
एक गांव में एक ब्रह्मचारी रहता था। हनुमान के मंदिर में रहता। लंगोट पहनता, भिक्षा मांगता और उपासना भजन, हरिनाम संकीर्तन करता हुआ बड़ी खुशी से दिन गुजारता था। एक दिन एक बड़ा रईस उस मदिंर में आया। उसके नौकर-चाकर और ठाठ-बाठ देखकर उस ब्रह्मचारी को लगा कि यह बड़ा सुखी आदमी होना चाहिए। उसने आखिर पूछ ही लिया। रईस ने कहा, मैं सुखी कहां? मेरे विवाह को दस बरस होने को आये मगर तक मैं पिता नहीं बन पाया हूं। एक संतान विहीन व्यक्ति कैसे सुखी हो सकता है! अमुक गांव में एक धनवान व्यक्ति किशोरीलाल रहता है, उसकी चार संतानें हैं। वही सच्चे अर्थों में सुखी है। ब्रह्मचारी उस की बात सुनकर उस धनवान के यहां आया। वह बोला, अरे मैं काहे का सुखी, मेरे पुत्र मेरी आज्ञा का पालन नहीं करते। पढ़े-लिखे भी नहीं हैं। दुनिया में विद्या का मान है, पर ये विद्या को छोड़कर गलत रास्तों पर चलने लगे हैं, इन्होंने मेरा जीना दूभर कर रखा है। उसने ब्रह्मचारी को बताया, यहां से कुछ दूरी पर राजागुर गांव है वहां पर एक विद्वान पंडित दीनानाथ रहता है। वही सच्चा सुखी हो सकता है। ब्रह्मचारी उसकी बात सुनकर उस विद्वान पंडित दीनानाथ के पास गया। उसने ब्रह्मचारी को अपनी व्यथा बताई, मुझे सुख कहां? तमाम हड्डियां सुखाकर मैंने विद्या अर्जित की पर मुझे पेट भरने लायक भोजन भी नहीं मिलता। ब्रह्मचारी यह सब सुनकर, जो स्वयं वही पुजारी था सुनकर शर्माया और वापस अपने लक्खीपुर गांव के मंदिर में लौटकर पहले की तरह सुखी और मस्त रहने लगा। सच्चे अर्थों में वही सुखी था। वह पुजारी मन ही मन बड़बड़ाया, नानक दुखिया सब संसार!


