Tuesday, January 25, 2022
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शरीर थकता है, मन नहीं थकता

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मनुष्य जीवन में सौन्दर्य का महत्व है। सौन्दर्य कला का मुख्य तत्व है। कलात्मक सृजन के लिए भी मूल ध्येय सौन्दर्य है। सौन्दर्य का सृजन कला का मूल कर्म है। उपनिषदों में कहा गया है कि बलहीन को आत्म उपलब्धि नहीं होती। सृजन पुष्ट शरीर द्वारा ही संभव है। शरीर से ही उत्कृष्ट संगीत संभव है और गीत-संगीत से ही कला की यात्रा। सृजन में शरीर के सभी अंग सक्रिय होते हैं। इसी तरह संगीत में वाद्य यंत्रों से काम लेते समय भी शरीर के ही अंग काम करते हैं। गीत गायन में पूरा स्वर यंत्र काम करता है। चित्र बनाते समय भी शरीर की भूमिका है। सौन्दर्य सृजन और दर्शन में आंख और मन की भूमिका है। आंख का स्वस्थ होना जरूरी है। इसी तरह से सुनने की शक्ति भी अनिवार्य है। शरीर का प्रत्येक अंग कला सृजन में हिस्सा लेता है। सृजन के लिए अनिवार्य है।

महाभारत शांति पर्व में प्रकृति और उसके विकारों का सुंदर वर्णन है। कला के लिए भी स्वस्थ शरीर से ही संभव है। महाभारत में बताते हैं कि इस पृथ्वी को सम्पूर्ण रसों, गंधों सौन्दर्यों और प्राणियों का कारण समझना चाहिए। मनुष्य प्रकृति का हिस्सा है। पांच महाभूतों से यह प्रकृति बनी है। मनुष्य भी पांच तत्वों से बना है। भृगु बताते हैं, ‘प्राणियों का शरीर इन पांच महाभूतों की ही प्रेरणा है।’ आगे कहते हैं इसमें गति, वायु का हिस्सा है। मनुष्य शरीर के भीतर रिक्त भाग आकाश का अंश है। मनुष्य शरीर का ताप अग्नि की कृपा है।

मनुष्य शरीर के रक्त का मूल जल का अंश है और हड्डी मांस आदि पदार्थ पृथ्वी के अंश हैं।’ शरीर में प्रत्येक तत्व से पांच चीजें बनती हैं। त्वचा, मांस, हड्डी, मज्जा, श्नायु तंत्र पृथ्वी मय है। तेज, क्रोध, अग्नि, ऊष्मा और जठराग्नि अग्निमय है। कान, आंख, मुंह, हृदय और पेट आकाशमय है। कफ, पित्त, पसीना, चर्बी और रक्त ये जल रूप हैं। वायु भी पांच रूप वाली है। इन पांच रूपों का नाम प्राण, ज्ञान, अपान, समान- उदान ये पांच प्रकृति के रूप हैं। गंध, स्पर्श रस रूप में पृथ्वी में हैं। पृथ्वी का मुख्य गुण गंध है। इसमें अनुकूल, प्रतिकूल, मधुर, कटु स्निग्ध, रुचि आदि 09 भेद हैं।

प्रकृति का प्रत्येक अंश ध्यान देने योग्य है। सौन्दर्य आकर्षित करता है। सौन्दर्य का सम्बंध रूप आंख से है। रूप के सोलह भेद बताये गये हैं। इन भेदों का सम्बंध कला सृजन से है। प्रकृति के प्रपंच में सबसे सूक्ष्म तत्व आकाश है। इसका मुख्य गुण शब्द है। प्रत्येक शब्द का अर्थ होता है। इसका विस्तार कला के लिए जरूरी है। आकाश जनित शब्द के भी सात भेद बताये गये हैं। ये सात सुर हैं। संगीत का आधार है। संगीत शास्त्र में इन सात सुरों का स्पष्ट वर्णन है। इन्हें सडज, ऋषम, गांधार, मध्यम, पंचम, धवेत, निषाद कहा गया है।

संक्षेप में सा, रे, गा, मा, पा, धा, नि कहे जाते हैं। सुरों का मुख्य केन्द्र आकाश है। आकाश सब तरफ व्याप्त है। महाभारत में वाद्य यंत्रों का उदाहरण देखते हुए कहते हैं, ‘नगाड़े आदि में इसकी स्पष्ट अभिव्यक्ति होती है। मृदंग, शंख, बादल और रथ की गति में सुनी गयी ध्वनि इन्हीं सुरों के भीतर है।’

