Saturday, December 4, 2021
- Advertisement -spot_imgspot_imgspot_imgspot_img
- Advertisement -spot_imgspot_imgspot_imgspot_img
HomeसंवादCareerपब्लिक स्पीकिंग में मास्टरी

पब्लिक स्पीकिंग में मास्टरी

- Advertisement -


आसान नहीं राहें

किसी पब्लिक मीटिंग में श्रोताओं के विशाल भीड़ को संबोधित करने के अपने नाम के अनाउन्समेंट के साथ ही तन – मन अजीबोगरीब एहसास से सिहर उठता है।

अचानक ही आत्म-विश्वास डूबने लगता है, मन में अजीब-सी घबराहट शुरू हो जाती है, गला सूखने लगता है, सांसें तेज चलने लगती है, सोचने की क्षमता खत्म होने लगती है और न चाहते हुए भी मन में यह विचार बार-बार आने लगता है।

कि कितना अच्छा होता यदि सभा को संबोधित करने की मेरी बारी आने से पूर्व ही वक्त वहीं रुक जाता! दुनिया में अच्छे से अच्छे वक्ता भी जब मंच पर पब्लिक को अड्रेस करने आते हैं तो उनके साथ भी प्रारंभ में यही सब कुछ होता है।

यही कारण है कि पब्लिक स्पीकिंग के बारे में भय, चिंता, और घबराहट सामान्य-सी घटनाएं हैं और इसके बारे में कुछ भी विचित्र नहीं है।

दर्शकों और श्रोताओं से खचाखच भीड़ में भाषण देने के पूर्व इस प्रकार की मानसिक और शारीरिक घबराहट को तकनीकि रूप से ‘मंच भय’ भी कहते हैं।

भौतिक और रसायन शास्त्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित विश्व की पहली महिला वैज्ञानिक मेरी क्यूरी ने कहा था, ‘दुनिया में ऐसी कोई चीज नहीं है जिससे डरने की दरकार है।

केवल भय के कारणों को अच्छी तरह से समझने की जरूरत है।’ सच पूछिए तो मंच-भय की दुनिया का मनोविज्ञान भी इससे बिल्कुल अलग नहीं है।

जब हम मंच भय का कारण जान लेते हैं तो उसको दूर भगाने में कोई समस्या नहीं आती है और हम एक ओजस्वी वक्ता बन पाने में सफल हो जाते हैं।

खुद को छुपायें नहीं

प्राय: यह कहा जाता है कि पब्लिक स्पीकिंग एक कला है जिसकी सफलता नब्बे प्रतिशत स्पीकर के बॉडी जेस्चर और केवल दस प्रतिशत ही भाषण के कॉन्टेनट्स पर निर्भर करता है।

जब हम किसी भीड़ में बोलने के लिए खड़े होते हैं तो हमें अपने श्रोता के सामने आने मे हिचक होती है और हम खुद को माइक्रोफोन या भाषण- मंच (लेकटर्न) के पीछे छुपा लेते हैं।

पब्लिक स्पीकिंग की कला में यह स्थिति शालीन नहीं माना जाता है। लिहाजा भीड़ के सामने प्रत्यक्ष रूप से खड़े होने चाहिए। इस बात की कोशिश करनी चाहिए कि श्रोता आपको पूरी तरह से देख पाए। ऐसा करने से पब्लिक से हमारी निकटता और आत्मीयता बढ़ जाती है जो घबराहट को दूर करने में सहायता करती है।

होमवर्क बहुत जरूरी है

किसी भी कार्य को मुकम्मल रूप से संपन्न करने के लिए होमवर्क बहुत अनिवार्य होता है। होमवर्क का आशय किसी कार्य को करने की पूर्व- तैयारी से है।

जिस विषय या मौके पर हम कुछ बोलने के लिए आमंत्रित किए जाते हैं तो उस विषय या मौके के बारे में हमें क्या बोलना है, कितनी देर बोलना है, हमें सुनने वाले कौन हैं, उनका पर्सनल स्टैटस, एजुकेशनल क्वालफिकैशन क्या है, इत्यादि बातों के बारे मे भाषण के पूर्व ही जानकारियां जुटा लेने से कार्य आसान हो जाता है।

भाषण के विषय या अवसर से संबंधित अनिवार्य फैक्ट्स और फिगर्स के बारे में भी जानने से आत्मविश्वास बना रहता है और फिर श्रोता भी हमारी बातों को पूरे मनोयोगपूर्वक सुन पाते हैं।

पूर्व-तैयारी की दशा में घबराहट नहीं होती है, क्योंकि हमारे पास रोडमैप होता है और हम कॉन्फिडेंटली अपनी बातें अपने श्रोता के सामने रख पाते हैं।

प्रेजन्टेशन प्रभावशाली होना जरूरी

प्राय: ऐसा कहा जाता है कि पब्लिक स्पीकिंग में आप क्या कहते हैं यह उतना महत्वपूर्ण नहीं होता है जितना कि यह महत्वपूर्ण होता है कि आप कैसे कह रहे हैं।

यही कारण है कि पब्लिक स्पीकिंग के बारे में यह भी माना जाता है कि किसी वक्ता का भाषण कैसा होगा यह 90 फीसदी इस बात पर निर्भर करता है कि हम मंच पर कैसे आते हैं।

आशय यह है कि भीड़ के सामने हम खुद को कैसे प्रेजेंट करते हैं, यह काफी अहम होता है। साथ ही यह भी माना जाता है कि शुरुआत के 30 सेकंड और समापन के पहले के 30 सेकंड पब्लिक स्पीकिंग के लिए काफी प्रभावशाली होते हैं।

