Tuesday, January 25, 2022
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चिंताओं का मकड़जाल

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चंद्र प्रभा सूद |

जब तक मनुष्य चिंता रूपी शत्रु पर नियंत्रण नहीं कर लेता, उसे कष्ट उठाना ही पड़ता है। कुछ चिंताएं होनी स्वाभाविक हैं, पर कुछ को मनुष्य स्वयं अपने लिए बुलाता है। जिन पर उसका वश नहीं चलता, उनके लिए उसे ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए। वही उनको दूर करने का सामर्थ्य रखता है और जो खुद उसकी बुलाई हुई चिंताएं हैं, उन पर उसे मनन करके उनसे मुक्त होने का प्रयास दृढ़ता से करना चाहिए। यदि फिर भी कहीं चूक रह जाए तो मनीषियों से परामर्श करना चाहिए। जीवन में प्रसन्नता चाहिए तो चिंता रूपी शत्रु पर किसी भी तरह विजय पानी होगी।

मनीषी समझाते हैं चिंता मत करो। सांसारिक मनुष्यों के लिए यह कदापि संभव नहीं हो पाता। जीते जी मनुष्य को घर-परिवार, बच्चों की शिक्षा, उन्हें सेटल करना, उनके शादी-ब्याह, स्वास्थ्य, धन, लेनदेन, नौकरी-व्यापार आदि कई प्रकार की चिन्ताएं हैं, जो उसे सताती रहती हैं। चिंताओं का मकड़जाल उसे चैन से बैठने नहीं देता। उससे बाहर निकलने के असफल प्रयास में वह छटपटाता रहता है। वह सारा समय घुलता रहता है और जानते-बूझते अपना स्वास्थ्य खराब कर लेता है।

चिंता चिता के समान होती है। चिता मरने के पश्चात ही जलती है पर चिंता पल-पल मनुष्य के जीवन को जलाती रहती है। इसी भाव को किसी कवि ने निम्न श्लोक में व्यक्त किया है
-चिता चिन्ता समाप्रोक्ता बिन्दुमात्रं विशेषता।

सजीवं दहते चिन्ता निर्जीवं दहते चिता

अर्थाम चिता और चिंता समान कही गई हैं, पर उसमें भी चिंता में एक बिंदु की विशेषता है। यह चिता तो मरे हुए को ही जलाती है पर चिंता जीवित व्यक्ति को मार देती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि चिंता मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, परंतु चिंता करना भी तो एक अनवरत क्रम है। एक चिंता मनुष्य को घेरती है, जब उससे मुक्त होता है तो दूसरी उसकी राह ताक रही होती है। एक के बाद इन चिंताओं का क्रम उसे निश्चिन्त होकर नहीं बैठने देता। मनुष्य परेशान होता रहता है पर सुख की सांस लेना चाहता है। एक खुशी का पल तलाशना चाहता है।
किसी कवि ने निम्न श्लोकांश में बताने का प्रयास किया है –

मात्र समं नास्ति शरीरपोषणं
चिन्तासमं नास्ति शरीरशोषणं।

अर्थात संतुलित जीवन के समान शरीर का पोषण करने वाला दूसरा कोई नहीं है। चिंता के समान शरीर को सुखाने वाला कोई दूसरा नहीं है। संतुलित जीवन शैली से मनुष्य का शरीर पुष्ट होता है। यह चिंता दीमक की तरह मनुष्य के जीवन को नष्ट करती रहती है। इससे शरीर सूखने लगता है, इंसान का चेहरा मुरझा जाता है। मनुष्य अपनी आयु से अधिक का दिखाई देने लगता है यानी उसका शरीर नित्य गिरता जाता है। अनावश्यक ही कई बीमारियां उसे घेर लेती हैं। अपनी इस एक आदत से मनुष्य न स्वयं चैन से बैठता है और न ही अपने बन्धु-बान्धवों को बैठने देता है। सभी उसकी नकारात्मक सोच से परेशान रहते हैं। सदा तनाव में रहने के कारण ऐसे लोग कभी-कभार अवसादग्रस्त भी हो जाते हैं।

ऐसे व्यक्ति को कितना भी समझा लो, चिकने घड़े पर पड़े पानी की तरह सब बेकार हो जाता है। जानते-बूझते भी वह अपनी इस आदत से मुक्त नहीं हो पाता। उनके पास बैठा व्यक्ति शीघ्र ही उनसे ऊब जाता है। फिर धीरे-धीरे लोग उनसे कन्नी काटने लगते हैं। सामने सहानुभूति दिखाते हैं परन्तु पीठ पीछे उनका उपहास करने से नहीं चूकते।

जब तक मनुष्य चिंता रूपी शत्रु पर नियंत्रण नहीं कर लेता, उसे कष्ट उठाना ही पड़ता है। कुछ चिंताएं होनी स्वाभाविक हैं, पर कुछ को मनुष्य स्वयं अपने लिए बुलाता है। जिन पर उसका वश नहीं चलता, उनके लिए उसे ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए। वही उनको दूर करने का सामर्थ्य रखता है और जो खुद उसकी बुलाई हुई चिंताएं हैं, उन पर उसे मनन करके उनसे मुक्त होने का प्रयास दृढ़ता से करना चाहिए। यदि फिर भी कहीं चूक रह जाए तो मनीषियों से परामर्श करना चाहिए। जीवन में प्रसन्नता चाहिए तो चिंता रूपी शत्रु पर किसी भी तरह विजय पानी होगी।

तनाव और चिंता में क्या अंतर है?

चिंता का अर्थ समजने का दूसरा तरीका यह है की किसी भी परिस्थिति या समस्या को सर्वस्व समझ के चलना। यदि आपकी पत्नी बीमार हैं, वह आपके जीवन में सब कुछ है, आपकी सारी संपत्ति से बढ़कर है, तो पत्नी की बीमारी चिंता अपना स्थान जमा लेगी। लेकिन अगर यदि दूसरी ओर पैसा उसके लिए सब कुछ होता और उसकी पत्नी बीमार होती तो वह तनाव का अनुभव करता, उसे चिंता नही होती।

तनाव चिंता के समान है। लेकिन चिंता जैसा नहीं है। तनाव में विचारो की संख्या बढ़ जाती है जबकि चिंता में आप लगातार एक मुद्दे पर विचार करते रहते हो, यह सोचकर की यह ही सब कुछ है। उदाहरण के लिए, अगर यह नौकरी नहीं रही तो क्या होगा? मेरी पत्नी बीमार है, उसका क्या होगा? बच्चे स्कूल नहीं जा रहे, उनका क्या होगा? तनाव एक ही समय पर सभी तरफ से खींचतान है।


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