Sunday, April 5, 2026
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जीवन का आदर्श

Amritvani 22


राजा भोज स्वयं तो विद्वान थे ही, वे अन्य विद्वानों का भी खूब सम्मान करते थे। एक बार उनकी राजसभा में बाहर के विद्वान भी आमंत्रित थे। भोज ने उन सभी से आग्रह किया-आप सभी विद्वान अपने जीवन में घटित कोई आदर्श घटना एक-एक कर सुनाएं। बस फिर क्या था, सभी विद्वानों ने अपनी-अपनी आपबीती कह सुनाई। राजा भोज किसी की घटना से भी प्रभावित नहीं लग रहे थे। अंत में एक दीन-हीन सा दिखने वाला विद्वान अपने आसन से उठा और थोड़ा झिझकते हुए बोला, मैं क्या बताऊं महाराज, वास्तव में तो मैं आपकी इस विद्वत सभा में आने का अधिकारी ही नहीं था, किंतु मेरी पत्नी का बड़ा आग्रह था, इसलिए चला आया। यात्रा का ध्यान करते हुए मेरी पत्नी ने एक पोटली में मेरे लिए चार रोटियां बांध दीं। मार्ग में भूख लगने पर जब मैं एक जगह खाना खाने लगा तभी एक कुतिया मेरे पास आकर बैठ गई। साफ लग रहा था कि वह भूखी थी। मुझे उस पर दया आ गई और मैंने उसके सामने एक रोटी रख दी। वह उसे वह तुरंत खा गई। इसके बाद मैंने जैसे ही खाने के लिए रोटियों को छुआ, वह फिर रोटी मिलने की इच्छा से दुम हिलाने लगी। मुझे लगा जैसे वह कह रही हो कि बाकी रोटियां भी मुझे ही दे दो। मैंने सभी रोटियां भी उसके आगे डाल दीं। बस महाराज, यही है मेरे जीवन में हाल में घटित सत्य और आदर्श घटना। स्वयं भूखा रहकर एक भूखे जीव को मैंने तृप्त किया और ऐसा करने से जो सुखद अहसास मुझे हुआ, वह मैं जीवन भर नहीं भूलूंगा। इतना कहकर वह चुप हो गया और सिर झुकाकर खड़ा हो गया। राजा इस वृत्तांत से भाव-विभोर हो गए। उस विद्वान को उन्होंने मूल्यवान वस्तुएं भेंट कीं और कहा- यही है जीवन का आदर्श।


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