Saturday, June 19, 2021
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जीवन के खिलाफ जीवन-पद्धति

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तरह-तरह की वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और समाजशास्त्रीय शोध चीख-चीखकर बता रही हैं कि हमारी मौजूदा जीवन पद्धति दरअसल आत्महंता है और इसे बरकरार रखा गया तो बहुत जल्द मानव जाति को अपने अस्तित्व के संकट से दो-चार होना पड़ेगा। क्या हम कोविड-19 के दौर में भी इन चेतावनियों को अनसुना कर देंगे?
‘पोट्सडैम जलवायु प्रभाव शोध संस्थान’ के वैज्ञानिक-प्राध्यापक एंडर्स लीवरमैन ने धरती के बढ़ते तापमान की वजह से भारत में बारिश पर होने वाले प्रभावों का अध्ययन किया है। एंडर्स के मुताबिक जितनी बार धरती का पारा वैश्विक तापमान के चलते एक डिग्री सेल्सियस ऊपर चढ़ेगा, उतनी ही बार भारत में मानसूनी बारिश पांच प्रतिशत अधिक होगी। मानसूनी बारिश का वास्तविक अंदाजा लगाना भी कठिन हो जाएगा। यह अध्ययन ‘अर्थ सिस्टम डायनेमिक्स’ जर्नल में छपा है। एंडर्स का कहना है कि इस सदी के अंत तक साल-दर-साल वैश्विक तापमान बढ़ेगा। नतीजतन भारत में मानसूनी बारिश तबाही मचाएगी। इससे ज्यादा बाढ़ आएगी, जिससे लाखों एकड़ में फैली फसलें खराब होंगी।

यह इस पीढ़ी का जलवायु परिवर्तन का नमूना है, जो भारत की मानसूनी बारिश के अगले चार सालों का अनुमान लगाता है। यह अनुमान वैश्विक तापमान के बढ़ते क्रम के आधार पर लगाया जाता है। ‘पेरिस जलवायु समझौते’ के अनुबंध के तहत अधिकतम तापमान दो डिग्री सेल्सियस को तय मानक माना जाता है। इसी नमूने से दुनिया के अलग-अलग देशों में मानसूनी या तूफानी बारिश की गणना की जाती है। इस अध्ययन के अनुसार पिछले जलवायु नमूना की तुलना इस मॉडल से करें तो भारत में मौसमी बारिश ज्यादा शक्तिशाली व अनियमित होने जा रही है।
इस अध्ययन के अलावा ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ द्वारा 2020 में किए गए एक अध्ययन से भी स्पष्ट हुआ था कि जलवायु परिवर्तन और पानी का अटूट संबंध है। इस रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण-एशिया को 2030 तक प्रत्येक वर्ष बाढ़ों की कीमत चुकानी पड़ेगी। इनसे सालाना करीब 15.6 लाख करोड़ रुपयों की हानि उठानी पड़ सकती है। साफ है, वैश्विक तापमान के बढ़ते खतरे ने आम आदमी के दरवाजे पर दस्तक दे दी है।

आंधी, तूफान और फिर यकायक ज्वालामुखियों के फटने की हैरतअंगेज घटनाएं भी यही संकेत दे रही हैं कि अदृश्य खतरे इर्दगिर्द ही कहीं मंडरा रहे हैं। समुद्र और अंटाकर्टिका जैसे बफीर्ले क्षेत्र भी इस बदलाव के संकट से दो-चार हो रहे हैं।

दरअसल वायुमंडल में अतिरिक्त कार्बन डाइ-आॅक्साइड महासागरों में भी अवशोषित होकर गहरे समुद्र में बैठ जाती है। यह वर्षों तक जमा रहती है। पिछली दो शताब्दियों में 525 अरब टन कचरा महासागरों में विलय हुआ है। इसके इतर मानवजन्य गतिविधियों से उत्सर्जित कार्बन डाइ-आॅक्साइड का 50 फीसदी भाग भी समुद्र की गहराइयों में समा गया है। इस अतिरिक्त कार्बन डाइ-आॅक्साइड के जमा होने के कारण अंटार्कटिका के चारों ओर फैले दक्षिण महासागर में इसे सोखने की क्षमता निरंतर कम हो रही है।

‘ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण’ के मुताबिक वैज्ञानिकों का कहना है कि दक्षिण महासागर कार्बन डाइ-आॅक्साइड से लबालब भर गया है। नतीजतन अब समुद्र इसे अवशोषित करने की बजाय वायुमंडल में ही उगलने लग गया है। अगर इसे जल्दी नियंत्रित नहीं किया गया तो वायुमंडल का तापमान तेजी से बढेगा, जो न केवल मानव प्रजाति, बल्कि सभी प्रकार के जीव-जंतुओं के अस्तित्व के लिए खतरनाक होगा।

हिमालय पर कई वर्षों से अध्ययन कर रहे ‘वाडिया भू-विज्ञान संस्थान’ की रिपोर्ट के अनुसार हिमालय के हिमखंडों में काले कार्बन की मात्रा लगातार बढ़ रही है। यह मात्रा सामान्य से ढाई गुना बढ़कर 1899 नैनोग्राम हो गई है। दरअसल काले कार्बन से तापमान में वृद्धि होती है। यह सूर्य के प्रकाश को अवशोषित करने में अत्यंत प्रभावी है। इससे हिमालय और आर्कटिक जैसे हिमखंडों में बर्फ पिघलने लगती है। बीती बरसात में औसत से कम बारिश होने के कारण बर्फ पिघलने की मात्रा और अधिक बढ़ गई है।

