Sunday, May 17, 2026
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भाजपा की प्रचंड जीत, अहंकार की हार

  • 28 वर्षों पुराना भाजपा ने ये भी मिथक तोड़ा, सपा सरधना विधायक रहे अहंकार के नशे में चूर

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: मेयर पद पर भाजपा प्रत्याशी हरिकांत अहलूवालिया की यह प्रचंड जीत है। क्योंकि 107406 मतों से रिकॉर्ड जीत दर्ज करने वाले वह प्रदेश के पहले मेयर प्रत्याशी बन गए हैं। 28 वर्ष पुराना भाजपा ने ये मिथक भी थोड़ा कि जिस की सरकार प्रदेश में होती है, उसका कभी मेयर नहीं बनता, मिथक टूटा और इतिहास बन गया, लेकिन साथ ही अहंकार की भी हार हुई है।

क्योंकि समाजवादी पार्टी की मेयर प्रत्याशी सीमा प्रधान और उनके पति सरधना विधायक अतुल प्रधान पूरे चुनाव में अहंकार में ही नजर आए। क्योंकि समाजवादी पार्टी के जो बड़े नेता नाराज थे, उनको भी अतुल प्रधान एकजुट करने में विफल रहे। कहा तो ये जा रहा है कि अतुल प्रधान इन बड़े सपा नेताओं के नाराजगी दूर करने के लिए उनके घर तक नहीं पहुंचे।

दरअसल, सपा विधायक अतुल प्रधान मेयर के इस चुनाव को लेकर यह मान बैठे थे कि मुस्लिम तो सपा के बंधुआ मजदूर है, लेकिन मुस्लिमों ने यह भी साबित कर दिया कि सपा उनका अंतिम ठिकाना नहीं, बल्कि औवेसी की पार्टी में भी उनकी एंट्री हो सकती है। जब सपा का मेयर प्रत्याशी लखनऊ में तय हो रहा था, तब भी सपा नेताओं में मनमुटाव उजागर हुआ था, लेकिन महत्वपूर्ण बात यह कि इस मनमुटाव को दूर करने का सपा मुखिया अखिलेश यादव ने भी प्रयास तक नहीं किया।

अखिलेश यादव रोड शो करने मेरठ अवश्य आए, लेकिन पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं किठौर के सपा विधायक शाहिद मंजूर, शहर सपा विधायक रफीक अंसारी और पूर्व विधायक एवं दलित नेता योगेश वर्मा को एक टेबल पर बैठाकर मनमुटाव को दूर करने का तनिक भी प्रयास नहीं किया। इसमें जितना दोषी अतुल प्रधान है, कहीं उससे ज्यादा सपा मुखिया अखिलेश यादव भी हैं, जिस तरह से सपा के बड़े नेताओं के बीच मेरठ में खींचतान चल रही थी, इसे अखिलेश यादव भी जानते थे।

उसको दूर करने का प्रयास ही नहीं हुआ। यही नहीं, अखिलेश यादव शायद यह समझ बैठे थे कि जिस व्यक्ति को उन्होंने प्रत्याशी बना दिया, उसी को मुस्लिम मत पड़ जाएंगे, लेकिन मुस्लिमों ने अखिलेश यादव को भी आईना दिखाया कि मुसलमान सपा के बंधुआ मजदूर नहीं है। मुसलमान भी राजनीति करना जानते हैं और उनका ठिकाना कहीं और भी हो सकता है।

महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जिस दिन अखिलेश यादव रोड शो करने के लिए हवाई पट्टी परतापुर पहुंचे, तब उनके स्वागत में शाहिद मंजूर, रफीक अंसारी और पूर्व विधायक योगेश वर्मा भी मौजूद रहे, लेकिन अखिलेश यादव ने भी नाराज चल रहे इन नेताओं से दूरी बनाई। नेताओं ने जिस रथ को रोड शो के लिए तैयार किया था, उस रथ पर भी यह तमाम नेता सवार होना तो दूर रोड शो में गए ही नहीं।

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इससे स्पष्ट हो गया था कि सपा नेताओं की इस लड़ाई में दूसरी पार्टियां लाभान्वित हो सकती है। यही नहीं, चर्चा तो यह भी है कि अतुल प्रधान से जो सपा के विधायक नाराज चल रहे थे, उनकी मानमनोव्वल तक नहीं की। चर्चा तो यह भी है कि अपनो को वोट करने का भी संदेश आगे भी सपा के बड़े नेताओं ने आगे बढ़ाया। यह भी वजह रही कि सपा का जो वोट बैंक था, उसमें औवोसी सेंध लगाने में कामयाब रहे।

जिस औवेसी के प्रत्याशी अनस ने 1,28,547 मत हासिल किये, उसी औवेसी के प्रत्याशी इमरान अंसारी ने विधानसभा चुनाव में शहर विधानसभा सीट पर 3038 वोट मिले थे, आखिर ऐसा क्या चमत्कार हुआ कि औवेसी की पार्टी एक लाख प्लस वोट उसी शहर में हासिल करने में कामयाब हो गई, जहां पर विधानसभा चुनाव में जमानत तक जब्त कराई थी।

…और ढह गया सपा का राजनीतिक किला

शहर पश्चिमी यूपी का समाजवादी पार्टी के लिए मजबूत गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन सपा की साइकिल यहां इस बार बामुश्किल इज्जत बचाने के लिए दौड़ती हुई दिखाई दी। समाजवादी पार्टी के शहर विधायक रफीक अंसारी हैं, वो लगातार दो बार से शहर विधायक के पद पर बने हुए हैं। एक तरह से यह सपा का मजबूत किला बन गया था। मेयर के चुनाव में गैर मुस्लिम सीमा प्रधान को सपा मुखिया अखिलेश यादव ने चुनाव मैदान में उतारा था, जिससे मुस्लिमों ने किनारा कर लिया।

