Wednesday, June 17, 2026
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घट रहा दलहनी फसलों का रकबा, आसमान छू रहे दाम

  • जंगली जानवर एवं आवारा गोवंश से त्रस्त किसानों का हो रहा दलहनी फसलों से मोह भंग
  • दालों के दाम में हो रही वृद्धि से बिगड़ा रसोई का बजट

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: जिले में लगातार दलहनी फसलों का रकबा घटता चला जा रहा है। जंगली जानवरों एवं आवारा पशुओं से त्रस्त किसानों का दलहनी फसलों से मोह भंग होता जा रहा है। जहां एक दशक पहले तक लगभग अधिकांश किसान दालों की फसल उगाया करते थे। वहीं अब केवल कुछ किसान ही दाल की फसल उगा रहे हैं।

उधर, दालों के दामों में दिन प्रतिदिन वद्धि होती जा रही है। जिसके चलते आम आदमी पर महंगाई की मार पड़ रही है। ऐसे में किसानों का कहना है कि यदि जंगली जानवरों व आवारा गोवंश से फसल का बचाव हो जाए तो एक बार फिर से दलहनी फसलों का रकबा बढ़ाया जा सकता है।

बता दें कि जिले में एक दशक पहले तक दलहनी फसलों की किसान खूब खेती किया करते थे। जिनमें प्रमुख रूप से उड़द, मूंग अरहर, चना व मसूर आदि दालों की फसल अधिकांश किसान बोया करते थे, लेकिन वर्तमान में केवल कुछ किसान ही दालों की खेती करते हैं। किसानों ने बताया कि दाल की फसल में अन्य फसलों की अपेक्षा जंगली जानवर और आवारा गोवंश का अत्यधिक नुकसान होता है।

जिसके चलते किसानों ने दालों की फसल उगाने से मुंह मोड़ना शुरू कर दिया है। किसानों का कहना है कि दालों की फसलों को जंगली जानवरों एवं आवारा गोवंश से बचाने के लिए यदि राज्य या केन्द्र सरकार द्वारा कोई सार्थक प्रयास किये जाएं तो किसानों को दलहनी फसलों की बुआई करने से परहेज नहीं होगा। कृषि विभाग से मिली जानकारी के अनुसार पिछले एक दशक से दलहनी फसलों का रकबा काफी हद तक घटता चला आ रहा है।

जिले में दाल की पैदावार कम हो रही है, जिसके चलते अधिकांश किसानों को भी व्यापारियों से दाल खरीदनी पड़ रही है। जबकि एक दशक पहले तक अधिकांश किसान अपनी द्वारा उगाई गई दाल को व्यापारियों को बिक्री किया करते थे। उधर, दालों के दामों में लगातार उछाल आता चला जा रहा है।

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जिसके चलते आम आदमी और किसान की जेब पर अतिरिक्त भार पड़ रहा है। थोक एवं फुटकर व्यापारियों से मिली जानकारी के अनुसार पिछले कुछ माह में दालों के रेट में भारी वृद्धि हुई है। जिसके चलते रसोई का बजट काफी बिगड़ा हुआ है।

जंगली जानवर फसलों को पहुंचा रहे नुकसान

दाल की फसल बोने में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि दाल की फसलों में जंगली जानवरों व आवारा गोवंश का अत्यधिक नुकसान है। एक बार दाल की फसल को नील गाय या आवारा गोवंश खा लें तो वह पूरी तरह से बर्बाद हो जाती है। दलहनी फसलों में अधिक नुकसान होने के कारण अधिकांश किसानों ने दाल की फसल बोना छोड़ दिया है। दलहनी फसलों का रकबा लगातार घटता जा रहा है। -अर्जुन सिंह, किसान

किसान महंगे दामों पर खरीद रहे दाल

दलहनी फसल पहले किसान खूब उगाया करते थे। तब आवारा गोवंश का इतना नुकसान नहीं होता था, जंगली सूकर, नील गाय और आवारा गोवंश के नुकसान से परेशान होकर अधिकांश किसानों ने दाल की फसल उगाना छोड़ दिया है, जो किसान पहले दाल व्यापारियों को बिक्री किया करते थे, वही किसान अब महंगे दामों पर व्यापारियों से दाल खरीदने को मजबूर हैं। -मुकेश शर्मा, किसान

दाल की बुआई का कम हो गया क्षेत्रफल

हमने सभी प्रकार की दालों की खेती करके देख ली है, आवारा गोवंश और जंगली जानवर दाल की फसल को पूरी तरह से बर्बाद कर देते हैं। आवारा गोवंश और जंगली जानवरों से परेशान होकर आसपास के अधिकांश किसानों ने दाल की खेती करना काफी हद तक कम कर दिया है। जिससे दाल की बुआई का क्षेत्रफल काफी कम हो गया है और किसानों को दूसरी पर निर्भर आना पड़ रहा है। -पवन शर्मा, किसान

मंडियों में आ रही अन्य प्रदेशों से दाल

अब जिले में किसानों द्वारा दालों की फसल कम बोई जा रही है। जबकि पहले अधिकांश किसान दाल बोया करते थे। जिले में दाल की बुआई कम होने के कारण अन्य प्रदेशों से दाल जिले की मंडी में आ रही है। इसमें किराया-भाड़ा ज्यादा लगता है। इन्हीं सब कारणों से दाल महंगी होती जा रही है। यदि जनपद में किसानों द्वारा दाल की फसलों की बुआई अधिक होने लगे तो संभवत: दालों के रेट जिले में कम हो जाएंगे।-पंकज गुप्ता, व्यापारी

प्रमुख दालों के रेट एक नजर में

दालों के नाम वर्तमान में रेट दो माह पहले रेट चार माह पहले दालों के रेट
चने की दाल 72 रु. प्रति किलो 62 रु. प्रति किलो 58 रु. प्रति किलो
मसूर दाल 96 रु. प्रति किलो 90 रु. प्रति किलो 86 रु. प्रति किलो
मसूर मलका 90 रु. प्रति किलो 85 रु. प्रति किलो 80 रु. प्रति किलो
अरहर दाल 140 रु. प्रति किलो 110 रु. प्रति किलो 85 रु. प्रति किलो
मूंग दाल 105 रु. प्रति किलो 100 रु. प्रति किलो 92 रु. प्रति किलो
उड़द काली 100 रु. प्रति किलो 94 रु. प्रति किलो 90 रु. प्रति किलो
उड़द धोवा 120 रु. प्रति किलो 110 रु. प्रति किलो 105 रु. प्रति किलो

सरकार दलहनी फसलों को बढ़ावा दे रही है, दलहनी फसलों के बीज (मिनी किट) भी किसानों को सरकार नि:शुल्क उपलब्ध करा रही है। सरकार द्वारा आवारा गोवंश को गोआश्रय स्थलों में संरक्षित किया जा रहा है। लिहाजा किसानों को दलहनी फसल उगानी चाहिए। इसके अलावा किसान गन्ने की दो लाइनों के बीच में दलहन की सहफसली खेती भी कर सकते हैं, जिसमें उड़द और मूंग बहुत अच्छी हो जाती है। गन्ने के चारों ओर अरहर की खेती भी की जा सकती है। -राजीव सिंह, जिला कृषि अधिकारी मेरठ।

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