Wednesday, May 6, 2026
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मन की भावनाओं का नया रंग

Ravivani 31


इश्क की हरी पत्तियां’ की कहानियां इश्क के उन रंगों से परिचय कराती हैं, जो दाम्पत्य जीवन के कैनवास के हिस्से बन गए हैं। जवां मन की तलहटी में ‘इश्क की हरी पत्तियां’ के बदलते रंग सवाल करते हैं कि आखिर वो कौन सी वजह है कि अब औरत का भी मन मांगे मोर..! बदलती मान्याताओं के चलते दाम्पत्य जीवन में इश्क के कई पेंच हैं। स्त्री-पुरुष के संबंधों को बहुत गहराई से वरिष्ठ पत्रकार एवं कथाकार रमेश कुमार ‘रिपु’ ने उकेरा है। बदलती सभ्यता के दौर में नई पीढ़ी के मन की भावनाओं का रंग बदल गया है, क्योंकि मुहब्बत की जुबां बदल गई है। संग्रह की 15 कहानी अलग-अलग मूड की हैं। स्त्री पात्र बोल्ड और वर्जना रहित हैं। क्योंकि वे मेट्रो सिटी की हैं, मगर संवेदनशील हैं। स्त्री-पुरुष के रिश्तों के दोनों छोर की भंगिमा के साथ संवाद मन मोह लेते हैं। इश्क-मुहब्बत के मामले में लगातार समाज में आ रहे बदलाव को रेखांकित करती कहानियां, हांफती नहीं।

कहानी स्त्री विमर्श के दायरे में है, इसलिए यह कहानी संग्रह मूल्यांकन के लिए चुनौती से कम नहीं है। पहली कहानी ‘कितनी दूरियां’ में चाहत की ऐसी अभिव्यंजना है जो पढ़ते-पढ़ते सोचने को विवश कर देती है कि क्या मुहब्बत का भी कोई मजहब होता है? या मुहब्बत खुद एक मजहब है..! ‘एक कतरा मुहब्बत’ बदलती शहरी सभ्यता में मुहब्बत की दास्तां है। युवा बेटी मां से किए गए वायदे पर, अपने पिता की पूर्व प्रेमिका को उनसे मिलवाती है। कहानी के कुछ संवाद दिल में जगह बना लेते हैं। ‘बहुत लोग जिंदगी में लघुकथा की तरह आते हैं और जब जाते हैं, तो उपन्यास की दास्तां छोड़ जाते हैं।’ राइट परसन, इश्क में खजुराहो होना, जिंदगी की बैलेंस शीट, दूसरी मुहब्बत आदि कहानियों को पढ़ने से ऐसा लगता है, मानो कामदेव ने कागज पर संवाद लिखे हों। लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली लड़कियों के बड़े ख्वाब है’ ‘बेशर्म दिल’ से पता चलता है। लिव इन रिलेशन शिप वाली लड़कियों की जिंदगी में ऐसा वक्त आता है,जब उनके पास सिर्फ तन्हाई रह जाती है। अपने ब्वॉय फ्रेंड को अपनी सहेली के पास भेज देती है, ताकि उसकी सहेली का दिल उस पर आ जाए और वह किसी और पर डोरे डाल सके। संग्रह की कहानियों लिखावट और बुनावट उन पाठकों को ज्यादा पसंद आएगी, जो स्त्री-पुरुष के रिश्तों की नई तपिश और नई भाषा के दीवाने हैं।
पुस्तक : इश्क की हरी पत्तियां, लेखक : रमेश कुमार ‘रिपु’, प्रकाशक : प्रलेक प्रकाशन, मुंबई, मूल्य : 228 रुपये


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