Wednesday, May 6, 2026
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मानवीय संवेदनाएं जगाती लघुकथाएं

Ravivani 32


देश के विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अंजू निगम की लघुकथाएं निरंतर प्रकाशित हो रही हैं। कुछ साझा लघुकथा संग्रहों में भी अंजू निगम की लघुकथाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। सांझा दर्द अंजू निगम का पहला लघुकथा संग्रह है। इस संकलन में 85 लघुकथाएं संकलित हैं। अंजू निगम ने इस संग्रह की लघुकथाओं में मानवीय संवेदना, सामाजिक सरोकार और पारस्परिक संबंधों का ताना-बाना प्रस्तुत किया है। इनकी लघुकथाएं हमारे आसपास की हैं। इस संग्रह की रचनाएं अपने आप में मुकम्मल और उद्देश्यपूर्ण हैं और पाठकों को मानवीय संवेदनाओं के विविध रंगों से रूबरू करवाती हैं।

जब घर की बड़ी बेटी अपनी मर्जी से शादी कर लेती है तो बेटी के माता-पिता के मन की व्यथा, उनकी वेदना, विवशता और लाचारी को स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है लघुकथा खत में। आधुनिक बेटा में बेटे की संवेदनहीनता का चित्रण है। आधुनिक तकनीक ने बच्चों को संवेदना शून्य बना दिया है। धुंध नारी जीवन की तल्ख सच्चाइयों से रूबरू करवाती है। अतिक्रमण रचना में स्त्री पात्र की बदलती सोच को दिखाया गया है। इस लघुकथा को पढ़ने के पश्चात नेह का सशक्त, साहसी, स्पष्टवादी और गरिमामय व्यक्तित्व मन-मस्तिष्क पर छा जाता है। इस संग्रह की एक सशक्त लघुकथा है मां, जिसे पढ़कर मालूम होता है मां कौनसी भी हो, मां ही होती है। नासूर लघुकथा एक मां की पीड़ा को बयां करती है। संवाद अकेलेपन से उबरते वृद्ध दंपत्ति की लघुकथा है।

बराबरी लघुकथा में पुरुष मानसिकता के स्पष्ट दर्शन हैं। और सूरज छिप गया स्त्री पीड़ा को अभिव्यक्त करती है। महादान, रिश्ते, जिंदगी एक धूप जैसी लघुकथाएं करुणा, मानवीय चेतना, परोपकार का संदेश देती हैं। भूख, ईमान की रोटी, बुनकर, वचन जैसी लघुकथाओं में आंचलिक भाषा का प्रयोग किया गया है जिससे ये लघुकथाएं बहुत प्रभावी बनी हैं। चिल्लर, एक बोतल पानी, हालात, पंडिता, पड़ोसन, चेहरे, बालकनी, शहीद, पर्सनल स्पेस, प्रश्न, जीत, भविष्य जैसी लघुकथाएं लंबे अंतराल तक जेहन में प्रभाव छोड़ती हैं। सांझा दर्द, सीख, उपेक्षा, उम्र, मंथन, काश, कर्ज, मुखौटा, प्रमोशन जैसी लघुकथाएं यथार्थवादी जीवन का सटीक चित्रण हैं। 104 पेजों में समाया लघुकथा संग्रह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि लघुकथाओं के माध्यम से भी बड़े संदेश दिए जा सकते हैं।

पुस्तक : सांझा दर्द, लेखिका : अंजू निगम, प्रकाशक : राघव प्रकाशन, इंदौर, मूल्य : 200 रुपये


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