- करा रहा हरे पेड़ों का कटान, दो माह में दो दर्जन से भी अधिक पेड़ धराशाई
- कार्रवाई के नाम पर महज जुर्माना से इतिश्री
जनवाणी संवाददाता |
हस्तिनापुर: वन विभाग अपने ही बनाए नियम को तोड़ने पर आमादा है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि वन आरक्षित जंगल में आये दिन हरे पेड़ों का कटान किये जाने के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी मूकदर्शक बने हैं। महज एक महीने में हस्तिनापुर रेंज में बिना अनुमति के दर्जनों बेशकीमती सरकारी
और गैर सरकारी पेड़ों का कटान किया गया। वन विभाग की मिलीभगत के चलते सूचना के बाद भी विभागीय अधिकारियों कार्रवाई के नाम महज खानापूर्ति कर इतिश्री कर ली जाती है, जिसके चलते ठेकेदार के हौसले बुलंद है और वन क्षेत्र में आये दिन बिना अनुमि के हरे पेड़ों का कटान चलता रहता है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) देश में बढ़ते प्रदूषण पर सख्त है, जिसके चलते प्रदेश सरकार प्रतिवर्ष देश भर में करोड़ों की संख्या में पौधरोपण कर रही है, लेकिन विभागीय अधिकारियों की लापरवाही के चलते वन माफिया आए दिन हरे पेड़ों को अपना शिकार बना लेते हैं। वर्तमान मामला कस्बे के समीप वन अभ्यारण क्षेत्र में मौजूद कौरव वन का, जहां पर मध्य गंगनहर की सफाई का कार्य चल रहा है।
ठेकेदार में वन आरक्षित क्षेत्र से होकर गुजर रहे साइफन के किनारे लगे दर्जन भर से भी अधिक कीकर के पेड़ों को जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया। जानकारी के बाद भी वन विभाग के अधिकारियों ने मामले में कोई कार्रवाई अभी तक करते नजर नहीं आ रहे हैं, जबकि यहां पर पेड़ों को कटे हुए पिछले दो दिन बीत चुके हैं।
सेंचुरी क्षेत्र में धड़ाधड़ काटे जा रहे हरे पेड़ों की घटनाओं को देखकर लग रहा है कि अब हस्तिनापुर की सेंचुरी सिर्फ नाम की रह गई है। यहां पर पेड़ों के कटान में बड़ा खेल चल रहा है पर वन विभाग के अधिकारी कोई अंकुश लगाते नजर नहीं आ रहे हैं।
दो महीने में दो दर्जन से भी अधिक पेड़ धराशाई
वन आरक्षित क्षेत्र में दो पूर्व मध्य गंगनहर की पटरी किनारे हुए हरे पेड़ों का कटान कोई पहली बात नहीं है। लगभग दो महीने में पर ग्राम समाज की भूमि में करीब सात शीशम के कीमती पेड़ों को लकड़ी माफियाओं ने प्रतिबंध के बाद भी काट दिया था। जिस पर जुर्माने की कार्रवाई वन विभाग द्वारा की गई थी।

करीब एक सप्ताह पूर्व बाद प्राचीन पांडेश्वर महादेव मंदिर के समीप लाखों रुपये के चार अर्जुन के पेड़ों को लकड़ी माफियाओं द्वारा काटा गया मामला यहीं समाप्त नहीं हुआ 5 दिन पूर्व भी लतीफपुर के जंगल में सात शीशम के कीमती पेड़ों को बिना अनुमति के ही माफियाओं ने काट डाला। यहां पर भी वन विभाग ने जुर्माने की कार्रवाई की और इतिश्री कर ली अब करीब 15 कीकर के पेड़ों को उखाड़कर पूरी तरह नष्ट कर दिया गया है।
राजनीतिक संरक्षण तो कैसे हो कार्रवाई?
सूत्रों की माने तो लकड़ी माफियाओं की सांठगांठ राजनीतिक संरक्षण के चलते बहुत मजबूत है। प्रतिबंधित पेड़ों को काटने के बाद वह राजनीतिक आकाओं की शरण में पहुंच जाते हैं। जिससे वन विभाग के अधिकारी भी उन पर कार्रवाई करने से बचते हैं। हस्तिनापुर सेंचुरी में यह खेल दिन पर दिन फल-फूल रहा है। जिस पर अंकुश लगता नजर नहीं आ रहा है।
क्या कहते है विभागिय अधिकारी?
रेंजर को मौके पर भेजकर जांच कराई जाएगी। अगर पेड़ साइफन के बाहर खड़े थे और उन्हें काटा गया है तो क्षेत्रीय रेंजर मामले की जांच कर कार्रवाई करेंगे। राजेश कुमार डीएफओ मामला वन आरक्षित क्षेत्र का है। इसके बाद डीएफओ मेरठ का यह बयान हास्यपद ही नजर आता है।

