Friday, May 1, 2026
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इस बजट से दूर नहीं होगी बदहाली

Samvad 1


bharat dograसंसद में पेश किए गए हाल के केंद्रीय बजट को लेकर कहा जा रहा है कि चुनाव-पूर्व के अपने आखिरी बजट में सरकार ने मध्यवर्ग को भारी संतुष्ट किया है, जबकि किसी भी बजट या वित्तीय योजना में समाज के सर्वाधिक वंचितों, गरीबों को अहमियत दी जानी चाहिए। इसके उलट हमारे यहां बजट-दर-बजट गरीबों को हाशिए पर धकेलने की हरकत की जाती है। इस बजट में भी यही हुआ है। वैसे तो बजट के अनेक पक्ष महत्वपूर्ण होते हैं, पर एक विशेष महत्व का विषय यह है कि निर्धन वर्ग को बजट से कितनी राहत मिलती है और उसकी टिकाऊ आजीविका को कितनी मजबूती मिलती है। विश्व स्तर के आंकड़ों के अनुसार सबसे अधिक निर्धन लोगों की मौजूदगी भारत में हैं और कोविड व लॉकडाऊन के बाद से उनकी समस्याएं बढ़ी हैं। इस दृष्टिकोण से देखें तो निर्धनता दूर करने के लिए हाल ही में प्रस्तुत केंद्र सरकार के बजट से और आगे जाना होगा। एक विशेष चिंता का विषय है कि मनरेगा का बजट बहुत कम रखा गया है। पिछले वर्ष इसका संशोधित अनुमान 89,400 करोड़ रुपए था, जबकि इस वर्ष मात्र 60,000 करोड़ रुपए का आवंटित हुआ है। आगे के वर्ष में जब संशोधित अनुमान तैयार होंगे तो इसे कहीं अधिक बढ़ाने की जरूरत होगी।

नेशनल सोशल अस्सिटेंस प्रोग्राम (राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम) के अन्तर्गत वृद्ध-नागरिकों, विधवा महिलाओं तथा अपंगता प्रभावित व्यक्तियों के लिए पेंशन प्रदान की जाती है, पर यह राहत इस महंगाई के दौर में बहुत ही कम है। यदि कोविड के विशेष पैकेज को छोड़ दिया जाए तो इस पेंशन कार्यक्रम के बजट में बहुत समय से कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है जिसका अर्थ यह है कि महंगाई के असर को मिलाकर देखा जाए तो वास्तविक अर्थ में उसके लिए उपलब्ध राशि कम हुई है।

दूसरी ओर उन लोगों की संख्या बढ़ी है जिन्हें यह पेंशन चाहिए। इस स्थिति में अनेक पेंशन प्राप्त करने वाले निर्धन व्यक्तियों की पेंशन रुक गई है व अनेक के आवेदन बहुत समय से अटके हुए हैं। अत: इस कार्यक्रम के लिए बजट बढ़ाना बहुत जरूरी हो गया है।

इसके बावजूद इस वर्ष इस कार्यक्रम के बजट को पहले जितना ही रखा गया है। महंगाई के असर को देखें तो वास्तव में कमी हुई है। अत: संशोधित अनुमान तैयार करते समय इस बजट को भी बढ़ाना चाहिए। पोषण कार्यक्रमों में कई तरह के सुधारों की बात कही गई है, जैस-मध्यान्ह भोजन में नाश्ते को जोड़ना, ऊंची कक्षा के छात्रों तक इस कार्यक्रम को ले जाना, आंगनवाड़ी को बेहतर करना।

इन सुधारों की चर्चा के बावजूद, यदि कोविड के विशेष पैकेज को छोड़ दिया जाए तो पोषण कार्यक्रमों के लिए कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है व महंगाई के असर को मिलाकर देखा जाए तो इनके बजट में गिरावट आई है। इस स्थिति में जिन सुधारों की चर्चा हो रही है, वे सुधार कैसे आ सकेंगे? जाहिर है, पोषण कार्यक्रमों के बजट को बढ़ाना अति आवश्यक है। इस वर्ष के बजट में प्रधानमंत्री पोषण कार्यक्रम के लिए जो आवंटन हुआ है वह पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान से कम है।

