Monday, June 1, 2026
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लद्दाख के लोगों का विश्वास जीतें

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लद्दाख के लोगों का विश्वास जीतें 2

लद्दाख पिछले कुछ वर्षों से कुछ मुद्दों को लेकर आंदोलित है। वहां धारा 370 हटने की खुशी मनाई गई थी, क्योंकि वह काश्मीर के निजाम में उपेक्षित महसूस करता था। नई व्यवस्था बनने से केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिल गया, किन्तु धीरे-धीरे समझ आने लगा कि बिना विधानसभा के केन्द्रशासित प्रदेश का दर्जा आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पाएगा। चुने हुए स्थानीय प्रतिनिधियों वाली विधानसभा के बिना यहाँ की जन-अपेक्षाओं को समझना और पूरा कर पाना संभव नहीं है। खासकर वहाँ की जमीनों पर, जिनकी खरीद-बिक्री पर धारा 370 की वजह से रोक लगी थी, बाहरी कब्जे का खतरा पैदा हो गया था।

पहाड़ के लोग कठिन परिस्थितियों में जीवन-यापन करते हैं और उनके लिए मुख्यधारा के धन्ना सेठों से प्रतिस्पर्धा कर पाना संभव नहीं होता। यदि खुले खेल की नौबत आती है तो स्थानीय लोग तात्कालिक लाभ के लालच में अपनी जमीनों और संसाधनों से वंचित हो जाएंगे। इस समझ के चलते ही चुनी हुई विधानसभा के साथ संविधान की ‘छठी अनुसूची’ के प्रावधान लागू करने की मांग उठने लगी थी, जिसका सत्तारूढ पार्टी और केन्द्र सरकार ने वादा भी किया था। विशालकाय सौर-ऊर्जा और पवन-ऊर्जा परियोजनाओं के लिए 80 वर्ग किलोमीटर जमीन पांग क्षेत्र में अधिग्रहण की गई है। 21 मार्च 2003 को राज्यसभा में सूचना दी गई थी कि पांग, डबिंग, और खरनाक में सौर, पवन उर्जा के लिए 250 वर्ग किलोमीटर जमीन अधिग्रहण की जाएगी। 2070 मेगावाट जलविद्युत बनाने की भी योजना है। लद्दाख में बहुत से दुर्लभ खनिज पाए जाते हैं जिनके परिवहन के लिए विशाल सड़क और रेल परियोजनाएं हैं। कुछ खनन पट्टे दिए भी गए हैं। जाहिर है, स्थानीय चुनी हुई सरकार न होने से इतने बड़े पैमाने पर कॉपोर्रेट घरानों के परियोजना-कार्यों से पर्यावरण को होने वाली हानि को कौन रोक सकेगा? जिन कॉरपोरेट कंपनियों को अपने लाभ के अलावा कुछ नहीं दिखता, उनके भरोसे स्थानीय लोग इस संवेदनशील पर्यावरण को नहीं छोड़ना चाहते।

‘छठी अनुसूची’ के प्रावधान लागू होने से स्थानीय व्यवस्था को इन परियोजनाओं की मनमानी रोकने के कुछ कारगर उपकरण मिलेंगे। यह तो देशहित में ही है कि स्थानीय लोगों की सहभागिता सुनिश्चित करके विकास को पर्यावरण-सम्मत दिशा दी जाए। इससे वैकल्पिक तकनीकों के सुझाव भी मिल सकेंगे जिससे इन परियोजनाओं के पर्यावरणीय नुकसान को कम किया जा सकेगा। स्थानीय लोग कैसे इन कार्यों से आर्थिक रूप से लाभान्वित हो सकेंगे, यह भी देखना संभव होगा। इसी के साथ कारगिल और लेह के लिए दो अलग-अलग लोकसभा सीटें और नौकरियों में स्थानीय निवासियों को संरक्षण की मांग है। ये मांगें किसी भी हालत में संविधान से बाहर नहीं हैं। संविधान के विभिन्न प्रावधानों के अंतर्गत अन्य कई राज्यों में आर्थिक और सामाजिक तौर पर पिछड़े समुदायों को इस तरह के संरक्षण दिए गए हैं। लद्दाख में 90 से 95 प्रतिशत आबादी जनजातीय समुदायों की है जिनकी विशिष्ट संस्कृति है। आर्थिक-सामाजिक रूप से भी ये लोग कठिन जलवायु और अति संवेदनशील पारिस्थितिक हालत में रहने के कारण हाशिए पर रहने वाले लोग हैं।

