Friday, May 1, 2026
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अपनी कयादत की राह नहीं आसां

SAMVAD


04 12मुसलमानों का अपनी कयादत की कोशिश करना नया नहीं है। हाल में संपन्न हुए यूपी नगर निकाय चुनाव में एक बार फिर अपनी कयादत का झंडा पूरे जोर-शोर से बुलंद किया गया है। यूपी के नगर निकाय चुनावों में आॅल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी एआईएमआईएम ने यूपी में कई जगह अपने उम्मीदवार खड़े किए थे। सबसे चर्चित चुनाव मेरठ मेयर का था, जहां एआईएमआईएम के उम्मीदवार मोहम्मद अनस ने एक लाख से ज्यादा वोट लिए और दूसरे नंबर पर रहे।

एआईएमआईएम की स्थापना 1928 में नवाब महमूद नवाज खान ने की थी। स्थापना के वक्त इसका नाम मजलिस-ए-इत्तेहाुदल मुस्लिमीन था। 1948 में हैदराबाद स्टेट के भारत में विलय के बाद भारत सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था।

1957 में इस पार्टी की पुन: बहाली हुई और अपने नाम में ‘आॅल इंडिया’ जोड़ा। कासिम रिजवी ने, जो हैदराबाद राज्य के विरुद्ध भारत सरकार की कार्रवाई के समय मजलिस के अध्यक्ष थे और गिरफ्तार कर लिए गए थे, पाकिस्तान चले जाने से पहले इस पार्टी की बागडोर उस समय के एक मशहूर वकील अब्दुल वाहेद ओवैसी के हवाले कर गए थे। उसके बाद से यह पार्टी इसी परिवार के हाथ में रही है। अब्दुल वाहेद के बाद सलाहुद्दीन ओवैसी उसके अध्यक्ष बने और अब उनके पुत्र असदुद्दीन ओवैसी उस के अध्यक्ष और सांसद हैं।

एआईएमआईएम ने अपनी पहली चुनावी जीत 1960 में दर्ज की जब असदुद्दीन ओवैसी के वालिद सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी हैदराबाद नगर पालिका के लिए चुने गए और फिर दो वर्ष बाद वो विधान सभा के सदस्य बने। 1989 से 1999 तक सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी हैदराबाद से एआईएमआईएम के सांसद चुने गए। उसके बाद से अब तक असदुद्दीन ओवैसी हैदराबाद से सांसद हैं। एआईएमआईएम के दूसरे सांसद 2019 में औरंगाबाद मध्य महाराष्ट्र से सांसद चुने गए। इसके बाद छिटपुट रूप से दो-चार विधायक चुने जाते रहे हैं।

बहरहाल, यूपी में अपनी कयादत के प्रयास आजादी के बाद से होते रहे हैं। 1968 में मुस्लिम मजलिस पार्टी की स्थापना डॉ. अब्दुल जलील फरीदी ने की थी। वे जंग-ए-आजादी के सिपाही थे और उनका जनाधार अच्छा था। आजाद भारत में उन्हें किसी पार्टी ने कोई बड़ा पद नहीं दिया तो उन्होंने मुस्लिमों को उनका हक दिलाने के लिए मुस्लिम मजलिस पार्टी की स्थापना की। 1969 के यूपी विधानसभा चुनाव मुस्लिम मजलिस पार्टी ने दो सीटों पर चुनाव लड़ा। दोनों सीटों पर पार्टी को 4000 से भी कम वोट मिले। 1974 में डॉ. फरीदी की मौत हो गई और साथ में पार्टी की भी।

यूपी के 1974 के विधानसभा चुनाव में गुलाम महमूद बनातवाला ने इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को दोबारा खड़ा किया। मुस्लिम लीग ने 54 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। 43 पर जमानत जब्त हो गई। मात्र एक सीट पर जीत हासिल हुई। विधानसभा चुनाव 2002 में फिर 18 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन जीत किसी को नसीब नहीं हुई। 2007 के विधानसभा चुनाव में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने मात्र दो उम्मीदवार मैदान में उतारे, लेकिन वे भी नहीं जीत सके।

