- वृद्धाश्रम में जिदों और जरूरतों के पाटों में बिखरते परिवारों से उपजती नई संस्कृति
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: बदलते समय के साथ विलुप्त होते संयुक्त परिवार के स्थान पर एकल परिवार की संस्कृति को सहज रूप में स्वीकार कर रहे समाज के बीच पश्चिमी देशों से आने वाली ओल्ड ऐज होम कल्चर की दस्तक भारतीय समाज पर पड़ चुकी है। जिसको लेकर सरकारी स्तर से बेसहारा वृद्धों का सहारा बनने के लिए वृद्धाश्रम की स्थापना एक दशक पहले ही हो चुकी है।
जहां अपनी-अपनी जिदों और जरूरतों के पाटों के बीच पिसने वाले परिवारों से बिछड़ते और बिखरते वृद्धों के बीच जीवन के आखिरी पड़ाव पर एक-दूसरे से अंजान होने के बावजूद सहारा तलाश करने की ललक भी अंजान लोगों के बीच देखी जा सकती है।
यहां आप जो देखने जा रहे हैं, वह निसंदेह तस्वीर का एक ही पहलू हो सकता है। जहां कोई भी देखे, उसे एक ही पहलू दिखाई भी देने वाला है। यह सब कुछ एक पक्षीय होने के बावजूद भारतीय संस्कृति में समय के साथ होने वाले बदलाव की तस्वीर के साथ कई पहलू होने का आधार भी नहीं बन पाता। इस बदलाव की बुनियाद में संयुक्त परिवारों के घटते और एकल परिवारों के बढ़ते दायरों की कशमकश को महसूस किया जा सकता है।

हालांकि अभी इसे शुरुआत के तौर पर ही देखा जा सकता है। लेकिन आने वाले समय में इसमें कितनी वृद्धि हो सकती है, इसका अनुमान जरूर लगाया जा सकता है। बात वरिष्ठ नागरिक भरण पोषण अधिनियम-2007 से शुरू होती है, जिसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लागू किया जाता है। उत्तर प्रदेश में तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार ने 2014 में प्रदेश के हर जिले में उत्तर प्रदेश माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण नियमावली 2014 लागू किया।
जिसके अंतर्गत जिला स्तर पर 150 वृद्धों की क्षमता वाले वृद्धाश्रमों की स्थापना समाज कल्याण विभाग के माध्यम से कराई गई। इसके लिए एनजीओ का सहारा भी लिया गया। मेरठ में दुल्हैड़ा चुंगी मोदीपुरम में शोभित विवि से पहले एक भवन में चलने वाले वृद्धाश्रम का संचालन लखनऊ की संस्था गंगोत्री फाउंडेशन के जरिये इस स्थान पर 2020 से कराया जा रहा है। यहां से पहले वृद्धाश्रम गंगनगर में चलता रहा है।

किसी समय पब्लिक स्कूल बनाए गए भवन में चलाए जा रहे इस आश्रम में बने 35 कमरों में मेरठ और आसपास के जनपदों से इस समय 60 वृद्ध आश्रय ले रहे हैं। जिनमें 17 महिलाएं भी शामिल हैं। इनमें दो महिलाएं अपने पतियों के साथ ही रहती हैं। सबकी कहानी अलग-अलग होकर भी एक जैसी ही लगती है। ओमप्रकाश 66 वर्ष दौराला, राजकुमार 80 वर्ष भैंसवाल शामली, रमेश चंद शर्मा 74 वर्ष और कुसुमलता दंपत्ति शोभित कुंज समेत अधिकांश वृद्धों की कहानियां परिवार के आर्थिक संकट, दो पीढ़ियों के बीच जिदों को लेकर टकराव, जरूरतों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप के इर्द-गिर्द घूमती हैं,
तो कोई फसाना परिवार में वारिस के न होने जैसे दुख की बुनियाद पर बना हुआ है। वृद्धाश्रम के प्रबंधक आशीष कुमार पांडेय बताते हैं कि यहां 15 लोगों का मेल-फिमेल स्टाफ है। वर्तमान में यहां 60 रजिस्ट्रेशन है। जिनमें 56 वृद्ध मौजूद हैं, जबकि इक्का-दुक्का तमाम गिले-शिकवों के बावजूद अपने किसी रिश्ते की डोर से बंधकर आते-जाते रहते हैं, और दो-चार दिन लौट आते हैं। आश्रम में यह सब लोग एक-दूसरे के दुख-सुख के साथी हैं, और एक दूसरे का सहारा भी बन गए हैं।

प्रबंधक आशीष कुमार पांडेय का कहना है कि यहां का माहौल सभी वृद्धों के बीच परिवार जैसा हो जाता है। सभी एक-दूसरे के साथ अपने-अपने दुख दर्द बांटते हुए समय व्यतीत करते हैं। वहीं आश्रम की ओर से उनकी हर सुख सुविधा का पूरा ख्याल रखा जाता है। इस आश्रम को चलाने में करीब छह लाख रुपये महीना खर्च हो जाता है। किसी मेडिकल इमरजेंसी के समय पर दौराला सीएचसी की मदद ली जाती है।
एंबुलेंस के माध्यम से वृद्ध को हॉस्पिटलाइज कराया जाता है। आवश्यकता पड़े तो जिला अस्पताल या मेडिकल में रेफर कर दिया जाता है, जहां आश्रम का एक सेवादार भी उनके साथ में रहता है, सेवादारों में महिलाएं भी शामिल हैं। कई ऐसे भी हैं, जिन्हें कुछ समय बाद परिवार के सदस्य आकर अपने साथ ले गए हैं। इनके बीच होने वाले समझौते को भी रिकार्ड पर ले लिया जाता है।

