- पराग डेयरी की स्थिति अर्थ व्यवस्था हुई डावाडोल
- दूध के प्रोडक्ट बनाकर मार्केट में करता है सेल
- तीन माह से दूध का भुगतान पशुपालकों को नहीं किया जा रहा
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: पराग डेयरी कभी बचत में चलती थी, लेकिन वर्तमान में घाटे में जा रही है। इसकी वजह कुछ भी रही हो, लेकिन फिलहाल पराग डेयरी की स्थिति अर्थ व्यवस्था डावाडोल चल रही है। इसके लिए जिम्मेदार कौन है? पराग डेयरी एक सरकारी संस्थान है, जो यूपी में है। यह संस्थान पशुपालक किसानों से सीधे दूध खरीदता है और दूध के प्रोडक्ट बनाकर मार्केट में सेल करता है।
पराग डेयरी दुग्ध संघ की पूर्व चेयरमैन इंद्रेश गुर्जर का दावा है कि जब उनका कार्यकाल पूरा हुआ तब पराग डेयरी 3.50 करोड़ के बचत में चल रही थी, लेकिन ऐसा क्या हुआ कि डेयरी अचानक घाटे में चली गई। इसके लिए पराग डेयरी के अधिकारी पूरी तरह से जिम्मेदार है। उन्होंने घाटे के बिंदुओं को लेकर समीक्षा क्यों नहीं की। तीन-तीन माह से दूध का भुगतान पशु पालक किसानों को नहीं किया जा रहा है।
ऐसी स्थिति पराग दुग्ध संघ के सामने कभी नहीं आई। कुछ ऐसे भी बिंदु सामने आए हैं कि डेयरी के टेंडरों को भी धनराशि बढ़ा कर छोड़ा गया, जो काम कम धनराशि में हो जाता था उस पर ज्यादा धन खर्च किया जा रहा है। इसी वजह से डेयरी लगातार घाटे में जा रही है। अब हालत यह हो गई है कि पिछले तीन माह का पशु पालकों से खरीदे गए दूध का भुगतान पराग दुग्ध संघ नहीं कर पा रहा है।
तीन माह का भुगतान पशुपालकों का डेयरी पर रुका हुआ है। ऐसे में पराग डेयरी की साख भी खराब हो रही है। कभी भुगतान अपडेट रहता था, लेकिन ऐसी स्थिति क्यों आई। तीन माह का दूध का भुगतान भी किसानों को नहीं किया जा रहा है। यही हालत चलती रही तो और भी स्थिति बिगड़ सकती हैं।
पशु पालन विभाग के अधिकारी इसको लेकर ध्यान नहीं दे रहे हैं। पराग एक शानदार संस्थान था, जिसके माध्यम से किसान की अर्थ व्यवस्था भी बेहतर चलती थी, लेकिन कुछ समय से स्थिति बदल गई है। अब किसान भुगतान लेने के लिए चक्कर लगा रहे हैं, मगर भुगतान नहीं मिल पा रहा है।
उधर, प्राइवेट दूध कंपनियां इसका लाभ उठा रही हैं। क्योंकि मार्केट में पराग की शाख गिर रही हैं। प्रत्येक सप्ताह दूध का भुगतान किया जाना चाहिए, मगर भुगतान तीन माह लटक गया हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पराग की अर्थ व्यवस्था बिगड़ गयी हैं। इसकी वजह जो भी हो, मगर किसान भी इसको लेकर चिंतित हैं। प्राइवेट कंपनी तो किसान का शोषण करती ही है, लेकिन पराग पर किसानों का भरोसा था, उसकी भी स्थिति अर्थ व्यवस्था खराब हो गई हैं।