1995 में भाजपा के समर्थन से मायावती मुख्यमंत्री बनीं। डॉ. मसूद को उसमें शिक्षा मंत्री बनाया गया था। कुछ समय बाद मायावती डॉ. मसूद से किसी बात को लेकर नाराज हो गर्इं और डॉ. मसूद को कैबिनेट से बर्खास्त कर दिया। उनका सामान भी सड़क पर रखवा दिया। डॉ. मसूद ने साल 2002 में नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी यानी नेलोपा बनाई। मकसद वही था, अपनी कयादत। नेलोपा ने यूपी के 2002 के विधानसभा चुनाव में 130 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। नतीजा यह रहा कि 126 की जमानत जब्त हो गई। 2007 के विधानसभा चुनाव में डॉ. मसूद की पार्टी ने 10 सीटों पर चुनाव लड़ा। इस बार पार्टी के सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई।

2007 में दिल्ली जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी की कयादत में यूडीएफ का उदय अपना झंडा, अपनी कयादत के नाम पर हुआ था। अहमद बुखारी के वालिद अब्दुल्लाह बुखारी मुसलमानों से किसी राजनीतिक दल के पक्ष में वोट डालने की अपील करते रहे थे। 1977 में उन्होंने मुसलमानों से जनता पार्टी के हक में वोट डालने की अपील की थी, तो 1980 में कांग्रेस के पक्ष में मुसलमानों से वोट डालने की अपील की थी। 1977 में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई थी, तो 1980 में कांग्रेस को जीत मिली थी।

इससे इस मिथक को बल मिला कि अब्दुल्लाह बुखारी मुसलमानों से जिस दल को वोट डालने की अपील करते हैं, मुसलमान उसे ही वोट देते हैं। जबकि ऐसा नहीं था। बुखारी ने जब भी अपील की हवा का रुख देखकर की।

बहरहाल, अब्दुल्लाह बुखारी के पुत्र अहमद बुखारी को लगा कि अगर वे अपनी पार्टी बनाएंगे तो मुस्लिम वोट उन्हें ही मिलेंगे। इसी सोच के चलते 2007 के यूपी विधानसभा चुनाव में यूडीएफ ने 54 सीटों पर प्रत्याशी उतारे। जब विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो यूडीएफ के 51 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। सिर्फ एक उम्मीवार जीता, मेरठ से हाजी याकूब कुरैशी। वे भी चुनाव परिणाम आते ही बसपा की शरण में चले गए। वक्त के साथ यूडीएफ खत्म हो गई।

2008 में नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी के उपाध्यक्ष रहे डॉ. अय्यूब सर्जन ने पीस पार्टी का गठन किया। अपनी कयादत के नाम पर मुसलमानों के बीच प्रसार-प्रचार किया। 2012 के विधानसभा चुनाव में पीस पार्टी ने 208 उम्मीदवार मैदान में उतारे। जीत मिली सिर्फ चार को। 2017 में पीस पार्टी का खाता तक नहीं खुल पाया था।
इस तरह इतिहास बताता है कि भारत में अपनी कयादत यानी मुस्लिमों के नाम पर कोई भी राजनीतिक दल कामयाब नहीं हो सका है। मुस्लिमों के नाम पर जितने भी राजनीतिक दल वजूद में आए, उनका कोई साफ विजन नहीं था। विजन सिर्फ इतना ही था कि मुस्लिम अपना वजूद बनाएं।

किसी भी राजनीतिक दल को हर वर्ग के वोट की जरूरत होती है। बसपा भले ही दलितों की पार्टी कही जाती हो, लेकिन जब तक उसे दूसरे वर्गों का वोट नहीं मिला, तब तक वह सत्ता में नहीं आ सकी। जैसे ही दूसरे वर्ग उससे अलग हुए, बसपा जमीन पर आ गई। सपा को यादवों की पार्टी कहा जाता है। लेकिन उसे ऊंचाई देने में सभी वर्गों का योगदान रहा, खासतौर से मुसलमानों का।

अब मुसलमानों को लगता है कि सपा हो या बसपा उनके मुद्दों पर दोनों पार्टियां खामोश रहती हैं। यही वजह है कि इस बार के नगर निकाय चुनावों में मुसलमान सपा और बसपा को छोड़ कर आॅल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी एआईएमआईएम के साथ चला गया। 1928 की पार्टी आज भी दो-चार विधायक और 25-50 पार्षद जिताने की हैसियत से आगे नहीं बढ़ सकी है।


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