Tuesday, May 21, 2024
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घर से निकलकर पार्कों में आए झूले

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  • महिलाओं की हंसी ठिठोलियां घरों में नहीं अब पार्कों में देती है सुनाई
  • गली-मोहल्लों में लगने वाले झूले हुए गुम, आधुनिकता की भेंट चढ़ रहे भारतीय रीति-रिवाज

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: झूला तो पड़ गयो अमवा की डार मा, मोर पपीहा बोले, ऐसे कुछ बुंदले गीत है,जो सावन मास आते ही गली-कूचों और आम के बगीचों में गूंजने लगते थे। साथ मोर, पपीहा और कोयल की मधुर बोली के बीच युवतियां झूलों का लुफ्त उठाया करती थी। मगर अब न तो पहले जैसे आम के बगीचे रहे है और न ही मोर की आवाज सुनाई देती है। क्योंकि आधुनिकता की भेंट चढ़ रहे त्योहारों को महिलाएं या तो घर से बाहर मनाती है या फिर पार्कों में झूले लगते हैं।

जबकि एक समय था जब सावन शुरू होने से पहले ही घरों के आंगन या फिर नजदीकी नीम के पेड़ों पर झूले पड़ जाते थे और महिलाएं अपने घर के कामकाज को निपटा कर झूलने के लिए पहुंच जाती थी। उसके बाद सभी महिलाओं की धमा चकौड़ी सजती और सावन के गीतों की आवाज दूर-दूर तक जाती। मगर आधुनिकता की दौड़ में रीति-रिवाजों का दमन होता जा रहा है। आने वाली पीढ़ियों को बताने के बाद पता चलता है कि पहले ऐसा हुआ करता था।

शगुन था झूला

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डॉ. मंजू गुप्ता बताती है कि युवा अवस्था में सावन का बेसब्री से इंजतार रहता था। सावन आते ही पेड़ पर रस्सियों का झूला डालकर दिनभर झूलते थे और सभी सखियां टोलियां बनाकर सावन के गीत गाती थी। गीत गाकर झूला पर झूलना शगुन माना जाता था। मगर अब बाजारों में मिल रहे सजे झूलों को शगुन के तौर पर प्रयोग किया जा रहा है। जिनकी कीमत 1 हजार रुपये से शुरू है।

शेष बची परंपरा

अब सावन के झूले सभी गली मोहल्लों और पार्कों की बजाय कुछ ही जगहों पर दिखाई देते है। मंदिरों में सावन की एकादशी को भगवान को झूला झूलाने की पंरपरा तो अब भी निभाई जा रही है। साथ ही सावन की थीम पर क्लबों में सावन के गीतों का लुफ्त उठाने के साथ ही प्रतीक रूप में फूलों से सजा संवरा झूला आपको दिख जाएगा। सदर निवासी निवासी रीना सिंघल बताती है कि पहले मंदिरों में लगे पेड़ों पर भगवान श्री कृष्ण को झूला झूलाने की परंपरा थी, लेकिन अब यह रस्म मंदिरों में फूलों का पालना बनाकर निभाई जा रही है।

निभाई जाती है रस्म

सावन के झूले की परंपरा को शहर के महिला क्लब जीवित रखते है। बेगमबाग निवासी प्रतिभा कोठारी बताती है कि हम हर माह एक थीम पार्टी का आयोजन करते हैं। सावन की पार्टी में फूलों से सजे हुए झूले लगाए जाते हैं।

हाथों में हिना महके तो क्या कहना?

आज धूमधाम से हरियाली तीज मनाई जाएगी। महिलाएं अपने सुहाग की लंबी उम्र की कामना के लिए माता पार्वती का पूजन करेगी। वहीं झूले डालकर झूलने और कजरी गाने का भी आज के दिन विशेष महत्व होता है। इसके लिए महिलाओं ने पूरी तैयारी कर ली है। महिलाओं ने एक दिन पहले जमकर हाथों में मेहंदी लगवाई।

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आबूलेन, सदर, बेगमपुल, सेंट्रल मार्किट में देर रात तक महिलाएं हाथों में मेहंदी लगवाने आई। वहीं ब्यूटी पार्लरों में भी महिलाएं की काफी भीड़ देखने को मिली। सिंधारे के लिए गुजियां, मटरी, खुरमा, घेवर आदि खरीदने के लिए भी लोग बाजार पहुंचे।

तीज से होती है हिंदू पर्वों की शुरुआत

सावन का महीना एक साथ कई त्योहार लेकर आता है। जिसमें सबसे खास होती है हरियाली तीज। हरियाली तीज जैसे नाम से ही जाहिर होता है हरियाली की शुरुआत। श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की तृतीय तिथि को विवाहित महिलाएं तीज के रुप में मनाती है। जब प्रकृति अपने पूरे शबाब पर होती है। परंपराओं के अनुसार हरियाली तीज से ही हिंदू पर्वों की शुरुआत होती है।

क्यों मनाई जाती है तीज?

