Friday, February 3, 2023
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जनगणना क्यों है जरूरी?

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भारत में 2021 में होने वाली जनगणना की तारीख 5वीं बार बढ़ा दी गई है। ऑफिस ऑफ रजिस्ट्रार एंड सेंसस ने सभी राज्यों को पत्र लिखकर 30 जून 2023 तक प्रशासनिक सीमाएं फ्रीज करने के लिए कहा है। दरअसल, हर जनगणना से पहले राज्यों को जिला, प्रखंड, गांव, शहर, कस्बा, पुलिस स्टेशन, तालुका, पंचायत आदि के नाम और क्षेत्र की जानकारी रजिस्ट्रार जनरल एंड सेंसस कमिश्नर ऑफ इंडिया यानी आरजीआई को देना होता है। जिस किसी भी जगह का नाम या जियोग्राफी बदलती है, उसकी भी जानकारी देनी होती है। इसके तीन महीने बाद ही जनगणना शुरू होती है। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि अब जनगणना 2024 से पहले होना मुश्किल है। जनगणना शुरू होने और उसे पूरा होने में अमूमन तीन से चार साल का समय लगता है। अगर जून 2023 में जनगणना का कार्य शुरू करने की अधिसूचना जारी की जाती है तो अधिसूचना जारी होने के तीन साल के बाद में प्रोविजनल आंकड़े आएंगे। इसमें भी पहले हाउसहोल्ड की गिनती होगी। जनगणना-2031 का कार्य वर्ष 2029 में शुरू करवाया जाएगा।

ऐसे में इस बात की संभावना जताई जा रही है कि इस बार की जनगणना को टाला भी जा सकता है। भारत सरकार ने जनगणना की तारीख को 5वीं बार बढ़ाया है। यदि जनगणना-2021 को टाला जाता है तो ऐसे में बड़ा सवाल कि आखिर यह निर्णय कितना उचित रहेगा?

सवाल यह भी है कि कोरोना की वजह से जनगणना में देरी सिर्फ भारत में हो रही है या दूसरे देशों में भी ऐसे ही हालात हैं? बताया जाता है कि अमेरिका में कोरोना पीक पर होने के बावजूद 2020 में जनगणना कराई गई। इसी तरह से यूके, इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और आयरलैंड में अलग-अलग एजेंसियों ने कोरोना लहर के दौरान तय समय पर जनगणना के लिए डेटा जुटाना शुरू कर दिया था।

अब इन देशों की एजेंसियां डेटा को व्यवस्थित करके इसका एनालिसिस कर रही है। पड़ोसी देश चीन ने भी अपने यहां कोरोना महामारी के दौरान तय समय पर जनगणना कराई थी। यह कहा जा सकता है कि जनगणना का कार्य हमारी प्राथमिकता में नहीं रहा, अन्यथा जनगणना को तय समय पर करवाया जा सकता था।

दरअसल, किसी भी मुल्क के लिए जनगणना कई मायनों में महत्वपूर्ण है। किसी एक मुल्क के विकास का पैमाना तय करने में जनगणना की उपयोगिता बढ़ जाती है। जनगणना उस प्रक्रिया को दिया जाने वाला नाम है, जो न केवल किसी मुल्क के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और जनसंख्या आदि के बारे में जानकारी उपलब्ध करवाती है, बल्कि देश की विविधता और इससे जुड़े अन्य पहलुओं का अध्ययन करने का अवसर भी प्रदान करती है।

जनगणना वह माध्यम है, जिसके द्वारा नागरिकों को अपने समाज, जनसांख्यिकी, अर्थशास्त्र, मानव जीवन, समाजशास्त्र, सांख्यिकी आदि द्वारा उन समस्त के बारे में अपडेट देती है, जो उनके जीवन को प्रत्यक्ष या फिर परोक्ष रूप से प्रभावित करते हैं।? इसके अलावा भी जनगणना के आंकड़े कई मायनों में बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। केंद्र और राज्य सरकारों के लिए योजना और नीति-निर्धारण में बहुमूल्य जानकारी साझाकरण का कार्य जनगणना के आंकड़े ही करते है।

वहीं, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, विद्वानों, व्यापारियों, उद्योगपतियों के साथ-साथ अन्य कई लोगों द्वारा व्यापक रूप से आंकड़े उपयोग में लिए जाते हैं। जनगणना को आंकड़ों का एक व्यापक स्रोत माना जाता है। इसके अन्तर्गत ही किसी मुल्क की जनसांख्यिकी लाभांश के बारे में जानकारी इकट्ठा की जाती है। जो मुल्क की नीति निर्माण को पूवार्नुमान की सटीकता के समीप ले जाती है। किसी भी मुल्क के साक्ष्य आधारित निर्णयों में इसका महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है।

किसी भी जनगणना में जुटाए आंकड़े शासन-प्रशासन, योजनाओं और नीतियों के निर्माण के साथ-साथ इनके प्रबंधन में भी बेहद सहायक होते हैं। किसी क्षेत्र विशेष के विकास के लिए आवश्यक निर्णयन में जनगणना से प्राप्त आंकड़ों की भागीदारी बढ़ जाती है। इसका महत्त्व इसलिए भी है, क्योंकि समाज के सबसे निचले तबके के लोगों को ध्यान में रखते हुए सरकारी कार्यक्रमों के संचालन और उनकी सफलता को सुनिश्चित किया जाता है।

जनगणना के आंकड़ों का उपयोग अनुदान के निर्धारण में भी किया जाता है। देश के सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व उसकी जनसंख्या के अनुपात में देने का जिम्मा जनगणना के आंकड़ों के इर्द-गिर्द केन्द्रित है। इसके आधार पर ही लोकसभा, विधानसभा एवं स्थानीय निकायों के निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन किया जाता है। लिहाजा तय समय पर जनगणना करवाना जरूरी हो जाता है।

गौरतलब है कि साल 2026 में वर्तमान परिसीमन अवधि समाप्त हो जाएगी। लिहाजा लोकसभा में राजनीतिक संतुलन का बदलना तय है। यदि वर्ष 2021 की जनगणना नहीं होती है, तो जनसंख्या प्रबंधन के सबसे खराब रिकार्ड वाले राज्यों में मुख्यत: उत्तरी भारत की संसद में प्रतिनिधित्व में बड़े पैमाने पर वृद्धि होगी। इसके विपरित दक्षिण और पश्चिम भारत को नुकसान होगा। इसके अलावा, वित्त आयोग केंद्र और राज्यों के बीच कर राजस्व के वितरण पर मार्गदर्शन प्रदान करता आया है। देश में जीएसटी लागू होने के बाद से कर के वितरण के आधार अधिक विवादास्पद रूप ले चुके हैं। जबकि जनसंख्या के आंकड़े इस मामले में निर्णायक भूमिका निभाते है।

जनगणना-2021 को टाला जाना अनुचित कदम साबित होने वाला है। जैसा कि दशकीय जनगणना भारत द्वारा किया जाने वाला सबसे बड़ा डेटा संग्रह करने का काम होता है। यह न केवल जनसंख्या की वृद्धि के आकलन के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है, बल्कि पेयजल, स्वच्छता, आवास और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं के आकलन के लिए भी अहम है। जनगणना को राजनीतिक फैसलों, आर्थिक निर्णयों एवं विकास लक्ष्यों के लिहाज से भी जरूरी समझा जाता है। लिहाजा जनगणना-2021 की प्रक्रिया को अतिशीघ्र शुरू किया जाना चाहिए।


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