Friday, June 26, 2026
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जोखिम बहुत था…हर तरफ चीख-पुकार मची थी

मलियाना कांड ऐसा नरसंहार था, जिसको याद कर वर्तमान में भी लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। देश भर में ये कांड चर्चित हुआ। आयोग का गठन हुआ, जांच पड़ताल हुई। पीएसी के जवानों को इस कांड में कटघरे में खड़ा किया गया था, जिसमें आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में अदालत ने बरी भी कर दिया। मलियाना कांड क्या था? कितने लोगों की मौत हुई? ये पूरा घटनाक्रम कैसे हुआ? इसको हर कोई जानना चाहता हैं। इसको लेकर ‘जनवाणी’ ने मलियाना कांड की मौके पर पहुंचकर रिर्पोटिंग करने वाले वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार नीरजकांत राही और हरीशंकर जोशी से बातचीत की। तब फोटोजर्नलिस्ट मुन्ना ने जोखिम उठाते हुए पूरे कांड को किस तरह से कैमरे में कैद किया और जनता तक मलियाना में चले आपरेशन को जनता तक पहुंचाया भी। वरिष्ठ पत्रकार इस पूरे घटनाक्रम को याद कर सिहर उठते हैं, कहते है वो पत्रकारिता बेहतद जोखिम भरी थी। न वाट्सऐप था और न मोबाइल थे। ऐसे में मौके पर पहुंचकर ही ग्राउंड स्तर पर रिर्पोटिंग करनी बेहद जोखिम भरा था।

  • मलियाना कांड: वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र त्रिपाठी की आंखों देखी

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: मलियाना दंगे एक बार फिर सुर्खियों में हैं। उस दौरान दंगे की कवरेज करने वाले वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र त्रिपाठी से ‘जनवाणी’ ने मलियाना कांड को लेकर बातचीत की। क्योंकि राजेन्द्र त्रिपाठी और फोटोजर्नलिस्ट मुन्ना ने करीब से इस पूरे दंगे को कवर किया था। दोनों ने जोखिम भी उठाया और पूरा दंगा कवर भी किया। चतुराई भी दिखाई।

बकौल, वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र त्रिपाठी दौरान वो…अजीबो-गरीब माहौल था। सुबह के 11 बजे थे, हम बागपत चौराहे पर खड़े थे, मेरे साथ फोटोजर्नलिस्ट मुन्ना भी थे। तभी हमें खबर लगी कि मलियाना में बड़ा आॅपरेशन चल रहा हैं…कोई बड़ी घटना या दुर्घटना हो गई हंै। यह सूचना मिली थी। मैं और मुन्ना साथ में थे, तभी हम मलियाना की तरफ बढ़े।

..तब मलियाना व साबुन गोदाम एक वीरान जगह हुआ करती थी। जब हम मलियाना पहुंचे तो सड़क पर ही हमें रोक भी दिया गया था। वहां फायरिंग की आवाजें हमें आ रही थी। मैं और मुन्ना दोनों दीवार से चिपक कर खड़े हो गए थे। हमें शंका थी कि कहीं फायरिंग हमारी तरफ ना आ जाए। थोड़ी देर बाद देखा तो कुछ लोग जख्मी हालत में हैं, जिनको पीएसी के जवान लेकर सड़क पर आ रहे थे।

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उनको ट्रक में बैठाया जा रहा था। फोटोजर्नलिस्ट मुन्ना इस दृश्य की घायलों की फोटो खींच रहे थे, तभी पीएससी के जवानों ने मुन्ना का कैमरा भी छीन लिया और उसको ट्रक में बैठा लिया। इससे पहले मुन्ना से पीएसी जवानों ने पूछताछ की। फोटो क्यों क्लिक कर रहे हो, ये पूछा बताया गया कि हम अखबार वाले हैं। हम अपना काम कर रहे हैं, आप अपना काम करो…लेकिन पीएसी के जवानों ने कैमरा छीन लिया।

