूत्रों के अनुसार कुछ लोगों को चूंकि प्रदेश कमेटी में शिफ्ट किया गया है तो कुछ ने खुद पद छोड़ने की इच्छा व्यक्त की थी। इसके अलावा कुछ को उनकी निष्क्रियता ले डूबी। मेरठ के जिला अध्यक्ष अवनीश काजला व महानगर अध्यक्ष जाहिद अंसारी को अभी नहीं छेड़ा गया है।
गाजियाबाद में विनीत त्यागी को जिलाध्यक्ष बनाया गया है जबकि गौतमबुद्धनगर में दीपक भाटी चोटीवाला को जिले की जिम्मेदारी दी गई है। इसके अलावा नोएडा में मुकेश यादव को शहर अध्यक्ष जबकि शामली में अखलाक प्रधान को जिला व लोकेश कटारिया को शहर अध्यक्ष बनाया गया है। मथुरा में विक्रम वाल्मीकि को शहर अध्यक्ष बनाया गया है। संदीप राणा सहारनपुर के जिला अध्यक्ष होंगे। आगरा में अरुण शर्मा जिलाध्यक्ष जबकि अमित दिवाकर को शहर की जिम्मेदारी दी गई है। अलीगढ़ में ठा. सोमवीर सिंह को जिला व नवेद खान को शहर अध्यक्ष बनाया गया है।
झांसी में योगेन्द्र सिंह यादव को जिलाध्यक्ष बनाया गया है। ललितपुर में राजेश रजक को जबकि फतेहपुर में वीरेंद्र सिंह चौहान जिलाध्यक्ष होंगे। फतेहपुर में शहर की जिम्मेदारी मो. आरिफ को दी गई है। कौशांबी में गौरव पांडेय जिलाध्यक्ष होंगे। सुल्तानपुर में शकील अंसारी, गाजीपुर में संदीप विश्वकर्मा शहर अध्यक्षों की जिम्मेदारी निभाएंगे। उधर, लखनऊ शहर (प्रथम) की जिम्मेदारी अमित श्रीवास्तव व लखनऊ शहर (द्वितीय) की जिम्मेदारी शहजाद आलम के पास रहेगी। इसके अलावा बलिया के जिलाध्यक्ष उमाशंकर पाठक होंगे।
मेरठ में भी हलचल
चुनावी प्रक्रिया के दौरान अचानक जिला व शहर अध्यक्षों को बदलने की प्रक्रिया भले ही किसी के गले नहीं उतर रही हो, लेकिन हाईकमान के फरमान के बाद प्रदेश के सभी जिला व शहर अध्यक्षों की कुर्सियों पर तलवार लटक गई है। मेरठ के कांग्रेसियों में भी हलचल है। पार्टी के वरिष्ठ नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी पहले ही पार्टी के मेरठ संगठन की निष्क्रियता पर सवाल उठा चुके हैं।

