Sunday, May 31, 2026
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झूठी शान में निष्ठुर बनता समाज

Samvad 1


sonam lovevanshiपिछले दिनों हमारे समाज में दो ऐसी घटनाएं घटित हुई, जिसने आधुनिक होते समाज की कलई खोलकर रख दी। पहली घटना देश के दिल कहलाने वाले मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर की है। जहां एक हिंदू लड़की ने मुस्लिम लड़के से परिवार के विरुद्ध जाकर शादी की तो घरवालों ने लड़की का नर्मदा नदी के तट पर पिंडदान कर दिया। दूसरी घटना राजस्थान के रतनपुरा में घटी। यहां एक युवती ने अपने ही समाज के एक युवक से भागकर शादी कर ली। तो परिजनों ने आन, बान और शान में पहले तो बेटी की मृत्यु का शोक पत्र छपवाया और फिर मृत्यु भोज करवाकर जीवित बेटी का 12 दिन का शोक मनाया। ये हाल में घटित हुई दो घटनाएं भले हैं, लेकिन हमारे समाज को आईना दिखाने के लिए काफी हैं।

ऐसी घटनाएं कोई पहली और आखिरी नहीं हैं और हम कितना भी आधुनिक होने का दंभ भर लें। हमारा खान-पान, रहन-सहन और पहनावा कितना भी आधुनिक क्यों ना हो? लेकिन ये आधुनिक होते समाज की सच्चाई है कि प्रेम जैसे मुद्दे पर हमारा समाज आज भी दकियानूसी सोच रखता है।

प्रेम शब्द को पवित्र माना जाता है, लेकिन झूठे मान में फंसे समाज के लोग कई मर्तबा अपनों की हत्या तक कर देते हैं। झूठी शान में ऐसी हत्याओं की संख्या भी आधुनिक होते समाज में बढ़ती जा रही है। जबलपुर और रतनपुरा मामले में लड़की की मौत तो नहीं हुई, लेकिन जीते-जी किसी का पिंडदान हो या मृत्यु का शोक पत्र छपे तो असल मायनों में यह वास्तविक मौत से कहीं अधिक पीड़ादायक और मानवीय मूल्यों के शिथिल पड़ जाने की बानगी पेश करता है।

एक बार मृत्यु हो जाने के बाद व्यक्ति को इस बात का भान नहीं होता कि उसके साथ क्या और कैसे हो रहा? उसके अपने उसके साथ क्या सलूक कर रहे हैं, लेकिन जीते-जी अपनी मौत का आभास अपने लोग ही कराएं तो यह सभ्यता और संस्कृति पर सवालिया निशान खड़े कर रहा है।

प्रेम निश्छल होता है। वह तो मात्र एक भाव है, जो किसी के प्रति उमड़ सकता है, लेकिन झूठी शान की खातिर जीते-जी पिंडदान या मौत के घाट उतार देना एक आधुनिक समाज की निशानी कतई नहीं हो सकती है। यह समाज में बढ़ती दकियानूसी मानसिकता ही कही जाएगी।

किसी लड़की के समाज से इतर जाकर प्रेम करने पर लड़की को मार देना या उसका जीते-जी पिंडदान कर देना। एक खोखले और मूल्यविहीन होते समाज की पहचान है, क्योंकि यह वही समाज है। जहां लड़कों के लिए अक़्सर यह कहते हुए देखा जाता है कि कोई लड़की पसंद आए तो उसे भगा ले जाना या ज्यादा हुआ तो लड़की के परिजनों को देख लेंगे।

अब ऐसे दोयम दर्जे की सोच वाले समाज को देखकर सहसा यही प्रश्न उठता है कि आखिर सारे आदिम संस्कार और मर्यादाएं महिलाओं के हिस्से में ही क्यों लिख दी जाती हैं? स्त्री समाज ने हमेशा से कुछ न कुछ त्याग और बलिदान दिया है और अगर इक्कीसवीं सदी में भी उसे अपना जीवनसाथी चुनने और प्रेम करने का अधिकार नहीं।

फिर हम सच पूछिए तो किसी बर्बर युग में ही जी रहे हैं। इसे मानने और समझने में संकोच नहीं करना चाहिए। परम्पराओं, रीति-रिवाजों और मान के अभिमान में आखिर कब तक महिलाओं-बेटियों का गला दबाया जाता रहेगा? कब तक वो प्रेम करने की सजा पिंडदान के रूप में भुगतती रहेंगी?

संविधान गरिमामय जीवन जीने की स्वतंत्रता हर एक नागरिक को देता है और एक निश्चित उम्र के बाद कोई भी अपना स्वतंत्र फैसला ले सकता है। फिर किसी से शादी कर लेने मात्र से किसी बहन-बेटी की हत्या कर देना या जीते- जी मृत घोषित कर देना कहीं न कहीं संवैधानिक अधिकारों का हनन है।

झूठी शान हेतु की गई हत्या या जीवित को मृत घोषित कर देना भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों के हनन के अंतर्गत आता है। अनुच्छेद-21 जीवित और मृत दोनों परिस्थितियों में व्यक्तियों के मूलभूत अधिकारों की बात करता है। ऐसे में हमारा समाज कहीं न कहीं झूठी शान में इसे भी चुनौती देने का काम कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रतिवर्ष मान हत्या से संबंधित 5000 मामले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दर्ज किये जाते हैं। जिनमें से तकरीबन 1000 मान हत्या के मामले भारत से जुड़े होते हैं। ये आंकड़े पहली दृष्टि में कम हो सकते हैं, लेकिन इसमें अधिकतर शिकार होने वाली महिलाएं यानी किसी की बहन-बेटी ही होती है।

इतना ही नहीं एक अध्ययन के मुताबिक मान-हत्या में ऐसे अपराधी भी शामिल होते हैं। जो उच्च शिक्षित विश्वविद्यालयी स्नातक होते हैं। विभिन्न सर्वेक्षणों के अनुसार 60 प्रतिशत मान हत्या के अपराधी या तो हाईस्कूल शिक्षित हैं या विश्वविद्यालयी स्नातक है।

ऐसे में एक बात तो तय है कि सिर्फ किताबी ज्ञान एक सभ्य और तर्कसंगत व्यक्ति पैदा नहीं कर सकती है। इसके लिए धर्म के मर्म और मानवीयता के मूल्यों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। साथ ही झूठी शान और मान से बहन-बेटियों को बचाने के लिए कठोर कानूनी प्रावधान और रूढ़िवादी विचारों को तिलांजलि देने की आवश्यकता है।

समाज को यह समझना होगा कि जो बात एक लड़के पर लागू हो सकती है, वही एक लड़की के लिए भी होना चाहिए। लड़का अगर दूसरी जाति में विवाह कर सकता है तो लड़की को वह अधिकार आखिर क्यों नहीं हो? आखिर जो लड़का दूसरे जाति-धर्म या समाज की लड़की से शादी कर रहा। वह भी तो किसी की बेटी ही है। फिर एक ही समाज में दो मानदंड कैसे स्वीकृति पा सकते हैं?


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