Wednesday, March 18, 2026
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चीतों की सुरक्षा सुनिश्चित करना चुनौती

Nazariya 22


Ali khan 1भारत की सरजमीं पर चीतों को देखने का इंतजार सात दशक बाद खत्म हो गया। नामीबिया से आठ चीते विशेष विमान से शनिवार को ग्वालियर पहुंचे। फिर चिनूक हेलीकॉप्टर से मध्यप्रदेश के श्योपुर स्थित कूनो नेशनल पार्क में ले जाए गए। जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 72वें जन्मदिन पर बॉक्स खोल कर तीन चीतों को क्वारंटीन बाड़े में छोड़ा। इस मौके पर उन्होंने कहा कि कूनों में चीता फिर से दौड़ेगा तो यहां जैव विविधता बढ़ेगी। विकास के साथ रोजगार के अवसर पैदा होंगे। मोदी ने कहा कि प्रोजेक्ट चीता के तहत सात दशक पहले विलुप्त होने के बाद देश में चीतों को फिर से लाया गया है। यह पर्यावरण और वन्य जीव संरक्षण की दिशा में उनकी सरकार का प्रयास है। पीएम ने कहा, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमने 1952 में चीतों को विलुप्त घोषित कर दिया, पर उन्हें फिर से लाने को कोई रचनात्मक प्रयास नहीं किया गया। उन्होंने भारत में चीतों को बसाने पर नामीबिया सरकार को धन्यवाद दिया। कहा, चीते हमारे मेहमान हैं। हमें कूनो नेशनल पार्क को उन्हें अपना घर बनाने के लिए कुछ महीने का समय देना चाहिए। उन्होंने लोगों से अपील की है कि अभी धैर्य रखें, चीतों को देखने नहीं आएं। ये मेहमान बनकर आए हैं, इनका सहयोग करें।
निश्चित रूप से, मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में नामीबिया से चीतों का आगमन वन्यजीव संपदा के साथ जैव विविधता के संरक्षण की दिशा में एक महत्वाकांक्षी कदम है। जैसा कि चीता एकमात्र बड़ा माँसाहारी जानवर है, जो कि अति-शिकार के कारण भारत में विलुप्त हो गया था। गौरतलब है कि 1970 के दशक में ईरान से एशियाई शेरों के बदले एशियाई चीतों को भारत लाने पर बात शुरू हुई थी। ईरान में चीतों को कम आबादी व अफ्रीकी चीतों और ईरानी चीतों में समानता को देखते हुए तय हुआ कि अफ्रीकी चीतों को भारत लाया जाएगा।

सन् 2009 में देश में चीतों को लाने की कोशिशें नए सिरे से शुरू हुर्इं। अफ्रीकन चीता इंट्रोडक्शन प्रोजेक्ट इन इंडिया शुरू किया गया। 2010 से 2012 के दौरान दस वन्य अभयारण्यों का सर्वेक्षण किया गया। इसके बाद मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क को चीतों के लिए चयनित किया गया।

दरअसल, भारत में चीता की पुन:वापसी के पीछे कई मायने हैं। जैविक उद्देश्य की पूर्ति के लिए चीते की वापसी बेहद जरूरी है। यकीनन, चीतों का संरक्षण घास के मैदानों और उनके बायोम एवं आवास को पुनर्जीवित करेगा, ठीक उसी तरह जैसे प्रोजेक्ट टाइगर ने जंगलों और उन सभी प्रजातियों के लिये महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। दरअसल, चीता को वापस लाने के बाद भारत एकमात्र ऐसा देश बन गया है जहां ‘बिग कैट’ प्रजाति के पांचों सदस्य—बाघ, शेर, तेंदुआ, हिम तेंदुआ और चीता उपस्थित हैं। साथ ही, चीता के पूर्व आवास के प्रतिनिधि क्षेत्रों में इसकी पारिस्थितिकी तंत्र कार्य भूमिका को फिर से स्थापित करने और एक प्रजाति के रूप में चीता के संरक्षण की दिशा में प्रयास से वन्यजीवों के संरक्षण के वैश्विक प्रयास में भारत के योगदान को सुनिश्चित करना भी शामिल है। इसके अलावा, चीतों के आगमन के साथ आजीविका के विकल्पों में वृद्धि होना तय है। जैसा कि चीता का पुन:प्रवेश उन क्षेत्रों के और आसपास के क्षेत्रों के स्थानीय समुदायों के लिये इकोटूरिज्म और संबंधित गतिविधियों से बढ़े हुए राजस्व के माध्यम से आजीविका की वृद्धि करेगा। इसके साथ-साथ खाद्य श्रृंखला को बरकरार रखने में भी सहायक है। मालूम हो कि शीर्ष शिकारी खाद्य श्रृंखला में सभी स्तरों को नियंत्रित करते हैं और उन्हें खाद्य श्रृंखला के लिये छत्र प्रजाति माना जाता है। ऐसे में खुले वन पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करने और फूड वेब में संतुलन वापस लाने के लिये संसाधन जुटाने हेतु चीता एक प्रमुख और छत्र प्रजाति साबित हो सकता है। इसका एक फायदा यह भी है कि चीतों के आगमन से संरक्षण क्षेत्रों में पारिस्थितिकी तंत्र बहाली गतिविधियों के माध्यम से कार्बन जब्ती की भारत की क्षमता को बढ़ाएगा और इस तरह वैश्विक जलवायु परिवर्तन शमन लक्ष्यों में योगदान देगा। इस प्रकार, चीतों का आगमन भारतीय परिप्रेक्ष्य में कई मायनों में बेहद अहम है।

लेकिन हमें यह समझने की आवश्यकता है कि पहली बार चीतों को एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप में बसाया जा रहा है। चूंकि इस प्रयोग की सफलता पर दुनिया की भी निगाहें रहेगी। लिहाजा इसके लिए अतिरिक्त प्रयास करने की आवश्यकता है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि अफ्रीकी महाद्वीप से लाए गए चीते कूनों नेशनल पार्क में सुरक्षित और संरक्षित रहें और आने वाले समय के साथ उनकी तादाद भी बढ़े। चीतों की तादाद को बढ़ाने की दिशा में पशु चिकित्सा पर्यवेक्षण और अनुकूलन की सीमा के वैज्ञानिक मूल्यांकन के साथ निगरानी की एक उचित रणनीति की आवश्यकता है।

जंगलों में छोड़े गए चीतों और अन्य मांसाहारियों पर नजर रखने के लिए ट्रैकिंग टीमों का संगठित होना आवश्यक है। साथ ही स्थानीय लोगों में जागरूकता प्रसार और युवाओं को संवेदनशील बनाने के लिए उन्हें पुन:प्रवेश योजना से परिचित कराना होगा। जिसके लिये विभिन्न आउटरीच और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिये। इसके अलावा, चीतों की सुरक्षा और संतुष्टि सुनिश्चित करने के लिये प्रशासनिक अधिकारियों और स्थानीय लोगों के बीच उपयुक्त संचार सहित उपयुक्त पुनर्वास नीति तैयार करने की आवश्यकता है। जानकारी के लिए बताना चाहूंगा कि कूनो नेशनल पार्क में चीतों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिहाज से 400 से भी ज्यादा चीता मित्र तैनात किए गए हैं। ऐसे में यह उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में भारतीय वन्यजीव संपदा में चीतों की शुमारी देखने में आएगी।


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