Friday, March 6, 2026
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हस्तिनापुर में 76 वर्ष का तिरंगा बना धरोहर

  • देश की आन-बान और शान को संजोय है हस्तिनापुर का एक परिवार

जनवाणी संवाददाता |

हस्तिनापुर: महाभारत के मुख्य पात्र धर्मराज युधिष्ठिर की जन्म और कर्मभूमि हस्तिनापुर यू ही विश्व प्रसिद्ध नहीं है। महाभारत कालीन तीर्थ नगरी हस्तिनापुर का एक परिवार आज भी 76 वर्ष पुरानी देश की आन बान शान को संजोय है। देश की आजादी का प्रतीक पहला तिरंगा को परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित करता चला आ रहा है। तिरंगे को जब पुणे में एक अधिवेशन में प्रदर्शित किया गया तो लोग हैरान रह गए।

लोग इस तिरंगे को देखकर आजादी के 76 वर्ष की झांकी को महसूस करते हैं। देश की आन-बान-शान तिरंगे को हस्तिनापुर के नागर परिवार ने संजो रखा है और इसकी सुरक्षा व है पीढ़ी दर पीढ़ी करते आ रहे हैं। गुरु नागर ने बताया कि इस झंडे को उनके दादा ने उनके पिताजी को दिया और उनके पिताजी ने उन्हें दिया। जिसकी सुरक्षा है लंबे समय से करते आ रहे हैं और उन्हें इस तिरंगे पर आज भी गर्व है।

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उन्होंने कहा कि इस तिरंगे के नीचे कितने ही वीर बलिदान हुए जिन का बलिदान आज भी याद करते हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें यादगार के तौर पर यह तिरंगा उनके दादाजी को भेंट किया था। 23 नवंबर 1946 का वो ऐतिहासिक दिन मेरठ और देश के लिए किसी गौरव से कम नहीं। उस दिन मेरठ के विक्टोरिया पार्क में कांग्रेस के अंतिम अधिवेशन में देश की आन-बान और शान का प्रतीक तिरंगा झंडा फहराया गया था।

इस पल के गवाह बने थे मेरठ निवासी कर्नल गणपत राम नागर। इस अधिवेशन में पंडित जवाहर लाल नेहरू, सुचेता कृपलानी और जेबी कृपलानी के अलावा कर्नल शाहनवाज शामिल हुए थे। कांग्रेस के इस अधिवेशन में फहराया गया झंडा आज भी मेरठ के हस्तिनापुर में कर्नल गणपत राम नागर के पौत्र गुरु नागर ने बड़े हिफाजत से संभाल कर रखा हुआ है।

नेहरू ने यादगार के तौर पर भेंट किया था झंडा

गुरु नागर के छोटे भाई देव नागर बताते हैं कि उनके दादा को ये तिरंगा कांग्रेस के अधिवेशन समाप्त होने के बाद नेहरू जी ने यादगार के तौर पर दिया था। उन्होंने यह कहते हुए दिया था कि इस तिरंगे की हिफाजत का जिम्मा अब तुम्हारा है। उसके बाद से आज तक यानी आजादी के 75 साल बाद भी देश का ये पहला तिरंगा नागर परिवार ने बड़े हिफाजत के साथ सुरक्षित रखा हुआ है। 75 साल पुराने इस तिरंगे का आकार 14 फीट चौड़ा और नौ फीट लंबा है।

सरकारी उपेक्षा से आहत होकर ही नहीं सौंपा सरकार को

गुरु नागर और उनकी पत्नी अंजू नागर बताते हैं कि इस तिरंगे को लेने के लिए उनके पास कई बार सरकारी नुमाइंदे आए। लेकिन, उन्होंने इसे देने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि ये हमारे पुरखों की निशानी है और सरकार पता नहीं इसकी हिफाजत ठीक से करे या न करे? इसलिए उन्होंने इस तिरंगे को अपने पास ही रखा है। अंजू का कहना है कि सरकार देश की धरोहर का ठीक से ध्यान नहीं रखती हैं। आज उनके पास यह तिरंगा सुरक्षित है, अगर सरकार को सौंप देते तो यह कहां गया इसका पता नहीं चलता।

पं. जवाहरलाल नेहरू ने सौंपा था झंडा

स्व. कर्नल गणपतराम नागर के पोते गुरु नागर की मानें गुरु नागर की माने तो देश की आजादी से पहले मेरठ के विक्टोरिया पार्क में इस तिरंगे को देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के साथ कांग्रेस अध्यक्ष आचार्य भीके साथ कांग्रेस अध्यक्ष आचार्य जेबी कृपलानी द्वारा फहराया गया था। झंडारोहण के समय गणपत राम विक्टोरिया पार्क में मौजूद थे कांग्रेस के अधिवेशन में झंडे को फहराने के बादद हस्तिनापुर के मेजर जनरल गणपत रामनगर को देश की धरोहर को सौंप दिया गया।

मेजर जनरल गणपत राम नगर की पीढ़ी इस झंडे की हिफाजत करती आ रही है। मेजर जनरल गणपतराम नागर का जन्म 16 अगस्त 1905 को मेरठ के रहने वाले पं. विष्णु नागर के घर हुआ था। मेरठ कालेज से पढ़ाई की, उसके बाद वे ब्रिटिश आर्मी 1928 में किंग अफसर के पद पर नियुक्त हुए। इसके बाद 1939 में आजाद हिंद फौज में भर्ती हो गए और सुभाष चंद्र बोस के काफी नजदीक होने पर उन्हें मेजर जनरल की की पोस्ट से नवाजा गया था।

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