साथ ही मुन्ना को भी ट्रक में बैठा लिया। इस तरह का वहां पर बुरा हाल था। फायरिंग की आवाज आ रही थी, जिस तरह का उन्माद वहां पर था। उसे बयां नहीं किया जा सकता। कोलाहल था, चीख-पुकार सुनाई दे रही थी या फिर फायरिंग की आवाज सुनाई दे रही थी, जोखिम भी बहुत था, लेकिन भीतर नहीं जाने दिया। ट्रक पर लाकर जो लोग रखे जा रहे थे,

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उनको देख रहे थे और उन्हीं का फोटो क्लिक किया था, लेकिन मुन्ना ने इसमें चतुराई दिखाई और जो रिल थी उसको पीएसी के जवानों ने निकलवा लिया, लेकिन छोटे-छोटे टुकड़ों कटपीस में रिल रखी गई थी, बाकी को निकालकर मुन्ना ने अलग रख लिया था।

पीएससी के जवानों को ये बात समझ में नहीं आयी। रील निकालने की बात पीएसी के जवानों को पसंद आ गई, वहां से किसी तरह वो वापस अखबार के दफ्तर पहुंचे तथा इस पूरे आॅपरेशन की आॅफिस पहुंचकर जानकारी दी। शाम को दूरी टीम कवरेज के लिए भेजी गई।

…वो खौफनाक मंजर, दिल दहला देने वाला था

…वो लोगों का दर्द, हर तरफ से चीखें सुनाई दे रही थी। फायरिंग की आवाज भी आ रही थी। दिन ढल रहा था। धीरे-धीरे अंधेरा पसर रहा था। पसरते अंधेरे के बाद हर कोई सहमा हुआ नजर आ रहा था। उनके जीवन की ये बेहद चुनौतीपूर्ण पत्रकारिता थी। ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार हरीशंकर जोशी का। मलियाना कांड की कवरेज के लिए वो लगे हुए थे। उनके साथ बीबीसी के रिपोर्टर जसवीर उर्फ जस्सी थे।

भयावह तस्वीर भी कैमरे में कैद कर रहे थे, क्योंकि ये तस्वीर बेहद खौफनाक थी। मलियाना कांड के दर्द को हरी शंकर जोशी ने करीब से देखा। शाम के करीब 5 बजे थी, तभी हरी शंकर जोशी को मलियाना कांड की रात्रि में कवरेज करने के लिए लगाया गया था। बकौल, हरिशंकर जोशी बीबीसी रिपोर्टर जसवीर उर्फ जस्सी के साथ वह मलियाना गांव में पहुंचे।

पहले तो उन्हें सड़क पर ही रोक लिया गया था, लेकिन पुलिस से उनकी बहस हुई, जिसके बाद किसी तरह वे दोनों मलियाना गांव में स्थित तालाब पर पहुंच गए। जहां तालाब किनारे कई लोगों की लाश पड़ी थी और ग्रामीण विलाप कर रहे थे। खौफ उनके चेहरे पर साफ दिख रहा था। ग्रामीणों से उनकी बातचीत हुई, जिसके बाद पूरी घटना ग्रामीणों ने उन्हें बताई। धीरे-धीरे अंधेरा पसर गया था।

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उस दौरान पूरे गांव को पीएसी ने घेर रखा था। फायरिंग की आवाज आ रही थी। मकानों की छतों पर पीएसी के जवान चढ़े हुए थे, वहीं से फायरिंग हो रही थी। उधर, दूसरे संप्रदाय के लोग भी फायरिंग कर रहे थे। फायरिंग आमने-सामने की हो रही थी।

उस दौरान की पत्रकारिता को याद कर हरी शंकर जोशी कहते हैं कि इतना खौफनाक मंजर उन्होंने कभी जिंदगी में नहीं देखा। उनके सामने लाश पड़ी थी… लाशों को उठाकर पीएसी के जवान ले जा रहे थे। उस खौफनाम मंजर के हरी शंकर जोशी गवाह बने, जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।