वायु प्रदूषण से भी हिमखंड दूषित कार्बन की चपेट में आए हैं। ‘उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र’ ने निष्कर्ष निकाला है कि पिछले 37 सालों में हिमाच्छादित क्षेत्रफल में 26 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है। इस क्षेत्र में पहले स्थाई स्नोलाईन 5700 मीटर थी, जो अब 5200 मीटर के बीच घट-बढ़ रही है। यही वजह है कि नंदादेवी जैव-मंडल (बायोस्फियर) आरक्षित ऋषि गंगा के दायरे का कुल 243 वर्ग किमी क्षेत्र बर्फ से ढका था, लेकिन यह 2020 में 217 वर्ग किमी ही रह गया है। साफ है, तापमान बढ़ने का सिलसिला बना रहा और यदि बर्फ इसी तरह पिघलती रही तो जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के संकट में आने का सिलसिला भी बना रहेगा।

बढ़ते तापमान को लेकर एक नई आशंका यह भी जताई जा रही है कि इससे दुनिया में कीड़े-मकोड़े और जीवाणु-विषाणु की संख्या अत्यधिक मात्रा में बढ़ेगी। कीड़ों के जीवन-चक्र पर बहुत ज्यादा वैज्ञानिक शोध नहीं हुए हैं। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि 10 मिलीग्राम से कम वजन के कीड़े वैज्ञानिकों की रडार प्रणाली में नहीं आते हैं। इस सच्चाई को जानने के लिए दक्षिण इंग्लैंड में एक रडार लगाया गया था।

दरअसल वैज्ञानिकों का ऐसा अनुमान है कि इसी स्थल से यूरोप और अफ्रीका के लिए 35 अरब कीड़े प्रवास यात्रा पर निकलते हैं। इस रडार से 70,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में कीटों के स्थान परिवर्तन का पता चला है। कीटों पर हालांकि अभी तक व्यापक स्तर पर शोध नहीं हुए हैं, परंतु जितने भी हुए हैं, उस आधार पर धरती पर सबसे अधिक आबादी इन्हीं की है। जिस तेजी से ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है, उसमें निश्चित रूप से कीड़ों की संख्या और तेजी से बढ़ेगी, क्योंकि गर्म वातावरण में कीड़े तेजी से बढ़ते हैं।

कीड़ों के प्रवास के लिए ‘प्राकृतिक चयन’ के सिद्धांत को जिम्मेवार माना जा रहा है। स्वी डन स्थित ‘लुंड विश्व-विद्यालय’ की सुसैन एकीसन के अनुसार, प्रवास के पीछे मुख्य रूप से अनुवांशिक और आहार प्रणाली जिम्मेवार होते हैं। चीन से निकला कोरोना विषाणु कोविड-19 भी दूषित आहार प्रणाली का कारक माना जा रहा है। चमगादड़ या पेंगोलिन को चीनियों द्वारा आहार बनाए जाने के कारण यह पहले चीनियों और फिर यात्राओं के जरिए दुनिया में फैल गया। वैज्ञानिकों का दावा है कि यदि वैश्विक तापमान बढ़ता है तो उसी अनुपात में इनकी संख्या में बढ़ोतरी होना तय है।

ऐसे संकेत लगातार मिल रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन खतरनाक रूप ले चुका है। इसकी पुष्टि पिछले पांच सालों से आ रही प्राकृतिक आपदाओं से पूरी दुनिया को मिल रही है। ब्राजील, आस्ट्रेलिया, सिडनी, फिलीपिंस, मोजाम्बिक, थाईलैंड, श्रीलंका, चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश में प्रलयंकारी बाढ़ और भूस्खलन की आपदाएं निरंतर बनी हुई हैं। भारत के पश्चिम-बंगाल और ओड़ीसा में तूफान लगातार कहर ढा रहे हैं। इनके आने की अवधि घट गई है। उत्तराखंड में केदारनाथ की त्रासदी के बाद फरवरी 2021 में चमोली जिले के हिमखंड टूटने से आई भयंकर आपदा ने जताया है कि हिमालय क्षेत्र में आधुनिक विकास दुष्परिणामों के रूप में स्पष्ट दिखाई देने लगा है। इस त्रासदी में 62 लोगों की मौतें हुईं और 142 लोग लापता हैं।

उत्तराखंड में कथित विकास और पारिस्थितिकी तंत्र के अनियमित हो जाने और जलवायु बदलाव के चलते जंगलों में आग का सिलसिला भी चल रहा है। अमेरिका में बर्फबारी और दावानलों ने कहर ढहाया हुआ है। आस्ट्रेलिया भी इसी कालखंड में भीषण सूखे की चपेट में आ गया है। 21वीं सदी के पहले दो दशकों में आए इन प्राकृतिक प्रकोपों ने तय कर दिया है कि मानसून में क्रूर बदलाव ब्रह्माण्ड की कोख में अंगड़ाई ले रहा है। अनियंत्रित औद्योगिकीकरण और उपभोग आधारित इस जीवनशैली के लिए कार्बन उत्सर्जन का यही क्रम जारी रहा तो उपरोक्त अध्ययन के मुताबिक अगली एक शताब्दी में दुनिया का तापमान 0.3 से 4.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा। यह खाद्य संकट तो बढ़ाएगा ही, पर्यावरण शरणार्थी जैसी भयावह समस्या भी खड़ी कर देगा।


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