Thursday, May 21, 2026
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बेसहारा

 

Ravivani 3


अपने अरमानों का गला घोंटकर रामप्रसाद और उनकी पत्नी कमला ने अपने बेटे सुमित को उच्च अधिकारी होने लायक बनाया। पैसे काट-काटकर उसे अच्छी शिक्षा दिलाई, ताकि एक दिन वह उनके बुढ़ापे का सहारा बन सके। अपने कष्टों को दरकिनार कर उसके पालन -पोषण में कोई कमी नहीं होने दी। उसे हर सुख-सुविधा मुहैय्या कराई और स्वयं दीनता से जीवन व्यतीत करते रहे। जीवन के अंतिम पड़ाव में भी बुढ़ापे के सहारे ने उन्हें ठुकरा दिया। उन दोनों ने कभी इसकी कल्पना भी नहीं की होगी कि जिस पौधे को उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचा, वही पौधा एक दिन उन्हें छाया देने के भी योग्य नहीं रहेगा। उनके इकलौते बेटे ने उन्हें कूड़े की ढेर की तरह घर से बाहर कर दिया।

वे दोनों दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर थे। उन दोनों के लिए अपनी ही जिंदगी बोझ बन चुकी थी। जीवन भर अपने सपने को सजोने वाले रामप्रसाद और कमला को उसी सपने के सौदागर ने फुटपाथ पर लाकर बिठा दिया था।
सर्पदंश से पीड़ित दोनों अपने भाग्य को कोस रहे थे। उनकी खोज-खबर भी लेना वाला कोई नहीं था। फटे- पुराने कपड़ों में लिपटे दोनों भीषण शीत लहर में थर-थर कांप रहे थे। फुटपाथ पर बैठे वे दोनों इस भीषण ठंड से डटकर मुकाबला करने को विवश थे। जैसे-जैसे रात गहराती जा रही थी, बर्फीली हवा दोनों के शरीर में मानों सुई चुभो रही थी।

सुनसान रात और घने कोहरे के बीच फुटपाथ पर बैठी कमला सोच रही थी कि कितने अरमानों से अपने बेटे की शादी की थी। सोचा था कि घर के आंगन में खुशियों की बहार आएगी। लेकिन यहां तो उल्टा ही हो गया। बहू के घर में कदम रखते ही घर के आंगन में खिले खुशियों के फूल पलभर में ही मुरझाने लगे। तिनका-तिनका जोड़ कर बनाया घर बिखरने लगा। बहू ने आते ही उन दोनों पर तरह-तरह के जुल्म ढाने लगी। बात-बात पर उलाहने देनी लगी। वे दोनों बहू के लिए बोझ बन गए थे।

बहू उन दोनों को मार्ग का अवरोधक समझने लगी थी। बहू सुमित के कान भरने लगी। उन दोनों को घर से निकालने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाने लगी। सुमित पत्नी के आगे नतमस्तक था और उसी के कहने पर उसने अपने बूढ़े मां-बाप को घर से बाहर कर दिया।

रामप्रसाद का शरीर भीतर से एकदम खोखला हो चुका था और वे चलने-फिरने से लाचार थे। जीवन के अंतिम पड़ाव में जहां उनके हाथ-पांव कांपते थे, वहीं कमला के शरीर में भी बुढ़ापे का घुन लग चुका था। उसके चेहरे और हाथों में ऐसी दरार पड़ी गई थी, मानो जिस प्रकार सूखे के कारण धरती फट जाया करती है। भीषण शीतलहर में वे दोनों चुपचाप बैठे थे, जैसे आंधी आने से पहले पूरे वातावरण में वीरानगी छा गयी हो।

लंबी चुप्पी को तोड़ते हुए रामप्रसाद ने कहा-‘कमला , हमारे तो अरमानों की चिता ही जल गयी। पत्नी के बहकावे में आकर हमारा बेटा हमें घर से बाहर कर दिया। हमें दर-दर की ठोकरें खानें पर मजबूर कर दिया। अब हम इस बुढ़ापे में क्या करेंगे? आखिर हमारी जिंदगी कैसे कटेगी? इस बुढ़ापे में हमें अब कौन सहारा देगा? अब हम कैसे अपनी बाकी जिंदगी गुजारेंगे?’