इन आधारों पर उनकी मांगें तर्क-सम्मत ही हैं। हां, उनमें संवाद से कुछ घटा-बढ़ी तो की ही जा सकती है, किन्तु सरकार ने इस मामले को लटकाकर पेचीदा बनाने का काम किया है। आन्दोलनकारी लंबे समय से आशावान थे। जाहिर है, ऐसे में कुछ लोग थकावट भी महसूस करने लगते हैं। इतना समय बार-बार देना भी संभव नहीं होता, क्योंकि रोटी-रोजी भी कमानी पडती है। ऐसे दबाव में आन्दोलन या तो असफल होकर चुप बैठ जाते हैं या जल्दबाजी में हिंसा को बुरा न मानने वाले नेतृत्व के हाथ में खिसक जाते हैं। इसके अनेक उदाहरण हैं जहां सरकारों ने थकाकर आंदोलनों को असफल करने का हथकंडा अपनाया। लद्दाख के मामले में भी लगभग यही सोच काम कर रही थी। बातचीत की कुछ पहलें तो हुर्इं, किन्तु परिणाम नहीं निकल सके। इससे क्षुब्ध कुछ युवाओं ने लद्दाख में पिछले दिनों अवांछित तोड़-फोड़ करके अपने ही आंदोलन को कमजोर करने की गलती कर दी। 24 सितंबर को अनशन पर बैठे लोगों में से कुछ की हालत बिगड़ने के कारण भी उपेक्षा-जनित क्रोध हावी हो गया। इससे सरकारों को आन्दोलन के नेतृत्व को कैद करने का बहाना मिल गया और समाज की सहानुभूति बटोरने के प्रयास आन्दोलन विरोधी शक्तियों द्वारा किये जाने लगे।

प्रशासन की ओर से गोलीबारी करके स्थिति को संभालने के अन्य उपायों-हल्के लाठीचार्ज, आंसूगैस, रबड़ की गोलियों के विकल्प, पानी की बौछार आदि प्रयोग किये बिना सीधे गोली चलाई, वह भी टांगों पर चलाने के बजाये घातक तरीके से चलाई गई जिसमें चार युवाओं की दुखद मृत्यु हो गई। इस तरह की घटनाएं समस्या के समाधान में दोनों ही तरफ से बाधक सिद्ध होती हैं जिनसे आन्दोलनकारियों, सरकारों और प्रशासन को बचना चाहिए था। अब सारी जिम्मेदारी सोनम वांगचुक पर डालकर, हालात को समाधान से हटाकर आपसी अवांछित अहंकार की प्रतिस्पर्धा की ओर मोड़ देना दीर्घकालीन देशहित में नहीं है।

ऐसे में शीघ्र बातचीत द्वारा मसले के जरूरी तत्वों को समझकर फैसला किया जाना चाहिए। सोनम वांगचुक के चरित्रहनन के प्रयास निंदनीय हैं। ‘एफसीआरए’ (फॉरेन कन्ट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट) के प्रावधानों के उलंघन का आरोप लगाया जा रहा जिनका हर साल निरीक्षण होता है। आज जब सोनम आन्दोलन का नेतृत्व करने लगे तभी उन प्रावधानों के उलंघन की बात क्यों की जाने लगी? इसका अर्थ तो यह हुआ कि इन प्रावधानों का प्रयोग समय-समय पर सरकार ऐसी आवाजों को कुचलने के लिए करती है जिनको वह नापसंद करती है।

सोनम एक सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं जिनको विश्वभर में अनेकों पुरुस्कार मिले हैं। जो व्यक्ति ग्लेशियर और हिमालय के संवेदनशील पर्यावरण को बचाने के कार्य में लगा हो उसके ऊपर आप संदेह कैसे कर सकते हैं? सेना के लिए कम खर्च में सौर-ऊर्जा से गर्म आवास बनाकर उन्होंने सैनिक कार्यों में भी सहयोग किया है। उनकी कोई राजनैतिक महत्वाकांक्षा भी नहीं है। वह तो केवल अपने इलाके की बेहतरी और पर्यावरणीय टिकाउपन के लिए कुछ शासकीय प्रावधानों की मांग में जनाकांक्षा के साथ है। समय और परिस्थिति की मांग है कि सोनम वांगचुक को तत्काल रिहा किया जाए और लद्दाख में जो जरूरी वैधानिक और प्रशासनिक सुधार की जरूरत है, उनको आपसी सहमति से लागू किया जाए। देश के सीमा क्षेत्र में, जहां दोनों ओर विरोधी बैठे हों, समाज के मन में यह भाव पैदा होने नहीं दिया जा सकता कि उनकी कोई सुनवाई नहीं है। केंद्र सरकार तत्काल समस्या के समाधान के लिए पूरी सदाशयता से सक्रिय होकर हालात को सामान्य बनाकर लद्दाख के लोगों के विश्वास को जीतने का काम करे, यही देशहित में है।

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