- बच्चों के शरीर में मौजूद रक्त में नहीं बनता हीमोग्लोबीन, बाहर से रक्त चढ़ाना होता है
- 15 से 20 दिनों में पड़ती है रक्त की जरूरत, मेडिकल में 160 बच्चे थैलेसीमिया से ग्रस्त
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: किसी भी बच्चे को जन्म से ही हर 15 से 20 दिन के बाद खून की जरूरत पड़े तो यह बेहद गंभीर विषय है। ऐसे में जबतक भी बच्चा जीवित रहेगा तो उसे खून चढ़ाना ही होता है। इस बीमारी को थैलेसीमिया कहा जाता है जो एक आनुवांशिक बीमारी है। इस बीमारी का खून चढ़ानें के अलावा कोई दूसरा इलाज नहीं है।
आमतौर पर शरीर में बनने वाले खून में हीमोग्लोबीन होता है जो हर बच्चे में उसके शरीर की जरूरत के हिसाब से बनता है। यह शरीर के सभी आर्गन्स को सप्लाई होता है। लेकिन थैलेसीमिया में हीमोग्लोबीन बनता ही नहीं, तो शरीर में इसकी कमी को पूरा करने के लिए बाहर से खून लेकर उसकी कमी को पूरा किया जाता है जो बेहद खर्चीला होता है। किसी भी बच्चे का जन्म से ही चेहरा सूखा रहता है,
बच्चा लगातार बीमार रहता है, उसका वजन नहीं बढ़ता है तो यह थैलेसीमिया के लक्षण है। इसके लिए माता-पिता भी इस रोग से ग्रस्त हो यह जरूरी नहीं लेकिन उनका बच्चा इसका शिकार हो सकता है। यदि माता-पिता दोनों ही माइनर थैलेसीमिया से ग्रस्त हो तो बच्चों में इसकी संभावना 25 प्रतिशत रहती है।
मेडिकल में 160 बच्चों का निशुल्क इलाज जारी
थैलेसीमिया से ग्रस्त बच्चों को हर दो से तीन सप्ताह में खून चढ़ानें की जरूरत होती है, मेडिकल में इस समय थैलेसीमिया से ग्रस्त 160 बच्चों का इलाज जारी है। जबकि करीब 30 युवा भी है जिनका इलाज हो रहा है। आमतौर पर खून की जरूरत होने पर डोनर को साथ लाना पड़ता है। लेकिन मेडिकल में इस बीमारी ग्रस्त बच्चों को बिना डोनर के ही निशुल्क खून उपलब्ध कराया जा रहा है। बार-बार खून चढ़ानें से शरीर में आयरन का लोड बढ़ जाता है।
इससे बचाव के लिए मेडिकल में दवा दी जाती है जो आयरन को कंट्रोल करती है। खून चढ़ने के बाद शरीर मे इसका रिएक्शन वाइट सैल्स से होता है। इसके लिए फिल्टर का प्रयोग करते हुए रक्त से केवल लाल रक्त सैल्स लिए जाते है और उन्हें शरीर में चढ़ाया जाता है। थैलेसीमिया एक आनुवांशिक बीमारी है तो इससे बचाव के लिए शादी से पहले व बाद में युवक-युवती को अपनी एचबीए2 जांच करानी चाहिए।
क्योंकि बच्चे में इस बीमारी की वजह माता-पिता से उसके शरीर में आनें वाले जीन्स होते है। गर्भधारण से पहले जांच कराएं जिससे पता चल सके कि माता-पिता में से कोई भी इस बीमारी से तो ग्रस्त नहीं है। गर्भ में पल रहे 10 से 12 सप्ताह के बच्चे की थैलेसीमिया जांच कराना चाहिए। जांच में साफ होने पर बच्चे को इस दुनिया में आने से रोका जा सकता है जिससे वह जीवनभर रहने वाली इस बीमारी के प्रको से बच सकता है।
थैलेसीमिया से बचाव का एक ही रास्ता है कि समय पर खून चढ़ता रहे। ऐसे भी युवा है जो इस समय इंजीनियर है, इंटीरियर डेकोरेटर है वह सामान्य जीवन जी रहें है। लेकिन उन्हें खून चढ़ाया जाता है, जो पूरी तरह निशुल्क है। इस बीमारी का स्थाई इलाज केवल बोनमेरो बदलना है, जो काफी महंगा है। यूपी में केवल लखनऊ व देश की राजधानी दिल्ली में कुछ जगह ही मौजूद है। इसका खर्च भी चालीस लाख से अधिक हो सकता है। साथ ही बोनमेरो लेने के लिए जांच की जाती है कि वह मैच कर रहा है या नहीं। इसके लिए राज्य व केन्द्र सरकार से आर्थिक मदद भी मिलती है, लेकिन बोनमेरो बदलने के बाद वह कामयाब रहेगा या नहीं इसको लेकर भी कुछ नहीं कहा जा सकता।
-डा. नवरतन गुप्ता, एचओडी पीड्रियाटिक विभाग मेडिकल कॉलेज।