ये किनारा सीमा प्रधान से ही नहीं, बल्कि सपा मुखिया अखिलेश यादव से किया। आखिर ऐसा क्या हुआ कि सपा मुखिया अखिलेश यादव से मुस्लिमों का विश्वास ही उठ गया। सपा में उतार-चढ़ाव तो बहुत आये, लेकिन मुलायम सिंह के रहते हुए भी मुस्लिमों का जुड़ाव सपा के साथ रहा। बीच में बसपा से भी मुस्लिम जुड़ा, लेकिन इस तरह से मुस्लिम सपा से कभी नहीं छिटका, जिस तरह से इस बार निकाय चुनाव में मुस्लिमों ने एक तरफा औवेसी की पार्टी को वोट किया।

हालात ऐसे हो गए कि सपा के मेयर प्रत्याशी सीमा प्रधान चुनावी मुकाबले में दिखी जरूर, लेकिन तीसरे पायदान पर खिसक जाएगी, ऐसी खुद सीमा प्रधान और उनके पति अतुल प्रधान को भी विश्वास नहीं था। सीमा प्रधान को 1,15 964 वोट मिले, जहां सपा और भाजपा को मुख्य मुकाबले में माना जा रहा था, लेकिन सपा प्रत्याशी सीमा प्रधान तीसरे पायदान पर कैसे खिसक गई? इसको लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं।

दरअसल, वर्ष 2014 और 2019 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लहर के बावजूद मेरठ शहर की विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी का ही कब्जा रहा है। वैसे तो जनपद में इस समय मेरठ शहर, सरधना और किठौर विधानसभा पर सपा का ही कब्जा है। सपा के तीन विधायक मेरठ जनपद में हैं। दरअसल, शहर सीट पर सपा की सियासत मजबूत रही है। ऐसी कभी दुर्गति पहले कभी नहीं हुई, जो वर्तमान में सीमा प्रधान की हुई है।

उन्हें तीसरे पायदान पर जाना पड़ा। महत्वपूर्ण बात यह है कि औवेसी पार्टी के मेयर पद के प्रत्याशी अनस ने सपा की सीमा प्रधान को टक्कर दी है और सीमा से ज्यादा वोट हासिल कर एक ऐसी लकीर खींची है, जो मेरठ की सियासत में सपा के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। क्योंकि अनस का कोई पॉलीटिकल बैकग्राउंड भी नहीं है, सिर्फ अनस यूथ हैं।

इसके बावजूद जिस तरह का चुनाव अनस ने लड़ा वो सपा के लिए बड़ा झटका है। क्योंकि मतदान से पहले अनस को कोई नहीं जानता था, लेकिन जिस तरह से मुस्लिमों ने एकतरफा अनस को वोटिंग की, वह भाजपा के लिए मुफीद साबित हुई।

लोकसभा के सेमीफाइनल में भाजपा हुई पास

निकाय चुनाव भाजपा के लिए लोकसभा चुनाव का एक तरह से सेमीफाइनल था। इस सेमीफाइनल में भाजपा पास हो गई हैं। विपक्ष को लोकसभा चुनाव में भी झटका लगने वाला हैं, ये राजनीति की जमीन भाजपा नेताओं ने यहां तैयार कर ली हैं। जनपद में तीन विधानसभा सीटों पर सपा जीती थी तथा एक विधानसभा पर रालोद ने जीत दर्ज की थी। इस तरह से भाजपा के लिए चार विधानसभा क्षेत्रों में पराजय भी चुनौती बना हुआ था, लेकिन भाजपा के दिग्गजों ने जिस तरह से लोकसभा चुनाव के सेमीफाइनल के रूप में निकाय चुनाव लड़ा, वो काबिले तारीफ हैं।

इसी तरह से भाजपा ने लोकसभा चुनाव लड़ा तो पूरा विपक्ष एकजुट होने के बाद भी धड़ाम दिखाई देगा। भाजपा के छोटे नेता से लेकर बड़े नेता तक इस चुनाव में एकजुट दिखे। भाजपा के रथ पर राज्यसभा सांसद हो या फिर सांसद राजेन्द्र अ्रग्रवाल ये सभी सवार थे। विधायक भी पूरे चुनाव में बने रहे। पूर्व विधायक भी चुनाव से नहीं हटे। इस तरह से भाजपा का प्लान शानदार तरीके से चला। भाजपा ने एकजुटता अवश्य दिखाई, लेकिन वोट प्रतिशत बढ़ाने में भाजपा के नेता विफल रहे। इसकी वजह जो भी हो, लेकिन लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट प्रतिशत बढ़ाने की तरफ फोकस करना होगा।

इस चुनाव में तो एआईएमआईएम का कार्ड चल गया। हो सकता है कि लोकसभा चुनाव में एआईएमआईएम का कार्ड नहीं चल पाए। इसको देखते हुए भाजपा को लोकसभा चुनाव की तैयारी करनी होगी। वैसे तो सपा-एआईएमआईएम के वोटों को आपस में जोड़ भी दिया जाए, तब भी भाजपा प्रत्याशी जीत दर्ज कर रहे हैं। इसलिए ये भी महत्वपूर्ण है कि पूरा विपक्ष एकजुट हो जाएगा।

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