शरीर और मन का सम्बंध सुस्पष्ट है लेकिन विचित्र है। चरक संहिता आयुर्वेद का ग्रंथ है। यहां ‘आयु’ की परिभाषा दी गयी है, ‘शरीर इन्द्रिय मन आत्मा के संयोग को आर्यु कहते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि आयु में शरीर और आत्मा दोनों सम्मिलित हैं। मन और इन्द्रिय तो शरीर का भाग है ही लेकिन आत्मा को अधिकांश विद्वान अलग मानते हैं। अजर अमर बताते हैं। चरक संहिता में सबको द्रव्य कहा है। यहॉं 9 द्रव्य कहे गये हैं। पहला आकाश है। दूसरा वायु, तीसरा अग्नि है। चैथा जल, पाँचवा पृथ्वी, छठवां आत्मा है, सातवां मन है, आठवां काल है और नौवां दिशा।

आत्मा को महाभारत के गीता वाले अंश में अजर, अमर, अविनाशी कहा गया है। लेकिन चरक संहिता में आत्मा मन और काल दिशा दृव्य हैं। शरीर में वात्, पित्त और कफ यह तीनों दोष हैं। इनका संतुलन जरूरी है। जैसे शरीर के तीन दोष और गुण बताये गये हैं वैसे ही मन के आधार पर भी मन और भावना के आधार पर विश्लेषण किया गया है। जीवन विज्ञान में रस की बहुत चर्चा है। बताते हैं कि मनुष्य जो खाता है उससे रस का बोध होता है। रस का लक्ष्ण बताते हैं, ‘रसना के अर्थ का मन रस है’ रसना भावनात्मक संज्ञा है।

प्रत्यक्ष में इसका मन जीभ है। उपनिषदों में धर्म को पृथ्वी का रस बताया गया है। रस का आधार दृव्य,जल पृथ्वी है। रस का जन्म भी जल और पृथ्वी से होता है। मधुर और कटु रसबोध को प्रकट करने वाले शब्द हैं। मानसिक एकाग्रता जरूरी है। विद्वान व्यक्ति का भी मन इधर-उधर भागता है। ज्ञान प्राप्ति के लिए मन की एकाग्रता जरूरी है। बताते हैं मन के अधीन मन की प्रेरणा से मन के साथ इन्द्रिय अपने-अपने विषयों को ग्रहण करने में समर्थ होते हैं।

सौन्दर्य बोध में भी मन की भूमिका है। मन लगता है तो पास पड़ोस, उबड़-खाबड़, जंगल भी उपवन का मजा देते हैं। मन न लगे तो सुन्दर उपवन भी व्यर्थ हो जाते हैं। मन को ज्ञानमय व कल्याणकारी बनाने के लिए यजुर्वेद में 6 मत्रों का उल्लेख एक साथ किया गया है। ऋषि ने कहा है कि हमारा मन शक्तिशाली है। इधर-उधर भागता है। यहाँ-वहाँ धरती आकाश में भागता है। ऋषि की प्रार्थना है, ऐसा हमारा चंचल मन कि शिव संकल्पों से भरा-पूरा है- तन्मे मन: शिव संकल्पम अस्तु। सभी 6 मंत्रों के अंन्त में तनमे मन: शिव संकल्पम् अस्तु की टेक दोहराई गयी है।

शरीर थकता है, मन नहीं थकता। शरीर विश्राम में जाता है, इन्द्रियां विषयों से मुक्त होती हैं। हम सब निद्रा में होते हैं। तब मन मुक्त होकर अपना काम और भी तेज रफ्तार से करता है। तमाम सपने गढ़ता है। हम तारों भरे आकाश की यात्रा पर होते हैं, किसी नदी के तट पर या समुद्र के किनारे नितान्त अपरिचित क्षेत्र में टहलने का मजा लेते हैं। कैसे होता है यह सब? विज्ञान के पास इसका ठोस उत्तर नहीं है। सोते हुए ऐसे क्षेत्रों, दृश्यों में रमना स्वप्न कहा जाता है। स्वप्नों का यह संसार हरेक जिज्ञासु के लिए रहस्यपूर्ण है।

अतिशक्तिशाली श्रीमान और गतिमान हैं मन। ऋषियों ने उन्हें ‘चंचल’ कहा है। इस चंचलता का सबसे रोचक पहलू है- वर्तमान से असंतोष। असंतोष दुख देता है लेकिन असंतुष्ट मनोदशा के फायदे भी हैं। हम असंतुष्ट होकर परिस्थिति बदलने के लिए सक्रिय भी होते हैं। सक्रियता की भी प्रेरक शक्ति है मन। आशा और अभिलाषा मन के रचे प्रपंच होते हैं। लेकिन सत्य सम्पूर्ण चेतन है, जहां सत्य होगा वहां मन नहीं होगा। पतंजलि के योग सूत्रों में खूबसूरत महाविज्ञान है। उनका लक्ष्य ही है योगश्चित्तवृत्ति निरोध। चित्त वृत्तियों का माफिया है- मन। पतंजलि ने योग में इसी माफिया के नियंत्रण की तकनीकी बताई है। बताया है कि ‘तब साक्षी स्वयं में स्थापित हो जाता है।’


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