Saturday, June 12, 2021
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स्वास्थ्य मौलिक अधिकार क्यों नहीं?

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कोरोना महामारी की इस दूसरी लहर ने जो तबाही मचाई है और जिस प्रकार से तीसरी लहर की आशंका व्यक्त की जा रही है, उसे देखते हुए यह अपरिहार्य हो गया है कि सरकार, जन स्वास्थ्य को प्राथमिकता में वरीयता दे। सुबह के अखबार से लेकर सोशल मीडिया का जायजा लीजिए तो सारे माध्यम शोक समाचारों से भरे पड़े हैं। सरकारी आंकड़ों पर न जाएं, वे कभी भी विश्वसनीय नहीं समझे जाते रहे हैं, और आज भी उनकी विश्वसनीयता सन्देह से परे नहीं है। गंगा यमुना का विस्तीर्ण मैदान, संगम के पास गंगा का विशाल रेतीला पाट अविश्वसनीय रूप से एक बड़े कब्रिस्तान में तब्दील हो चुके हैं। इनमें दफन होने वाले वे लोग हैं जिनके लिए कोई शोक श्रद्धांजलि अखबारों में नहीं छपवायेगा, क्योंकि उनके नसीब में तो कुछ बोझ लकड़ी के भी मयस्सर नहीं रहे। देश के संविधान में देश को लोक कल्याणकारी राज्य बनाने के लिए दो बेहद महत्वपूर्ण प्रावधान हैं। एक अनुच्छेद 12 से 35 तक के वर्णित मौलिक अधिकार, जो अमेरिकी संविधान से हमने लिया है और दूसरा, अनुच्छेद 37 से 51 तक नीति निर्देशक तत्व।

मौलिक अधिकार राज्य के लिए बाध्यकारी हैं जबकि नीति निर्देशक तत्व, एक गाइडिंग सिद्धांत है कि राज्य कैसे नागरिकों का जीवन स्तर सुधार कर लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करेगा। यह दोनों महत्वपूर्ण प्रावधान, संविधान के मूल ढांचे के अंग हैं। इसी लोक कल्याणकारी राज्य की परिभाषा में जन स्वास्थ्य भी आता है जो आज अचानक एक महामारी की आपदा के कारण प्रासंगिक हो गया है। यहीं एक जिज्ञासा उठ सकती है कि, क्या स्वास्थ्य का अधिकार, संविधान में एक मौलिक अधिकार है या नहीं? इसका उत्तर होगा कि, संविधान के अंतर्गत कहीं पर भी, एक मौलिक अधिकार के रूप में, स्वास्थ्य के अधिकार को शामिल नहीं किया गया है। लेकिन अनेक अदालती फैसले ऐसे हैं जो संविधान के अनुच्छेद 21 की व्याख्या में, उसके अंतर्गत, स्वास्थ्य के अधिकार को मौलिक अधिकार के समकक्ष मानते हैं। क्योंकि संविधान का अनुच्छेद, 21, नागरिकों को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। इसके अतिरिक्त, संविधान के विभिन्न प्रावधान जगह जगह, जन स्वास्थ्य से संबन्धित, मुद्दों पर नागरिकों के अधिकार और, राज्य के दायित्व की बात करते हैं, पर स्वास्थ्य के अधिकार के रूप में, अनुच्छेद 21 ही है, जो एक मौलिक अधिकार के समान पहचान देता है।

स्वास्थ्य से तात्पर्य, केवल निरोग या बीमार होने पर इलाज की ही सुविधा मिले, ऐसा नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और सामाजिक आरोग्यता को समेटे हुए है। किसी भी राज्य के स्वास्थ्य का पैमाना, उसके नागरिकों के स्वास्थ्य के विभिन्न पैरामीटर से आता है। जिसमें हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के अतिरिक्त, नागरिकों की औसत आयु में वृद्धि, पोषण की स्थिति, शिशु मृत्यु दर में कमी, संक्रामक रोगों की स्थिति और उन पर नियंत्रण, आदि है, जिसका आकलन संयुक्त राष्ट्र संघ अक्सर समय समय पर करता रहता है। स्वास्थ्य, किसी भी देश के विकास के महत्वपूर्ण मानकों में से एक है।