कमला अपने पति की बातों को सुन नहीं रही थी। वह तो अपने दर्द के सैलाब में इस प्रकार डूबी थी मानो उसे कोई ध्वनि ही सुनाई नहीं दे रही हो। वह तो विक्षिप्त-सी आकाश को एकटक निहार रही थी।

रामप्रसाद ने कमला को झकझोरते हुए कहा-‘कमला, तुम कहां खो गर्इं? तुम्हें तो अपने बेटे पर बड़ा अभिमान था कि एक दिन वह हम लोगों की खूब सेवा करेगा। हमें किसी चीज की कमी नहीं होने देगा। हमारी सुख-सुविधा का ख्याल रखेगा। हमें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होने देगा। लेकिन वह तो इसके ठीक विपरीत निकला। हमें दर्द ओर आंसुओं के समंदर में डुबो दिया। हमें घर के कूड़े की ढेर की तरह निकाल फेंका। अभाव और कष्टों की जिंदगी जीने पर मजबूर कर दिया। वह भी जीवन के अंतिम पड़ाव में। उसने तो हमारे अरमानों का गला घोंट दिया।’

कमला अपने आपको कोसते हुए बोली-‘यदि मैं जानती कि वह हमें बुढ़ापे में इस प्रकार कचरे की ढेर की तरह घर से बाहर कर देगा , तो मैं उसे जन्म ही नहीं देती। बहू ने आते ही उस पर न जाने क्या जादू कर दिया कि वह हम लोगों को इस प्रकार बेसहारा कर घुटन भरी जिंदगी जीने पर मजबूर कर दिया। यदि मैं जानती कि सुमित विवाह के बाद जोरू का गुलाम हो जाएगा, तो मैं उसकी शादी ही नहीं करती। अपने आगे की भविष्य के लिए कोई आश्रय जरूर खोज लेती। लेकिन उसने तो हमें कहीं का नहीं रहने दिया।’

रामप्रसाद दुखों के समंदर में गोता लगाते हुए बोले-‘हम लोगों से वह इतना ही परेशान हो गया था, तो मुझे ही घर से बाहर निकाल देता। कम-से- कम अपनी बूढ़ी मां पर तो तरस खाता, जिसने नौ माह अपने गर्भ में रखकर पाला और न जाने कितनी रातें उसके खातिर जागकर बितार्इं। कम-से- कम अपनी मां को तो घर के किसी कोने में रहने की जगह दे देता।

मां-बाप कई बच्चों को एकसाथ पाल-पोसकर उसे इस योग्य बना देते हैं कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके। लेकिन एक बेटा अपने बूढ़े मां-बाप की परवरिश करने में असमर्थ हो जाता है। मां-बाप उनके लिए बोझ बन जाते हैं। विवाह के बाद सुमित के व्यवहार में इतना बदलाव आ जाएगा, मैंने इसकी कल्पना भी नहीं की थी। कितना निर्दयी बन गया है वह बहू के आने से। अब तो हमें कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा क्या यूं ही दर-दर की ठोकरें खातें फिरेंगे? आखिर कैसे कटेगी हमारी जिंदगी?’

कमला एकदम उदास स्वर में बोली-‘तो अब हम क्या करेंगे? क्या यूं ही घुट-घुटकर मरेंगे? इस प्रकार घुट-घुटकर मरने से तो अच्छा है कि हम अपने घर वापस चलें।’ ‘घर’ शब्द सुनते ही रामप्रसाद एकदम से तिलमिला गए।

‘हां, इसके अतिरिक्त हमारे पास कोई और विकल्प भी तो नहीं है। जीवन के अंतिम पड़ाव में फुटपाथ पर मरने से तो अच्छा है कि घर चलें।’ कमला निराश स्वर में बोली।

रामप्रसाद एकदम नितांत स्वर में बोले-‘तुम किस घर की बात कर रही हो। वो घर जहां बहू हमें गली का आवारा कुत्ता समझती है और हमारे उस घर में जाने से तुम्हारे उच्च अधिकारी बेटे की प्रतिष्ठा भी तो धूमिल होगी। वह हम दोनों को मां-बाप कहने से भी कतराता है। जहां हमारी कोई पूछ नहीं, वैसे घर जाने से अच्छा है कि हम यूं ही फुटपाथ पर दम तोड़ दें।’

कमला रामप्रसाद की बात सुनकर बोली-‘तो क्या हम यूं ही बाकी जिंदगी फुटपाथ पर ही बिताएंगे। अब तो हमारा कोई ठौर-ठिकाना भी नहीं है। क्या यूं ही फुटपाथ पर पड़े रहेंगे!’

रामप्रसाद कमला को दिलासा देते हुए बोले-‘हिम्मत न हारो कमला, दुनिया बहुत बड़ी है। हमें कोई न कोई अवश्य काम पर रख लेगा। हमारी मुसीबतों का हल अवश्य निकलेगा।’

‘तो क्या जीवन के अंतिम पड़ाव में भी हमें काम करना पड़ेगा? क्या इसीलिए अपने भविष्य को संजोये थे कि एक दिन वह हमें भिखारी बनाकर दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर कर देगा।’

रामप्रसाद नितांत उदास स्वर में बोले-‘कमला! इसके अतिरिक्त कोई और रास्ता भी नजर नहीं आता। अब तो अपने सारे सपने शीशे की तरह चकना चूर हो गए।’

‘हां, तुम ठीक कहते हो जब हमारे सपने ही टूट गए, तो अब जीने के लिए कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा, ताकि हमारी डूबती नैय्या पार लग जाए।’

