- गलतियों से सबक सीखने के बजाय उन्हें दोहराने की सिस्टम की बन गयी आदत
- जीडीपी ग्रोथ को लेकर अकारण नहीं आईएमएफ की आशंका, संकट से निपटने को नहीं थी पर्याप्त तैयारियां
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: कोरोना संकट और उससे पहले से गिरती अर्थ व्यवस्था के बीच आईएमएफ (इंटरनेशनल मॉनिटरिंग फंड) की ओर से भारतीय अर्थव्यवस्था में गिरावट की आशंका के लिए आईआईए के बडे उद्यमी संकट के वक्त बजाय थामने के सरकार की हाथ छोड़ देने की नीति को अधिक जिम्मेदार मानते हैं।
उनका साफ कहना है कि इंडस्ट्रीयल हालात खासतौर से लगातार माइनस में जा रही ग्रोथ के लिए केवल कोरोना को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। वो पूछते हैं कि कोरोना संक्रमण शुरू होने से पहले भी इंडस्ट्रीयल हालात बहुत अच्छे नहीं थे। शुरू की दो तिमाहियों का उदाहरण देते हुए उनका कहना है कि कोरोना संकट में तो सरकार ने बजाय इंडस्ट्रीज का हाथ पकड़ने के उल्टा छोड़ दिया।
मदद की घोषणाएं हवाई साबित हुई हुर्इं। इसके लिए बहुत हद तक सरकार को चलाने वाली आईएएस लाबी भी जिम्मेदार है। क्योंकि मिनिस्ट्री का इतना तर्जुबा होता नहीं। जैसे आईएएस समझाते हैं उसी पर सहमति दे दी जाती है। अब वक्त आ गया है कि यदि दूसरे देशों के साथ भारतीय बाजार को मुकाबला करना है तो उन देशों की तर्ज पर इंडस्ट्रीज को ईमानदारी से मदद के दोनों हाथ खोलने होगे।
भारत के बाजार पर चीनी माल की पकड़ का रोना रोने से बेहतर है कि हम भी अपनी तमाम इंडस्ट्रीज को चीनी सरकार की तर्ज पर सुविधाएं दें। बंगलादेश की तर्ज पर यहां के छोटे उद्योगों के लिए निर्यात के दरवाजे खोलें तो शायद हालात सुधर सकें, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है सिस्टम को चलाने वाले कोरोना की आड़ में बचकर निकलना चाहते हैं, लेकिन बाजारी कारोबारी हालात के लिए केवल कोरोना को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
मोहकमपुर इंडस्ट्रीयल एरिया के कुछ अन्य बडे उद्यमियों ने भी बाजारी हालात को लेकर कई बातें कहीं हैं। जिनका लबोलुआव कुछ इस प्रकार से है।
- लॉकडाउन के दौरान गयी लेबर का 60 फीसदी लौट आयी
- ज्यादातर श्रमिक आसपास के गांवों के हैं, बहुत कम श्रमिक दूरदराज के राज्यों
- फिक्स चार्ज में छूट के नाम पर बजाय हाथ खोलने के पॉवर कॉरपोरेशन ने मुट्ठी भींच ली
- बैंक लोन में जिस छूट की बात को जमकर प्रचारित किया गया उसको लेकर भी निराशा हाथ लगी
- डीजल की महंगाई से भी कारोबारी हालात बुरी तरह से प्रभावित हो रहे हैं। इस पर अंकुश जरूरी है।
ठीकरा फोड़ने के बजाय सीखें चीन से
आईआईए के नेशनल वाइस प्रेसीडेंट अतुल भूषण गुप्ता का कहना है कि बाजारी हालात के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराया जाता है। इंडस्ट्रीज के लिए यदि चीन सरीखी सहूलियतें यहां भी दी जाएं तो हम किसी भी प्रकार से चीन से कम नहीं। यहां इंडस्ट्री लगानी हो तो भूमि, बिजली कनेक्शन और लेबर के कायदे कानूनों में ही उलझ कर रह जाएंगे। जबकि चीन में इसको लेकर कोई झंझट नहीं। इसके अलावा यहां सिस्टम पर आईएएस लॉवी अधिक हाबी है। वहीं, मंत्रालय को चलाते हैं। ये तमाम खामियां हैं जिनकी वजह से जीडीपी माइनस में आ रही है।
समय रहते कर दिया था सावधान
आईआईए के स्टेट प्रेसीडेंट पंकज कुमार का कहना है कि जीडीपी ग्रोथ को लेकर उनके संगठन ने पहले ही सरकार को सावधान कर दिया था। कोरोना एक कारण हो सकता है, लेकिन इसके अलावा कई अन्य कारण हैं जिनकी वजह से जीडीपी ग्रोथ माइनस में जा रही है। आज जरूरत एमएसएमई को अधिक से अधिक रियायतें देने की है जीडीपी में 30 फीसदी की मदद करने वाली एमएसएमई अपने आॅफ जंप ले लेगी। यदि एमएसएमई ने जंप लिया तो इंडिया की ग्रोथ को किसी अन्य की मदद की जरूरत नहीं रह जाएगी।
हालातों के लिए अकेले कोरोना जिम्मेदार नहीं
आईएमए मेरठ चैप्टर के चेयरमैन अनुराग अग्रवाल का कहना है कि इंडस्ट्रीज के हालात के लिए अकेले कोरोना जिम्मेदार नहीं। डिमांड चेन तो पहले से कमजार थी। कोरोना ने तो इसको तोड़ देने का काम किया है, लेकिन कोरोना काल में सरकार से रियायत के नाम पर जो घोषणाएं की वो फाइलों से बाहर नहीं आ सकी। जमीनी स्तर पर उनका क्रियान्वयन नहीं किया गया। बिजली के फिक्स चार्ज, लोन की रकम पर ब्याज माफी तमाम ऐसी चीजें थी जिनको जमीनी स्तर पर लागू कर एमएसएमई को बड़ी रियायत दी जा सकती थी।
अच्छे नहीं है बाजारी हालात
आईआईए के मेरठ चेप्टर के सेक्रेटरी अंकित सिंहल का कहना है कि बाजारी हालात अच्छे नहीं है। सिस्टम की ओर से जो मदद की जानी चाहिए थी और जितनी की जानी चाहिए थी वो इंडस्ट्रीज खासतौर से छोट व मझोले उद्योगों को नहीं मिली सकी। मेरठ के मोहकमपुर इंडस्ट्रीयल एरिया के उद्योगों को लेकर रियायती की बातें तो बहुत कही गयीं, लेकिन उन पर जितना अमल होना चाहिए था वो उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। ऐसे में कैसे इंडस्ट्रीज में ग्रोथ की बात सोची जा सकती है और आने वाले दिनों में इंडस्ट्रीज की ग्रोथ तो दूर की बात है। हालात संभल जाए तो गनीमत समझो।





