Saturday, May 16, 2026
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काम पर नहीं, राम का भरोसा

 

 

Nazariya 13


Tanveer Jafreeनावी गहमागहमी के वातावरण के बीच पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में भ्रमण करने का अवसर मिला। सरकार द्वारा जिस विकास का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, उसका तो कहीं दूर तक नाम-ओ-निशान नहीं दिखाई दिया। शहरों व कस्बों में वही टूटी-फूटी धूल भरी सड़कें, जगह-जगह सड़कों व चौराहों पर लावारिस पशुओं के कब्जे, जाम पड़े सड़ांध मारते नाले व नालियां, आम लोगों के चेहरों पर छाई मायूसी, युवाओं में अपने कैरियर के प्रति असुरक्षा का भय, महंगाई से दुखी जनता की पीड़ा, गरीबी सब कुछ साफ नजर आता है। परंतु इन धरातलीय स्थिति के बावजूद इन्हीं सड़कों पर सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रदेश में हजारों की संख्या में बड़े से बड़े इश्तेहारी फ़्लेक्स लगवाकर यह दावा किया गया है कि ‘सोच ईमानदार-काम दमदार= फिर एक बार-भाजपा सरकार’। यह दावा इश्तेहार के नीचे के हिस्से में छपा है जबकि ऊपरी भाग में लिखा है-फर्क साफ है-तब-राम लला थे टैंंट में=अब-भव्य राम मंदिर का निर्माण। ‘तब’ का अर्थ, जब भाजपा सत्ता में नहीं थी और अब का अर्थ है कि भाजपा के शासन में मंदिर का निर्माण हो रहा है। गोया भाजपा अदालती फैसले के बजाये राम मंदिर निर्माण का श्रेय स्वयं लेने को तत्पर है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को चूंकि राजनैतिक विश्लेषक इस नजरिये से भी देख रहे हैं कि यदि बंगाल की तरह उत्तर प्रदेश में भी भाजपा का विजय रथ अवरोधित हो गया तो 2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम भी प्रभावित हो सकते हैं। लिहाजा उत्तर प्रदेश जीतने के लिए ही मतदाताओं विशेषकर धर्म के आधार पर बहुसंख्यक मतदाताओं को लुभाने के लिए ही इस तरह के इश्तेहार अभियान चलाये गए हैं। प्रदेश में वाहनों में लाउडस्पीकर पर नारे लगाये जा रहे हैं कि ‘अयोध्या तो झांकी है, काशी-मथुरा बाकी है।’ राजनैतिक विद्वेष भरे इस चुनाव में भाजपा केवल यही श्रेय मात्र नहीं ले रही कि राम मंदिर हमने बनवाया है, बल्कि वह जनता को इस बात के लिए भी गुमराह कर रही है कि यदि समाजवादी पार्टी सत्ता में आ गयी तो वह मंदिर निर्माण में बाधा खड़ी करेगी। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के जालौन में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जहां अपने विरोधियों पर निशाना साधते हुये तमाम बातें कहीं वहीं उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष राम मंदिर का निर्माण नहीं चाहता। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव इस इंतजार में हैं कि उनकी सरकार बने और राम मंदिर का निर्माण रोक दिया जाए।

इसके पहले भी भाजपा की इसी रणनीति के तहत कुछ समय पूर्व सोशल मीडिया पर यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के फर्जी ट्वीट की एक फोटो वायरल की गई थी, जिसमें लिखा गया था, ‘उत्तर प्रदेश में अगर हमारी सरकार बनी, तो हम अपने मुस्लिम भाइयों से यह वादा करते हैं कि बाबरी मस्जिद का निर्माण उसी स्थान पर करायेंगे, जहां पर आज राम मंदिर का निर्माण हो रहा है।’ जांच करने पर पता चला था कि यह एक फर्जी ट्वीट का स्क्रीन शॉट था।इसी प्रकार उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने तो अपने पद व कद के अनुसार एक और बड़ा बयान यह दे डाला, ‘अखिलेश यादव राम मंदिर पर बुलडोजर चलाने के लिए सत्ता में आना चाहते हैं।’ इतना भड़काऊ व गैर जिम्मेदाराना बयान देने से साफ जाहिर होता है कि इस बार फिर चुनाव काम नहीं बल्कि ‘राम’ भरोसे ही है।

वैसे भी पिछले पूरे वर्ष भर चले किसान आंदोलन के बाद विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जिस तरह किसानों का भाजपा से मोहभंग हुआ है और इसके साथ ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट-मुस्लिम एकता एक बार फिर से सामने आई है, उसे देखकर भी भाजपा के हाथ पांव फूले हुए हैं। देश के सबसे बड़े व अयोध्या-काशी-मथुरा जैसे प्रमुख तीर्थों के राज्य, उत्तर प्रदेश में ध्रुवीकरण की राजनीति करना भाजपा के लिए पहले भी फायदेमंद ही साबित हुआ है। यही वह राज्य है जहां 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘कब्रिस्तान बनाम श्मशान’ का ‘विराट दर्शन’ प्रस्तुत किया था। और इस बार फिर हिन्दू मुस्लिम व मंदिर मस्जिद के तरह तरह के नये नये ‘दर्शन’ पेश किये जा रहे हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे योगी आदित्य नाथ स्वयं कह रहे हैं कि इस बार ‘मुकाबला अस्सी बनाम बीस है’। बीस प्रतिशत से उनका तात्पर्य क्या हो सकता है? इन दिनों भाजपा नेताओं के भाषणों के पसंदीदा शब्द अब्बा जान, जिन्ना, जालीदार टोपी, पाकिस्तान आदि यही सब रह गये हैं। अपने विज्ञापनों में भी सरकार जब अपराधी माफिया को समाप्त करने का उल्लेख करती है तो उसे अतीक अहमद व मुख़्तार अंसारी जैसे चेहरे ही दिखाई दिए विकास दूबे का नाम नजर नहीं आया।

कहा तो यही जाता है कि असीम (भगवान) को सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है। जो लोग भगवान अथवा महापुरुषों को धर्म अथवा वर्ग विशेष तक सीमित रखने का प्रयास करते हैं, वे दरअसल असीम को सीमित करने की ही चेष्टा करते हैं। राम-मुहम्मद-ईसा-नानक जैसे महापुरुषों को किसी धर्म विशेष की संपत्ति कैसे माना जा सकता है। परंतु भाजपा ने तो सीमित क्या बल्कि भगवान राम को इतना अति सीमित कर दिया है कि गोया राम देश के समस्त हिंदुओं के भी नहीं, बल्कि केवल भाजपाई हिंदुओं के ही आराध्य हैं। और जो दल या नेता भाजपा की विचारधारा से सहमत नहीं या चुनावों में इनका विरोधी है वह इनकी नजरों में राम विरोधी ही नहीं बल्कि राम द्रोही भी है। चुनावी प्रचार का यह तल्ख अंदाज फिलहाल तो यही बता रहा है कि इस बार भी भाजपा उत्तर प्रदेश में काम नहीं बल्कि फिर राम के ही भरोसे है। लेकिन जनता काम देखना चाहती है।


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