जान हथेली पर रखकर की थी पत्रकारिता

मलियाना कांड ऐसा खौफनाक मंजर था, जिसको स्मरण कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। मैंने बहुत करीब से इस पूरे घटनाक्रम को देखा। हालांकि मीडिया की एंट्री पर पूरी तरह से प्रतिबंध था। किसी को भी मलियाना की खून से लथपथ गलियों में जाने की इजाजत नहीं थी। चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात थी। ऐसे में पत्रकारों के लिए रिपोर्टिंग करना बेहद चुनौतीपूर्ण था।

ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार नीरज कांत राही का। एसीएम वीसी रावत की गाड़ी में बैठकर वह मलियाना में एंट्री पा गए थे। ये पत्रकारिता के लिए हाईरिस्क था, लेकिन ग्राउंड स्तर पर रिपोर्टिंंग करने के लिए जान हथेली पर रखी दी गई थी, उस दौर की पत्रकारिता को याद कर सहम जाता हूं। क्योंकि तब मोबाइल भी नहीं थे और पेजर भी नहीं। वो दौर पत्रकारिता के लिए बेहद चैलेंज भरा था। सुविधा कुछ भी नहीं थी, फिर भी निष्पक्ष पत्रकारिता को जिंदा रखना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था।

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उनका कहना है कि मलियाना कांड के दो दिन बाद मौके पर दौरा करने के लिए गृहमंत्री गोपीनाथ दीक्षित मौके पर आ गए थे, लेकिन पुलिस-प्रशासन ने उन्हें भी सुरक्षा दृष्टि से मलियाना में उस स्थान पर नहीं जाने दिया था, जहां पर जो मुख्य घटना स्थल था। गृहमंत्री के साथ मैं भी मौजूद था, लेकिन सुरक्षा दृष्टि को पुलिस-प्रशासन ने ध्यान में रखा, मलियाना में गृहमंत्री गए अवश्य थे, लेकिन कुछ लोगों से थोड़ी दूरी पर मिलने के बाद वापस लौट गए थे।

खौफ क्या होता है, ये करीब से देखा…मुन्ना

पत्रकारिता में तस्वीर बेहद महत्वपूर्ण होती हैं, फिर भले ही जोखिम ही क्यों न हो? मलियाना कांड हो या फिर हाशिमपुरा और निगार कांड, ये तीन ऐसे कलंक शहर के माथें पर लगे हैं, जो बेहद खौफनाम और डरावने थे। क्रांतिधरा को भी इन दंगों के नाम से जानने लगे थे। मलियाना कांड की आज चर्चा हो रही है तो ऐसे में वरिष्ठ फोटोजर्नलिस्ट मुन्ना की भी हम चर्चा अवश्य करेंगे।

क्योंकि मलियाना कांड को कैमरे में कैद करने वाले मुन्ना ने कई खौफनाम दृश्य करीब से देखे तथा खुद भी पीएसी के चंगुल में आ गए थे। जब उनका कैमरा चला तो उसमें कुछ ऐसी तस्वीर कैद हो गई थी, जिसके बाद कईयों की गर्दन फंस गई थी। बकौल, मुन्ना पीएसी के जवान कार्रवाई कर रहे थे, जिसे उन्होंने कैमरे में कैद कर लिया। इस पर पीएसी के जवानों ने आपत्ति कर दी थी और मुन्ना का कैमरा छीन लिया था।

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यही नहीं, उसको पीएसी के जवानो ंने मुन्ना को भी ट्रक में बैठा लिया था, लेकिन दृश्य मुन्ना के लिए भी परेशानी में डालने वाला था। मुन्ना बताते है कि डर और खौफ क्या होता हैं, यह उन्होंने करीब से देखा था। ये आज भी उनके स्मरण में तेर रहा हैं।

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