मनुष्य के जीने के अधिकार की जब बात की जाती है तो केवल पेट भर लेना ही पर्याप्त नहीं होता है। जीवन के अधिकार के विषय में मानवीय गरिमा के साथ जीवन यापन की बात कही जाती है। गरिमा को कुछ ही शब्दों में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है। इसके अंतर्गत सबसे महत्वपूर्ण है, स्वास्थ्य और शिक्षा। यह दोनों ही लोक कल्याणकारी राज्य के अभिन्न अंग हैं। गरिमापूर्ण जीने के अधिकार के अंतर्गत, जीवन की अन्य मौलिक आवश्यकताएं, जैसे पर्याप्त पोषण, कपड़े और आश्रय, और विविध रूपों में पढ़ने, लिखने और स्वयं को व्यक्त करने की सुविधा एवं सामाजिकता इत्यादि का समावेश है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 47, ‘पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊंचा करने तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार करने के राज्य के कर्तव्य’ के विषय की भी चर्चा करता है।

संविधान और संविधान की व्याख्या करने वाली अदालतें, भले ही राज्य को उसके कर्तव्यों और दायित्वों की याद दिलाते रहें कि, एक कल्याणकारी राज्य में यह सुनिश्चित करना राज्य का ही दायित्व होता है कि अच्छे स्वास्थ्य के लिए परिस्थितियों का निर्माण किया जाए और उनकी निरंतरता को सुनिश्चित किया जाए। जीवन का अधिकार, जो सबसे मूल्यवान मानव अधिकार है और जो अन्य सभी अधिकारों की संभावना को जन्म देता है, उसका संरक्षण किया जाए, पर इसका व्यवहारिक पक्ष अदालती व्याख्या से सदैव अलग रहता है। महामारी के इस काल में जहां स्वास्थ्य के ऊपर खतरा कई गुना बढ़ा है, विश्व की अर्थव्यवस्था भी ध्वस्त हो रही है और मानव जीवन के हर पहलू को इस महामारी ने अपनी चपेट में ले लिया है, अत: इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दिया जाना आवश्यक है।

न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत स्वास्थ्य के अधिकार की व्याख्या करते हुए अपने लिए चिकित्सीय देखभाल को चुनने के अधिकार के दायरे का विस्तार किया है। यह भी कहा है कि इस अधिकार के अंतर्गत, अपनी पसंद की प्रयोगशाला में परीक्षण करने की स्वतंत्रता भी शामिल है और सरकार उस अधिकार को छीन नहीं सकती है। राज्य विशेष रूप से व्यक्ति की पसंद को सीमित करके उसे अक्षम नहीं कर सकता है जब एक ऐसी बीमारी की बात आती है जो उसके या उसके परिजनों के जीवन/ स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।

जब आग लगती है तो कुआं खोदना शुरू नहीं किया जाता है। बल्कि पुराने कुएं, बावड़ी आदि का जल उस समय आपात स्थिति में काम आता है। हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर भी ऐसी चीज नहीं है जिसे रातों रात बेहतर बनाया जा सके। रातों-रात, किसी भी बड़े हॉल को बेड, आॅक्सीजन और अन्य मेडिकल उपकरणों द्वारा सुसज्जित कर के उसका उद्घाटन करा कर सुर्खियां बटोरी जा सकती हैं, और आत्ममुग्ध हुआ जा सकता है, पर रातोंरात, डॉक्टर और अन्य प्रशिक्षित पैरा मेडिकल स्टाफ का इंतजाम नहीं किया जा सकता है।

इसके लिए एक व्यापक योजना बनानी होगी और सरकारी क्षेत्र के साथ निजी क्षेत्र के भी इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग करना होगा। सरकार को बेड, दवाओं, अन्य जांचों की एक ऐसी दर तय करनी होगी जिससे एक आम व्यक्ति भी अपना इलाज करा सके और ऐसा भी न हो, कि बीमारी से तो वह बच जाए, पर विपन्नता और कर्ज से से मर जाए। यही संविधान के अंतर्गत दिया गया सम्मान से जीने का अधिकार, प्रासंगिक और महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकार को अब अपनी प्राथमिकता लोक कल्याणकारी राज्य के उद्देश्य को दृष्टिगत रखते हुए बदलनी पड़ेगी।


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