एक बार देवी पार्वती अपने पति भगवान शिव से दूर होकर प्रेम विरह की पीड़ा से व्याकुल थी। इसी तड़प के कारण देवी पार्वती ने इस व्रत को किया था। देवी पार्वती इस दिन पति के प्रेम में इतनी मग्न हो गई कि उन्हेंं न तो खाने की सुध रही और न ही पानी पीने की। इस तरह वह पूरे दिन व्रत रही और इसके फल स्वरूप उन्हें भगवान शिव की कृपा प्राप्त हुई।

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इसलिए तभी से सुहागन स्त्री अपने सुहाग के लिए उपवास रखकर पति की लंबी आयु की कामना करती है। इतना ही नहीं यह महिलाओं के सजने संवरने का भी दिन है। इस दिन महिलाएं नए कपड़े, जेवर, मेहंदी लगाकर पूरा शृंगार करती है।

महिला पार्क में की गई विशेष तैयारियां

बच्चा पार्क स्थित लेडिज पार्क में तीज को लेकर विशेष तैयारियां की गई है। पार्क में वैसे तो आठ झूलों की व्यवस्था पहले से ही की गई हैं, लेकिन तीज को लेकर पार्क में चार और झूले लगाए गए हैं। ताकि महिलाएं तीज का आनंद झूलों के साथ उठा सके।

उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र और सिद्ध योग के शुभ संयोग में आज मनेगी हरियाली तीज

सनातन धर्म में सावन महीना सबसे पवित्र माह माना जाता है। हरियाली तीज का व्रत 19 अगस्त यानि आज मनाई जाएगी। सावन के शुक्ल पक्ष की तीज पर सुहागन महिलाएं पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए ये व्रत रखती हैं और भगवान शिव व माता पार्वती की पूजा करती हैं। सौंदर्य और प्रेम का यह उत्सव भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

सावन के महीने में जब संपूर्ण धरा पर हरियाली की चादर बिछी रहती है, प्रकृति के इस मनोरम क्षण का आनंद लेने के लिए महिलाएं झूले झूलती हैं, लोक गीत गाकर उत्सव मनाती हैं। हरियाली तीज के अवसर पर देशभर में कई जगह मेले लगते हैं और माता पार्वती की सवारी धूमधाम से निकाली जाती है। ज्योतिषाचार्य आचार्य मनीष स्वामी ने बताया कि भाद्रपद शुक्ल तीज को हरतालिका तीज का व्रत रखा जाता है।

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इस व्रत को सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए रखती है। जबकि कुंवारी कन्याएं मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत को रखती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति रूप में पाने के लिए इस व्रत को किया था। देवी पार्वती की घोर तपस्या देखकर भगवान शिव उनके सामने आए और उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसके बाद से ही अविवाहित महिलाएं मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत को करती है जबकि विवाहित महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत करती हैं।

हरियाली तीज का महत्व

आचार्य मनीष स्वामी ने बताया कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हरियाली तीज के दिन ही शिव ने माता पार्वती को उनकी कठोर तपस्या के बाद पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। इसलिए इस दिन को भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मां पार्वती और भगवान शिव शंकर की विधि-विधान के साथ पूजा की जाती है। इस दिन सुबह उठकर स्नान करें।

भगवान शिव को घी, शक्कर या प्रसाद स्थान पर जाकर भगवान शिव के साथ माता पार्वती गणेश, नंदी सहित सपरिवार की प्रतिमा बनाकर स्थापित करना चाहिए। ऐसा करने के बाद गंगाजल और दूध चढ़ाएं, बिल्व (बेल-पत्र) पत्र से अर्पित करना चाहिए। यह शंकर जी को बहुत प्रिय हैं, बिल्व अर्पण करने पर शिवजी अत्यंत प्रसन्न होते हैं, शिवलिंग पर धतूरा, भांग, मलयागिरि चंदन, चावल चढ़ाएं और सभी को तिलक लगाएं, पुष्पों की माला अर्पित करें।

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