जब भी मंच पर संबोधन के लिए आपके नाम की घोषणा हो तो एक गहरी सांस लें और मंच की तरफ बिना घबराए हुए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें। मंच पर जाने के तुरंत बाद बोलना शुरू नहीं करें।

जहां से आप पब्लिक को संबोधित करेंगे वहां थोड़ी देर रुकें और श्रोता के रूप मे भीड़ के शांत होने की प्रतीक्षा करें।

गलतियां करने पर रुके नहीं, आगे बढ़ते रहें

प्राय: ऐसा देखा जाता है कि जब हम कहीं बोलने के क्रम में गलती कर जाते हैं तो फिर हम आगे बढ़ नहीं पाते हैं, हम काफी घबरा जाते हैं। हम खुद को डिमोरलाइज्ड महसूस करने लगते हैं और फिर वहीं रुक जाते हैं।

यह स्थिति भयावह होती है। इसके विपरीत गलती करने की स्थिति में बिल्कुल रुके नहीं। जहां आपसे गलती हुई है वहां से आप साहस के साथ इस तरह से आगे बढ़ते रहें ताकि श्रोता को यह बिल्कुल पता नहीं लग पाए कि आप घबराए हुए हैं।

प्रैक्टिस से ही आप पूर्ण बन सकते हैं

मानव ज्ञान की अन्य विधाओं की तरह पब्लिक स्पीकिंग की कला में मास्टरी भी निरंतर अभ्यास से आती है। सिनेमा के विख्यात कलाकार भी अपने रोल को उत्कृष्ट रूप से निभाने के लिए कठिन मिहनत और अभ्यास करते हैं, अपने डाइलॉयग्स को बार झ्र बार दुहराते हैं।

भाषण की कला में भी पर्फेक्शन का पॅरामीटर प्रैक्टिस और प्रैक्टिस है। वैसे कभी-कभी प्रैक्टिस के लिए समय मिलना संभव नहीं हो पाता है, लेकिन कुछ खास अवसरों के लिए अपने स्पीच और भावभंगिमा को बड़े गौर से आब्जर्व करें, क्या बोलना है इसकी शिद्दत से तैयारी करें और अपनी कमियों को दूर कर अपने भाषण से श्रोता का मन मोह लें।

डर से डरें नहीं बल्कि डर को नियंत्रित करें

जापान की एक कहावत है, ‘भय उतना ही गहरा और मजबूत होता है जितना हमारा मस्तिष्क इसे अनुमति देता है।’ आशय यही है कि मंच भय का संबंध मन से होता है।

जिसके किरदार मन में ही गढ़े जाते हैं और मन में ही उनका मंचन होता है। लिहाजा मन से भय को भगाने और इसे मजबूत करने की आवश्यकता है।

जब कभी भी पब्लिक में बोलने में भय लगता हो तो खुद के अंदर झांकने की कोशिश करें और ईमानदारी से खुद से यह प्रश्न पूछें कि आखिर इस भय का कारण क्या है।

जब हमें कारण पता हो जाए तो फिर इसके समाधान के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। जीवन में हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि इस दुनिया में कोई भी शख्स किसी भी विधा में पूर्ण नहीं होता है।

प्रसिद्ध अमेरिकी दार्शनिक राल्फ वाल्डो इमर्सन ने एक बार कहा था, ‘जो व्यक्ति हर दिन किसी न किसी भय पर विजय प्राप्त नहीं कर पाता है।

वह जीवन जीने के बेशकीमती रहस्यों को कभी भी सीख नहीं पाता है।’ लिहाजा पब्लिक स्पीकिंग के भय को हम अपने विवेक, कठिन मिहनत और निरंतर प्रयास से ही जीत सकते हैं।

इन बातों को कभी भी नहीं भूलें-

  • डरें नहीं, आत्मविश्वास और हिम्मत के साथ अपने श्रोता का सामना करें।
  • इस दुनिया में कोई भी पूर्ण नहीं होता है और इसीलिए खुद को कभी भी अयोग्य नहीं समझें।
  • असफलता के बावजूद निरंतर प्रयास करते रहें और कभी भी हार नहीं मानें।
  • भाषण के मध्य सही टाइम पर पॉज (विराम) अवश्य लें।
  • अपने भाषण को शॉर्ट और सारगर्भित रखें। जो कुछ बोलें स्पष्ट बोलें।
  • मंच पर सीधा खड़ा रहें और श्रोता से नजर मिलाकर बातें करें।
  • दिल से बोलें, आडंबर और झूठ से दूर रहें। अपने श्रोता से ईमानदार बनें।
  • अपने भाषण को किसी महापुरुष के क्वोटेशन या किसी प्रेरक प्रसंग के साथ शुरू करने से आत्मविश्वास बढ़ता है।
  • जैसे बातें करते हैं अपने श्रोता से वैसे ही बोलें।
  • आप अपने पास मेन पॉइंट्स को नोट करके रख सकते हैं। यह किसी प्रकार का अवगुण नहीं माना जाता है।
    -एसपी शर्मा
What’s your Reaction?
+1
0
+1
0
+1
0
+1
0
+1
0
+1
0
+1
0
- Advertisement -

Leave a Reply

- Advertisment -spot_imgspot_imgspot_imgspot_img

Most Popular

- Advertisment -spot_img

Recent Comments