Wednesday, September 22, 2021
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Homeसंवादसामयिक: प्रकृति के लिए खतरा है ई-कचरा

सामयिक: प्रकृति के लिए खतरा है ई-कचरा

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पंकज चतुर्वेदी

18 जनवरी को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को देश में जहर की तरह फैल रहे ई-कचरे के निस्तारण का वैज्ञानिक प्रबंधन सुनिश्चित करने का निर्देश देते हुए कहा कि पर्यावरण से जुड़े अपराध किसी हमले की ही तरह गंभीर अपराध हैं और इन पर माकूल कार्यवाही करने में प्रशासन नाकाम रहता है। एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति एके गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि ई-कचरा नियमों की क्रियान्वयन  के प्रति पूरा तंत्र लापरवाह हैं और इससे आम नागरिकों का जीवन संकट में हैं। यह बात दुखद है कि हरित न्यायालय की पीठ को यह कहना पड़ा है कि उच्च अधिकारियों को ई-कचरा निस्तारण के अवैध तरीकों से उपज रहे पर्यावरणीय संकट के कारण स्वास्थ्य पर होने वाले प्रतिकूल प्रभावों की पर्याप्त चिंता नहीं है।
यह मामला कोई चार साल से एनजीटी के समक्ष चल रहा है। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में रामगंगा नदी के तट पर पड़े इलेक्ट्रॉनिक कचरे (ई-कचरा) में क्रोमियम और कैडमियम जैसे विषैले रसायन पाए जाने के बाद एनजीटी की ओर से गठित एक समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी थी। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने चार जगहों-लालबाग, दशवनघाट, नवाबपुरा और बर्बवालां से ई-कचरे के नमूने जुटाए थे। ई-कचरा काले रंग के पाउडर के रूप में था। भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान ने इन सैंपल की जांच की। जांच रिपोर्ट में काले रंग के पाउडर में क्रोमियम, कैडमियम, तांबा, सीसा, निकल, मैंगनीज और जस्ता मौजूद होने के संकेत मिले।
आज देश में लगभग 18.5 लाख टन ई- कचरा हर साल निकल रहा है। इसमें मुंबई से सबसे ज्यादा एक लाख बीस हजार मीट्रिक टन, दिल्ली से 98 हजार मीट्रिक टन और बंगलूरू से 92 मीट्रिक टन कचरा है। दुर्भाग्य है कि इसमें से महज ढाई फीसदी कचरे का ही सही तरीके से निबटारा हो रहा है। बाकि कचरा अवैध तरीके से निबटने के लिए छोड़ दिया जाता है। यदि गैर सरकारी संगठन ‘टाक्सिक लिंक’ की रिपोर्ट पर भरोसा करें तो दिल्ली में सीलमपुर, शास्त्री पार्क, तुर्कमान गेट, मंडोली, लोनी, सीमापुरी सहित कुल 15 ऐसे स्थान हैं  जहां सारे देश का ई-कचरा पहुंचता है और वहां इसका गैर-वैज्ञानिक व अवैध तरीके से निस्तारण होता है। इसके लिए बड़े स्तर पर तेजाब या अम्ल का इस्तेमाल होता है और उससे वायु प्रदूषण के साथ-साथ धरती के बंजर होने और विषैले तरल के कारण यमुना नदी के जल के जहरीले होने का प्रारंभ हो चुका है।
टीवी व पुराने कम्प्यूटर मॉनिटर में लगी सीआरटी (केथोड रे ट्यूब) को रिसाइकल करना मुश्किल होता है। इस कचरे में लेड, मरक्युरी, केडमियम जैसे घातक तत्व भी होते हैं। दरअसल ई-कचरे का निपटान आसान काम नहीं है, क्योंकि इसमें प्लास्टिक और कई तरह की धातुओं से लेकर अन्य पदार्थ रहते हैं। सबसे खतरनाक कूड़ा तो बैटरियों, कंप्यूटरों और मोबाइल का है। इसमें पारा, कोबाल्ट, और न जाने कितने किस्म के जहरीले रसायन होते हैं। कैडमियम से फेफड़े प्रभावित होते हैं, जबकि कैडमियम के धुएं और धूल के कारण फेफड़े व किडनी दोनों को गंभीर नुकसान पहुंचता है। एक कंप्यूटर का वजन लगभग 3.15 किलो ग्राम होता है। इसमें 1.90 किग्रा सीसा और 0.693 ग्राम पारा और 0.04936 ग्राम आर्सेनिक होता है, जो जलाए जाने पर सीधे वातावरण में घुलते हैं। इनका अवशेष पर्यावरण के विनाश का कारण बनता है।