रामप्रसाद बीते दिनों की बात याद करते हुए बोले-‘याद है जब हमारा सुमित छोटा था, तो हम दोनों का कितना ध्यान रखता था। वह कहता था कि आप दोनों को कोई काम नहीं करने दूंगा। आज वही सुमित जब उच्च अधिकारी बन गया, तो हमें मां- बाप मानने से इंकार करता है। हमारे कारण उसकी प्रतिष्ठा पर आंच आती है। अपनी प्रतिष्ठा और बहू के बातों में आकर हमें घर से निकाल दिया। वह हमें बोझ समझता है।’

वे दोनों अतीत की गहराइयों में गोते लगाने लगे। कमला बोली-‘तब अपना अभाव और कष्ट किस प्रकार सिमट जाया करता था, कुछ अहसास ही नहीं हो पाता था। लेकिन अपने सुख के दिन न जाने कहां चले गए। परदेस से आयी सोन चिरैया ….. बनकर …… दूर …. कहीं बहुत दूर ….. उड़े गए ….’
रामप्रसाद आशांवित होकर बोले-‘हो सकता है कि हमारे सुख के दिन वापस लौट आएं। सुमित हमें घर वापस ले जाने के लिए आ जाए। शायद हम लोगों पर बहू को तरस आ जाए। आखिर वह हमारा खून है।’

इतना सुनते ही कमला का खून खौल गया और वह गुस्से में बोली-‘उस नालायक में इतनी समझदारी होती, तो वह अपने ओहदे के सामने हम लोगों को तुच्छ समझता और बहू के कहने पर हमें इस प्रकार फुटपाथ पर भीख मांगने के लिए नहीं छोड़ देता। शायद! हमारी परवरिश में ही कमी रह गई। हम उसे वह संस्कार नहीं दे पाए जो देना चाहिए था।

इकलौता होने के कारण उसके हर गलत काम को सही ठहराते रहे। उसकी गलतियों पर परदा डालते रहे, जिसका परिणाम यह हुआ कि हमें ही घर से बेदखल कर दिया। अपने मां-बाप को भूलकर बहू के पीछे दीवाना हो गया। मर जाए उस कलमुंही के सारे परिवार वाले जिसने हमें इस उम्र में घर से बेघर कर दिया। जिसके कारण हमें सड़क की खाक छानने पर मजबूर होना पड़ा।

रामप्रसाद कुछ उत्साहित स्वर में बोले-‘ऐसा न बोल कमला, वह हमें लेने जरूर आएगा। वह हमें इस प्रकार फुटपाथ पर मरने नहीं देगा।’

‘नहीं…नहीं ! अब मैं उस घर में नहीं जाऊंगी। यदि हम लोग वापस गए तो सचमुच गली के आवारा कुत्ता हो जाएंगे। बहू तो पहले से ही हम लोगों कुत्ता समझती थी। घर जाने के बाद हम लोग ऐसे दुत्कारे कुत्ते हो जाएंगे, जो हर दरवाजे से निराश होकर वापस अपने मालिक के दरवाजे पर खड़ा हो दुम हिलाता रहता है।’

रामप्रसाद उदास स्वर में बोले-‘बहू हमें कुत्ता ही न समझती है, तो समझने दें। समझ लें आज से हम कुत्ते हो गए। जीवन के अंतिम पड़ाव मे दर-दर की ठोकर खाने से तो अच्छा है कि हम अपने घर के दरवाजे पर दम तोड़ दें। अब हम दोनों को जीना ही कितना है। बस! साल दो साल के मेहमान हैं।’

कमला को अपने पति की बातों में सच्चाई प्रतीत हुई और वह बोली-‘तुम ठीक कहते हो जी! अब हम दोनों को जीना ही कितना हैं। फिर उस घर को तो हमने अपने खून-पसीने की कमाई से बनाया है। आखिर उस घर पर हमारा भी तो कुछ अधिकार बनता है। आखिर सुमित हमारा खून है। वह हमें लेने जरूर आएगा।’

तभी फुटपाथ पर पड़े सूखे पत्ते खड़खड़ाने लगे। घने कोहरे के बीच मानो कोई आकृति उस ओर चली आ रही हो। कमला को लगा कि वह सुमित ही होगा, जो उन्हें घर ले जाने के आ रहा है।
कमला रामप्रसाद से बोली-‘देखो! हमारे खून सुमित को अपनी गलती का अहसास हो गया है। वह हमें घर ले जाने के लिए इस बर्फीली और घने कोहरे को चीरते हुए हमारी ओर आ रहा है।’

दोनों सांसे थामें उस ओर एकटक देखने लगे। लेकिन वह उनका बेटा सुमित नहीं बल्कि मरियल-सा एक आवारा कुत्ता था। और वे दोनों डाल से बिछुड़े पत्ते की तरह फड़फड़ाने लगे।

पुष्पेश कुमार पुष्प


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