Wednesday, May 29, 2024
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चुनाव से पहले बंटवारे के मुद्दे पर गरमाएगी वेस्ट यूपी में सियासत

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  • पश्चिमी उत्तर प्रदेश विकास मंच का खाका तैयार
  • अक्टूबर में मेरठ में बड़ी जनसभा, यूपी वेस्ट के नाम से बने वाट्सऐप ग्रुप में 875 लोग, फेसबुक पेज भी रिलीज
  • गाजियाबाद में कोर कमेटी की बैठक में फैसला, सितंबर में पश्चिम के सभी जिलों में बनेगी कोआर्डिनेशन कमेटी

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: लोकसभा चुनाव से पहले यूपी के बंटवारे का मुददा एक बार फिर गरमाएगा। इसके लिए पश्चिमी उप्र विकास मंच के बैनर तले अक्तूबर में मेरठ में एक विशाल जनसभा करने की तैयारी हो रही है। शनिवार को गाजियाबाद में हुई कोर कमेटी की बैठक में तय हुआ कि पश्चिमी यूपी के 27 जिलों में सितंबर माह में कोआर्डिनेशन कमेटी का गठन कर लिया जाएगा। इसके लिए एक वाट्सऐप ग्रुप बनाया गया है जिसमें 875 सदस्य जुड़ चुके हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश विकास मंच का फेसबुक पेज भी रिलीज कर दिया गया है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश विकास मंच की कोर कमेटी ने 26 अगस्त को गाजियाबाद के होटल पैसिफिक में प्रदेश विभाजन के मुद्दे पर आंदोलन को हवा देने की रणनीति तैयार की। चौधरी तेजपाल सिंह की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में वक्ताओं ने सर्वसम्मति से कहा कि अलग राज्य बनने से ही पश्चिमी यूपी में बेरोजगारी, चिकित्सा, शिक्षा, कानून व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, उद्योग और व्यापार से जुड़े सवालों को हल किया जा सकता है। हापुड़ के कारोबारी विनय बंसल इस आंदोलन को नेतत्व देंगे। जाट आरक्षण आंदोलन से सुर्खियों में आए यशपाल मलिक भी प्रदेश विभाजन के इस मुद्दे से जुड़ेंगे।

इन 27 जिलों को पश्चिम प्रदेश में शामिल करने की मांग

सहारनपुर, मुजफफरनगर, शामली, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, गौतमबुदनगर, बुलंदशहर, हापुड़, अलीगढ़, एटा, हाथरस, कासगंज, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, मथुरा, मुरादाबाद, बिजनौर, अमरोहा, रामपुर, संभल, बरेली, बदायूं, पीलीभीत, शाहजहांपुर, फरुर्खाबाद।

पहली बार बंटवारे की मांग चौधरी चरण सिंह ने उठाई थी

सबसे पहले चौधरी चरण सिंह ने 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग के समक्ष वेस्ट यूपी को अलग राज्य मनाने की मांग रखी थी। तब 97 विधायकों ने भी मांग पत्र का समर्थन किया था। राज्य के बंटवारे के प्रस्ताव पर आयोग के सदस्यों ने संस्तुति भी दी थी। जब 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी तो उस समय यह तय हो गया था कि अब उत्तर प्रदेश का पश्चिमी भाग एक अलग राज्य में तब्दील किया जाएगा।

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इसके लिए 1978 में विधायक सोहन लाल सिंह ने वेस्ट यूपी को अलग राज्य बनाने का प्रस्ताव विधानसभा में रखा, लेकिन केंद्र की मर्जी के बगैर यह संभव नहीं हो पाया। चौधरी अजीत सिंह ने 90 के दशक में यूपी के बंटवारे की मांग करते हुए हरित प्रदेश के गठन का मुद्दा उठाया। चौधरी अजित सिंह इस मामले को संसद तक ले गए। पर्याप्त राजनीतिक एवं सामाजिक दबाव न बन पाने की वजह से हरित प्रदेश का मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

मायावती ने 2011 में यूपी को 4 हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव कराया था पास

यूपी में 2012 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव विधानसभा में पास कर केंद्र सरकार को भेज दिया था। पूर्वांचल, पश्चिम प्रदेश, अवध प्रदेश और के गठन के प्रस्ताव को 16 नवंबर 2011 मंत्रिपरिषद की बैठक में मंजूरी दी गई। इसके बाद 21 नवंबर को बंटवारे का प्रस्ताव विधानसभा में पास करा सत्र को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया।

