Sunday, July 5, 2026
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बढ़ते वृद्धाश्रम समाज की सच्चाई

Samvad

DILIP KUMAR PATHAKजब बच्चा पैदा होता है तो खुशियां मनाई जाती हैं, वही व्यक्ति जब जवान हो जाता है तो उसके ऊपर तमाम तरह की पारिवारिक, सामाजिक जिम्मेदारियां आ जाती हैं। तब उस अवस्था में व्यक्ति किसी पर आश्रित नहीं होता, व्यक्ति खुदमुख्तार होता है। हालांकि जब वही व्यक्ति बुजुर्ग हो जाता है तो समाज एवं परिवार के लिए बोझ बन जाता है। जबकि होना यह चाहिए कि जैसे जन्म और बचपन का बड़ी उत्सुकता से स्वागत किया जाता है, उसी तरह बुढ़ापे का स्वागत होना चाहिए। अगर यह नहीं हो पा रहा तो कम से कम बुढ़ापे को दुत्कारा न जाए। एक आदमी पूरी जिÞंदगी बच्चों, परिवार का बोझ उठाता है, परिवार के सामने खुद को कभी भी प्राथमिकता नहीं देता, बाद में वही बुजुर्ग परिवार के लिए बोझ बन जाता है, इसलिए ही बुढ़ापा बहुत क्रूर होता है, या क्रूर बना दिया जाता है। दोनों बातों में बहुत अन्तर स्पष्ट झलकता है। जिन बुजुर्गों की घर में इज्जत होती है, उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए ध्यान दिया जाता है, उनके लिए बुढ़ापा एक अवस्था माना जाता है, लेकिन जिन बुजुर्गों की घर में इज्जत नहीं होती, जरूरतें पूरी नहीं होतीं उनके लिए बुढ़ापा अभिशाप बन जाता है।

बदलते हुए दौर के साथ हम सब अपने बुजुर्गों के लिए समय नहीं निकाल पाते। हमें समझना चाहिए कि वरिष्ठ नागरिक समाज की अमूल्य विरासत होते हैं। उन्होंने देश और समाज को बहुत कुछ दिया होता है। उन्हें जीवन के विभिन्न क्षेत्रों का व्यापक अनुभव होता है। आज का युवा वर्ग राष्ट्र को ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए वरिष्ठ नागरिकों के अनुभव से लाभ उठा सकता है। अपने जीवन की इस अवस्था में उन्हें देखभाल और यह अहसास कराए जाने की जरूरत होती है कि वे हमारे लिए बहुत खास महत्त्व रखते हैं। हमारे शास्त्रों में भी बुजुर्गों का सम्मान करने की राह दिखलायी गई है। इसके विपरीत हमारा समाज बुजुर्गों के प्रति नर्म होने के बदले निर्मम होता जा रहा है। टीवी, अखबारों में बढ़ती हुई बुजुर्गों के प्रति क्रूरता की खबरें खूब सुनाई देती हैं। बढ़ते वृद्धाश्रम हमारे समाज की एक सच्चाई है। कई एकल परिवारों में बुजुर्गों को कोई पूछने वाला, सुनने वाला नहीं है। जबकि इस अवस्था में वरिष्ठ नागरिक चाहते हैं कि हमारी सुनी जाए, बच्चे हमें समय दे, बुजुर्गों को इस उम्र में काफी प्रेम की आवश्यकता होती है, इस बढ़ती हुई उम्र में सहनशक्ति कम हो जाती है।

संयुक्तराष्ट्र संघ ने पूरी दुनिया में बुजुर्गों के प्रति हो रहे दुर्व्यवहार और अन्याय को समाप्त करने के लिए और लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए 14 दिसम्बर, 1990 को यह निर्णय लिया कि हर साल 1 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस के रूप में मनाकर हम बुजुर्गों को उनका सही स्थान दिलाने की कोशिश करेंगे। 1 अक्टूबर, 1991 को पहली बार ‘अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस’ मनाया गया, जिसके बाद से इसे हर साल इसी दिन मनाया जाता है। इसके बाद दुनिया में कुछ हद तक बुजुर्गों के प्रति संवेदनशीलता के लिए काम भी किया गया है, इसके बाद हमारे देश में भी समय-समय पर हमारी सरकारों ने बुजुर्गों के लिए तरह-तरह के विधेयक पारित किए हैं। भारत सरकार ने देश भर में वरिष्ठ नागरिकों के आरोग्यता और कल्याण को बढ़ावा देने के लिए सन 1999 में वृद्ध सदस्यों के लिए राष्ट्रीय नीति तैयार की थी इस नीति का उद्देश्य बुजुर्गों के प्रति कृतज्ञता का भाव बढ़े, कुछ संवेदनशीलता बढ़े। इसके साथ ही 2007 में वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण विधेयक’ संसद में पारित किया गया इसमें माता-पिता के भरण-पोषण, वृद्धाश्रमों की स्थापना, चिकित्सा सुविधा की व्यवस्था और वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के इंतजाम करने का इंतजाम किया गया। लेकिन इन सब के बावजूद हमें अखबारों और समाचारों की सुर्खियों में वृद्धों की हत्या और लूटमार की घटनाएं देखने को मिलती हैं। वृद्धाश्रमों में बढ़ती संख्या इस बात का साफ सबूत है कि वृद्धों को परिवार एवं समाज में उपेक्षित किया जा रहा है।

हालांकि सरकार ने बुजुर्गों के लिए जरूरी आवास, पेंशन, उपचार की सुविधाएं मुहैया करने की मुहिम चलाई हुई हैं। हालाँकि ये सब समाज में फैली मानसिकता को बदलने के लिए काफी नहीं है। हमारे देश में भी अब बुजुर्गों की अच्छी खासी तादाद है, अत: हमारे देश की सरकार को और भी गहराई से सोचने की आवश्यकता है। हमें सबसे पहले तो उन्हें आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी बनाने पर जोर देना होगा। कुछ बुजुर्ग तो इतने स्वाभिमानी होते हैं कि अपने बच्चों से अपनी जरूरतें मांगने के लिए संकोच करते हैं कई तो खुद को शर्मिंदा महसूस करते हैं, ऐसे सभी बुजुर्गों के लिए सरकार विशेष ध्यान दे, हालांकि सबकुछ सरकार नहीं कर सकती कुछ बातेँ लोगों को खुद से ही सोचना होगा हालांकि इसके लिए तमाम जागरूक अभियान चलाए जाने की आवश्यकता है।

हालांकि कुछ बुजुर्ग जरूरत से ज्यादा परिवार एवं समाज में हस्तक्षेप करते हैं। बदलते हुए दौर के साथ कई बुजुर्ग ये बात समझ नहीं पाते कि नई पीढ़ी को ज़्यादा रोक टोक पसंद नहीं होती है, अत: उन्हें अपने मन की जिÞन्दगी जीने देने के लिए स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए। हालांकि जहां जरूरत हो तो बोलें अन्यथा चुप्पी की उत्तम है। खुद की उम्र के हिसाब से स्वस्थ्य आहार लें, शाम – सुबह टहलने के लिए निकल जाएं हल्का योग, व्यायाम करें, जिससे शरीर चलता रहे। अपने आप को नकारात्मकता में न जाने दें, इस उम्र में नकारात्मकता आना स्वाभाविक है। जाहिर है जिÞन्दगी संकुचित हो जाती है, निर्णय लेने के अधिकार छीन लिए जाते हैं। अत: खुद को स्वस्थ्य रखें। जिस घर में बुजुर्ग खुश होते हैं वो घर ही उत्तम माना जाता है।

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