Tuesday, April 21, 2026
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समाज के विकास में शिक्षक का अमूल्य योगदान अद्वितीय

ॐ अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

अर्थात! मैं घोर अज्ञान के अन्धकार में उत्पन्न हुआ था, और मेरे गुरु ने अपने ज्ञान रूपी शलाका से मेरी आँखें खोल दीं। मैं उन्हें सादर नमस्कार करता हूँ।

किसी भी सफल व्यक्ति से बात करने पर यह समझा जा सकता है कि उनकी जिन्दगी को दिशा देेने में एक या उससे अधिक शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वास्तव में वह शिक्षक ही है जिसने समय समय पर समाज को दिशा देने का कार्य किया है।

आचार्य चाणक्य, गुरु वशिष्ठ, गुरु द्रोण, गुरू परशुराम के उदाहरण हम सभी के सामने हैं कि किस प्रकार उन्होंने अपने शिष्यों की प्रतिभा को समझ कर हर तरह से सामर्थ्यवान एवं संस्कारयुक्त और साधारण से असाधारण में परिवर्तित किया । फलस्वरुप उन्ही शिष्यों ने विभिन्न क्षेत्रों में असाधारण प्रदर्शन कर अपने गुरू एवं राष्ट्र को गौरवान्वित किया।

आज भी शिक्षक की महत्ता परिवर्तित नही हुई है। आज जब ज्ञान के परिदृश्य में पूरा विश्व तेजी से परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है और वहीं शिक्षक, शिक्षा को उतना ही उपयोगी बनाने व बच्चों में स्वतंत्र सीखने सोचने एवं विचार करने की प्रवृति का निमार्ण कर रहे हैं।

एक और जहाँ शिक्षा, हुनर, आदर्श, विवेक और रचनात्मक क्षमता हासिल करने में मदद करती है वहीं दूसरी ओर आदर्श व्यवहार जैसे संवेदना आदर, परस्पर सहयोग, सभी के विचारों का सम्मान, राष्ट्रप्रेम की भावना एवं संस्कृति के लिए समर्पण की भावना से ओत-प्रोत करती है ताकि हम सोच समझ कर फैसले ले सके, अर्थपूर्ण जीवन जियँ तथा समकालिक समाज में सक्रिय भूमिका अदा कर सकें।

यह समझना भी अत्यंत आवश्यक है कि शिक्षा अनमोल है जिसे खरीदा नही जा सकता। सम्पूर्ण शिक्षा समर्पण, प्रयास और लगातार अभ्यास से ही हासिल हो सकती है।

अभिभावकों एवं विद्यार्थियों में अंकों की अंधी दौड़ विद्यार्थियों की नैसर्गिक प्रतिभा को दरकिनार करके उनको जीवन के कृत्रिम परिवेश की ओर ले जा रही है। उनका अन्य साथियों से ही तुलना करना तथा केवल शिक्षा संस्थानों और अंकों को समाज में अपनी प्रतिभा का मानक मानना जैसी कुछ प्रवृतियां हैं जो विद्यार्थियों, अध्यापकों और शिक्षण संस्थानों को शुद्ध बौद्धिक और सैद्धांतिक स्वायतता से वंचित रखती है।

हमें यह समझना होगा कि बच्चों के सीखने की गति मापने का काई उचित समय व पैमाना नही है। कुछ बच्चे प्राथमिक कक्षाओं में अच्छे होते हैं और बाद में पिछड़ जाते हैं वहीं कुछ बच्चे शुरुआती कक्षाओं में कमजोर होते हैं परन्तु आगे चल कर अच्छा प्रदर्शन करते हैं।

ऐसा यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपने बच्चों को सीखने की कितनी स्वतंत्रता देते हैं। यदि हम अपने बचपन को याद करें तो हमें समझ आएगा कि हमने अपने साथियों के साथ खेल कर उनके साथ उठबैठ कर, झगड़ कर सामाजिकता सीखी है। अतः स्कूलों का महत्व केवल अक्षर, अंक एवं पाठ्यपुस्तक तक सीमित नहीं रह जाता।

कक्षा में अध्यापक कविता को गा कर भी शिक्षा दे सकते हैं या किसी यात्रा के माध्यम से भी ज्ञान दिया जा सकता है। वास्तव में किताब तो एक शुरुआत है। शिक्षक लगातार अभ्यास से पहले पाठ्क्रम की मूल अवधारणाओं को मजबूत करता है एंव उसके बाद बच्चों को स्वतंत्र रूप से ज्ञान की परतों को खोलना सिखाता है। वह शिक्षक ही है जो उन्हें तर्क करना, उन तर्कों का विश्लेषण कर उनके ज्ञान चक्षु खोलता है।

एक बार अगर बच्चों ने किताबो को समझना और तर्क करना सीख लिया फिर उन्हें जीवन का मूल ज्ञान अर्जित करने से कोई नहीं रोक सकता है। और उनका यह ज्ञान न केवल उन्हें एक सुसंस्कृत नागरिक बनाएगा वरन् राष्ट्र निर्मार्ण में भी वे उल्लेखनीय भूमिका निभाएँगे।

ऊर्जा, भोजन, पानी, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं आदि के क्षेत्र में लगातार बढ़ती चुनौतियों को पूरा करने के लिए नए विचारों या नई रिसर्च में एक्सपर्ट की जरूरत बढ़ती जा रही है। ऐसे में बहुत जरूरत है कि हमारी शिक्षण प्रणाली और भी शिक्षार्थी केंर्दित हो।

इस बदले हुए परिवेश में हमें यह समझना होगा कि शिक्षक का काम और भी कठिन हो चला है। क्योंकि शिक्षा एक ऐसा क्षेत्र है जोकि प्रत्येक व्यक्ति से जुड़ा है इसलिए यह स्वाभाविक है कि हर व्यक्ति शिक्षा एवं शिक्षकों से अलग-अलग अपेक्षाएँ रखता है साथ ही ये अपेक्षाएँ इतनी भिन्न व विरोधाभासी हो जाती है कि शिक्षक तो क्या कोई भी इंसान आसानी से इन अपेक्षाओं को पूरा नही कर सकता।

शिक्षकों से अपेक्षाएँ इतनी बढ़ गयी हैं कि हम यह भी नजरअंदाज कर देते हैं कि शिक्षक अपना पूर्ण समर्पण और कड़ी मेहनत से पहले विषय में खुद को प्रवीण बनाता है और उसके बाद अपना सम्पूर्ण ज्ञान पूरे मन से सभी विद्यार्थियों को देने की ईमानदार कोशिश करता है हर शिक्षक की अपनी परिस्थियाँ, अपनी कार्यकुशलता तथा कार्य की प्रेरणा और उनके गुण अलग हो सकते हैं परन्तु उनके द्वारा समाज के विकास में किया गया अमूल्य योगदान अद्वितीय है और इसके बदले में शिक्षक केवल समाज से उचित सम्मान की अपेक्षा रखता है।
– डॉ0 अनुपम जग्गा, प्रधानाचार्य
                                                                                              दिल्ली पब्लिक स्कूल रानीपुर।

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