मायावती सरकार के प्रस्ताव के मुताबिक पूर्वाचल में 32, पश्चिम प्रदेश में 22, अवध प्रदेश में 14 और बुंदेलखंड में 7 जिले शामिल होने थे, लेकिन तत्कालीन केंद्र सरकार ने कई स्पष्टीकरण मांगते हुए प्रस्ताव लौटा दिया। तब यूपी में समाजवादी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और कुछ अन्य दलों ने मायावती के इस प्रस्ताव का विरोध किया था। मायावती का कार्ड नहीं चला और बंटवारे के विरोध में खड़ी सपा 2012 के चुनाव में सत्ता में आ गई।

ऐसे होता विभाजन

मायावती के प्रस्ताव के मुताबिक प्रदेश का बंटवार होता तो पूर्वांचल में 24 जिले आते। इनमें वाराणसी, गोरखपुर, बलिया, देवरिया, आजमगढ़, बस्ती जैसे जिले उल्लेखनीय हैं। इसी तरह बुंदेलखंड राज्य बता तो तीन मंडल और झांसी, महोबा, बांदा, हमीरपुर, ललितपुर, जालौन जैसे जिले 11 जिले शामिल होते। पश्चिम प्रदेश बनने पर आगरा, अलीगढ़, मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद, बरेली जैसे जिले शामिल होते। अवध प्रदेश में लखनऊ, देवीपाटन, फैजाबाद, इलाहाबाद, कानपुर इसके हिस्से होते।

मायावती के प्रस्ताव पर केंद्र ने उठाए थे ये सवाल

मायावती ने विधानसभा में पास करा बंटवारे का प्रस्ताव केंद्र को भेजा तो इस पर कई सवाल खड़े हो गए। केंद्रीय गृहमंत्रालय ने उत्तर प्रदेश सरकार से स्पष्ट करने को कहा कि नए राज्यों की सीमाएं कैसी होंगीं, उनकी राजधानियां कहां बनेंगीं और भारतीय सेवा के जो अधिकारी उत्तर प्रदेश में काम कर रहे थे,

उनका बंटवारा उन चार राज्यों में किस तरह से होगा। सबसे अहम सवाल केंद्र सरकार ने ये पूछा था कि देश के सबसे अधिक आबादी वाले प्रदेश पर जो भारी भरकम कर्ज़ है, उसका बंटवारा किस तरह होगा। केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश सरकार से ये भी पूछा था कि वह वेतन के बोझ को किस तरह से बांटना चाहेगी।

छोटे राज्यों से जुड़े कुछ तथ्य

उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना जैसे तमाम राज्यों को अस्तित्व में लाने की प्रक्रिया कांग्रेस के कार्यकाल में पुख्ता हुई और भाजपा के शासनकाल में मंजूर हुई। वर्ष 1953 में स्टेट आॅफ आंध्र पहला राज्य बना, जिसे भाषा के आधार पर मद्रास स्टेट से अलग किया गया था। इसके बाद दिसंबर 1953 में जवाहर लाल नेहरू ने न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में पहले राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया।

एक नवम्बर 1956 में फजल अली आयोग की सिफारिशों के आधार पर राज्य पुनर्गठन अधिनियम-1956 लागू हो गया और भाषा के आधार पर देश में 14 राज्य और सात केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए। मध्य प्रांत के शहर नागपुर और हैदराबाद के मराठवाड़ा को बॉम्बे स्टेट में इसलिए शामिल किया गया, क्योंकि वहां मराठी बोलने वाले अधिक थे। त्रिपुरा को असम से भाषा के आधार पर अलग किया गया तो मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और नगालैंड का गठन नस्ल के आधार पर किया गया। सन 2000 में उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ को अलग प्रदेश बनाया गया।

एक छोर से दूसरा 1100 किमी दूर

यूपी की आबादी करीब 25 करोड़ है. इसके एक छोर से दूसरे छोर के बीच की दूरी करीब 11 सौ किलोमीटर है। ऐसे में विकास योजनाओं को गति देने और आम जनता की सहूलियत के लिए इसे बांटने की वकालत की जा रही है। यूपी का एक बंटवारा 9 नवंबर 2000 को किया जा चुका है। जिसके बाद भारत के मानचित्र पर उत्तराखंड नाम से एक नए सूबे का उदय हुआ था।

केंद्र को है नया प्रदेश बनाने का अधिकार

संविधान के जानकारों के अनुसार किसी भी प्रदेश का बंटवारा या उसकी सीमाओं को बदलने का काम केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। संविधान के अनुच्छेद 3 में केंद्र सरकार को नए राज्यों के निर्माण और वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन का अधिकार दिया गया है।

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