भारत में यह समस्या लगभग तीन दशक पुरानी है, लेकिन सूचना प्रौद्योगिकी के चढ़ते सूरज के सामने इसे पहले गौण समझा गया, जब इस पर कानून आए तब तक बात हाथ से निकल चुकी थी। आज देश के कुल ई कचरे का लगभग 97 फीसदी कचरे को अवैज्ञानिक तरीके से जला कर या तोड़ कर कीमती धातु निकाली जाती है व शेष को यूं ही कहीं फेंक दिया जाता है। इससे रिसने वाले रसायनों का एक अद्श्य लेकिन भयानक तथ्य यह है कि इस कचरे कि वजह से पूरी खाद्य श्रंखला बिगड़ रही है। ई -कचरे के आधे-अधूरे तरीके से निस्तारण से मिट्टी में खतरनाक रासायनिक तत्व मिल जाते हैं, जो पेड़-पौधों के अस्तित्व पर खतरा बन रहा है। इसके चलते पौधों में प्रकाश संशलेषण की प्रक्रिया ठीक से नहीं हो पाती है, जिसका सीधा असर वायुमंडल में आॅक्सीजन की मात्रा पर होता है। इतना ही नहीं-पारा, क्रोमियम, कैडमियम, सीसा, सिलिकॉन, निकेल, जिंक, मैंगनीज, कॉपर आदि भूजल पर भी असर डालते हैं।
अकेले भारत ही नहीं पूरी दुनिया के लिए इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का इस्तेमाल भले ही अब अनिवार्य बन गया हो, लेकिन यह भी सच है कि इससे उपज रहे कचरे को सही तरीके से नष्ट (डिस्पोज) करने की तकनीक का घनघोर अभाव है। घरों और यहां तक कि बड़ी कंपनियों से निकलनेवाला ई-वेस्ट ज्यादातर कबाड़ी उठाते हैं। वे इसे या तो किसी लैंडफिल में डाल देते हैं या फिर कीमती मेटल निकालने के लिए इसे जला देते हैं, जो और भी नुकसानदेह है। इसमें से धातु निकालने के बाद बचा हुआ ऐसिड या तो जमीन में डाल दिया जाता है या फिर आम नालियों में बहा दिया जाता है। वैसे तो केंद्र सरकार ने सन 2012 में ई-कचरा(प्रबंधन एवं संचालन नियम) 2011 लागू किया है, लेकिन इसमें दिए गए दिशा-निर्देश का पालन होता दिखता नहीं है। मई-2015 में ही संसदीय समिति ने देश में ई-कचरे के चिंताजनक रफ्तार से बढ़ने की बात को रेखांकित करते हुए इस पर लगाम लगाने के लिए विधायी एवं प्रवर्तन तंत्र स्थापित करने की सिफारिश की थी।
ऐसा भी नहीं है कि ई-कचरा महज कचरा या आफत ही है। झारखंड के जमशेदपुर स्थित राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला के धातु निष्कर्ष्ण विभाग ने ई-कचरे में छुपे सोने को खोजने की सस्ती तकनीक खोज ली है। इसके माध्यम से एक टन ई-कचरे से 350 ग्राम सोना निकाला जा सकता है। जानकारी है की मोबाइल फोन पीसीबी बोर्ड की दूसरी तरफ कीबोर्ड के पास सोना लगा होता हैं। अभी यह भी समाचार है कि अगले ओलंपिक में विजेता खिलाड़ियों को मिलने वाले मैडल भी ई-कचरे से ही बनाए जा रहे हैं। जरूरत बस इस बात की है कि कूड़े को गंभीरता से लिया जाए, उसके निस्तारण की जिम्मेदारी उसी कंपनी को सौंपी जाए जिसने उसे बेच कर मुनाफा कमाया है और ऐसे कूड़े के लापरवाही से निस्तारण को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा जाए।

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