भारतीय खाद्य निगम को सरकार द्वारा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के क्रियान्वयन के लिए जो सब्सिडी दी जाती है, उसकी तुलना भी यदि पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान से की जाए तो इसमें कमी आई है। शिक्षा व स्वास्थ्य को विकास के अति महत्त्वपूर्ण क्षेत्र मानते हुए प्राय: यह माना जाता है कि इनका बजट आवश्यकता के अनुकूल रखना बहुत जरूरी है, पर भारत में एक बड़ी समस्या यह रही है कि हम विश्व स्तर पर इसके न्यूनतम मानक तक नहीं पहुंचे हैं।

केन्द्र व राज्य सरकारों को मिलाकर सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) का कितना प्रतिशत शिक्षा व स्वास्थ्य पर खर्च हो, भारत इन मानकों तक भी नहीं पहुंच पाया है। सरकारी स्तर पर भी स्वीकार किया जाता है कि यह संतोषजनक स्थिति नहीं है। यदि उचित मानकों तक पंहुचने का रोडमैप तैयार भी होता है तो हम उसका पालन नहीं कर पाते। सरकार को अब इस ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।

यह भी जरूरी है कि शिक्षा और स्वास्थ्य को मुनाफाखोरों से मुक्त किया जाए। ये दो क्षेत्र ऐसे हैं जिन्हें राष्ट्रीय हित में मुनाफाखोरों से मुक्त रखना बहुत जरूरी है, पर यहां मुनाफाखोरी तेजी से बढ़ी है। हमें स्वास्थ्य व शिक्षा के बजट को बढ़ाते हुए यह ध्यान में रखना होगा कि निर्धन परिवार व जनसाधारण को सहज शिक्षा व स्वास्थ्य उपलब्ध हो।

यदि इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया तो मुनाफाखोर ही बजट में हुई बढ़ोतरी को खा जाएंगे। सरकारी स्कूलों व अस्पतालों की स्थिति सुधारने के लिए, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों व निर्धन छात्रों की छात्रवृत्तियों के लिए बेहतर सहायता की जरूरत है। अनुसूचित जातियों, जनजातियों व अल्पसंख्यकों, अपंगता प्रभावित व्यक्तियों के लिए अनेक विशेष कार्यक्रम चले तो हुए हैं, पर उनकी बजटीय स्थिति मजबूत नहीं रही है।

ऐसे अनेक कार्यक्रमों को बजट से उम्मीद है कि उन्हें बेहतर संसाधन अवश्य उपलब्ध करवाए जाएंगे, क्योंकि उनकी जरूरी मांगें बहुत समय से लंबित हैं। विशेषकर अल्पसंख्यकों के बजट में कमी आई है व अपंगता प्रभावित व्यक्तियों के लिए बजट का आवंटन भी कुछ कम हुआ है, विशेषकर यदि केन्द्रीय सैक्टर की स्कीमों के संदर्भ में देखा जाए तो।

इसके अतिरिक्त पर्यावरण व आपदा-प्रबंधन के क्षेत्र में भी बेहतर बजट की बहुत जरूरत है व इसे भी निर्धन वर्ग व जनसाधारण की जरूरतों से अधिक जोड़ना चाहिए, ताकि पर्यावरण रक्षा के कार्य भी न्याय व समता आधारित रहें। यदि शाश्वत ऊर्जा क्षेत्र में मंगल टरबाईन जैसे अपने ही देश के आविष्कार को आगे बढ़ाया जाए तो यह सोने पर सुहागा होगा और प्रशंसनीय भी होगा।


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