Monday, July 27, 2026
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कजरी- एक अर्द्धशास्त्रीय गायन विधा की लोकगीत

Samvad 52


सेजिया पर लोटे काला नाग हो कचौड़ी गली सून कइला बलमू।
मिर्जापुर कइला गुलजार हो कचौड़ी गली सून कइला बलमू |

11 4यदि आप उत्तर प्रदेश या उसके आस-पास के राज्य के हैं तथा आपकी लोक संस्कृति या लोकगीतों में रूचि हो तो आपने यह गीत जरूर सुना होगा। जी हां हम बात कर रहे हैं कजरी की। यह सावन और भाद्रपद मास में गायी जाने वाली वर्षाकालीन लोकगीत है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को कजरी उत्सव का आयोजन होता है। कजरी एक सुगम लोकगीत के रूप में स्थापित हो चुकी है। कजरी ने लोक संस्कृति से उठकर शास्त्रीय संगीत तक की यात्रा में विभिन्न पड़ाव देखे हैं।

नंद गोप गृहे जाता यशोदा गर्भ सम्भवा । ततस्तो नाशयष्यामि विंध्याचल निवासिनी ।।
बाबा नंद के घर, यशोदा के गर्भ से अवतरित आदिशक्ति महामाया कंस के हाथ से छिटकर आकाश की ओर गयी तथा विंध्य पर्वत पर आकर विराजमान हुई और विंध्याचल में देवी अपने तीनों रूपों में उपस्थित हैं। महालक्ष्मी – विंध्यवासिनी, महाकाली-कालीखोह, महासरस्वती – अष्टभुजा।

पारंपरिक मान्यता के अनुसार इन्हीं देवियों की स्तुति में गाए जाने वाले गीतों को कजरी कहते हैं।

एक अन्य लोक मान्यता के अनुसार मिर्जापुर का पुराना नाम कांतित प्रदेश था। यहां के राजा का सेनापति जो कि राजा का दामाद था, युद्ध में शहीद हो गया तब सेनापति की पत्नी कजरी उसके इन्तजार में गीत गाती रहती थी तो लोग कहते थे कि ‘कजरी गा रही है।’ यहीं से कजरी प्रारम्भ हुआ।

कजरी में श्रृंगार रस (वियोग – विरह) की प्रधानता के साथ, राधा-कृष्ण लीला का वर्णन तथा अन्य लोक व्यवहारों की झलक दिखलाई पड़ती है। कजरी हिन्दी, संस्कृत भाषा, ब्रज, भोजपुरी, बुन्देली बोलियों में गायी जाती है। भोजपुरी में भी यह तीन भागों में विभक्त होती है। मिर्जापुरी, बनारसी एवं गोरखपुरी।

कजरी धान की रोपाई करते समय, झूला झूलते समय (हृदय को मजबूती), देवी स्तुति के समय, उत्सवों में एवं अखाड़ों में गाई जाती है। जैसे फूल एवं रंग से होली खेली जाती है वैसे ही कीचड़ से कजरी खेली जाती है। कजरी का मायका (जन्म स्थान)- मिर्जापुर तथा ससुराल बनारस माना जाता है। मिर्जापुर में हो रामा तो वहीं बनारस में रे हरी, हरि-हरि भाव में कजरी गायन होता है।

कजरी ने घर, बगीचों, गांवों से लेकर शहर तक, कोठों (तवायफ) से लेकर अखाड़ों (संगीत घरानों ) तक अपना स्थान बनाया है। चरक संहिता में सावन के प्रसंग का वर्णन तथा 13वीं शताब्दी में अमीर खुसरों, अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर द्वारा भी कजरी लिखी गयी।

आधुनिक हिन्दी साहित्य के जनक भारतेन्द्र हरिश्चन्द्र ने कजरी को नई ऊंचाई प्रदान की तथा ककहरा कजरी से परिचित कराया अर्थात कजरी गायन क, ख से लेकर ज्ञ वर्ण तक हुआ। कजरी गायन ने शास्त्रीय मंचों पर भी अपना पकड़ बनाई।कजरी गायन राग विहाग से लेकर राग भैरवी तक में हुआ। बाद में कजरी जनानी (स्त्रियों द्वारा गायन) एवं मर्दानी (पुरुषों) में विभक्त हुई।

कई संगीत घरानों (मिर्जापुर, बनारस) ने इसके विकास में अपना योगदान दिया। बिस्मिल्लाह खान ने अपनी शहनाई से कजरीवादन किया । गिरिजा देवी, महादेव जी, छन्नूलाल जी ने भी इस लोक विधा के विकास में अपना योगदान दिया। शिवदास अखाड़ा, रामकृष्ण अखाड़ा, जहांगीर भखाड़ा तथा बैरागी अखाड़ा ने भी इसको ऊंचाईयां प्रदान की । मिर्जापुर के बद्री नारायण चौधरी (प्रेमघन) ने कजरी को उपशास्त्रीय विधा की ओर मोड़ा तथा ककहरा कजरी कई भावों में लिखा।

1990 के दशक में बीएचयू में कजरी पर शोध करने वाले डा. रामगोपाल त्रिपाठी ने इस पर गहन अध्ययन किया और वे कजरी 110 से ज्यादा प्राकृतिक स्वर दे सकते हैं। वर्तमान में शारदा सिन्हा एवं मालिनी अवस्थी भी कजरी को मंचों पर गाती है। डा. त्रिपाठी बताते हैं कि कजरी हमेशा समकालीन समाज, काल एवं देश के परिप्रेक्ष्य में लिखी एवं गायी गई। अखाड़ों में कजरी गायन के दौरान कलाकार हाथ में छाता (बारिश से बचने के लिए) कंधे पर गमछा लटकाकर प्रत्युत्तर कजरी का दंगल करते थे। कजरी वर्तमान में बक्सर,गोरखपुर, प्रयागराज, वाराणसी, मिर्जापुर, चन्दौली, सोनभद्र के साथ-साथ पूरे उत्तर प्रदेश में एवं इसके समीपवर्ती राज्यों में गायी एवं सुनी जाती है।

फिल्म और टेलीविजन के जमाने ने कजरी को नुकसान भी पहुंचाया।जितना कि अन्य लोक विधाएं लोकप्रिय हुई, उतना कजरी नहीं। इसका मुख्य कारण कजरी के क्षेत्र का राजनीतिक एवं भौगोलिक पिछड़ापन, संगीत घरानों की लोकविधाओं के प्रति अरुचि, लोगों का अपनी संस्कृति के प्रति जागरूक न होना है। भारत सरकार एवं राज्य सरकार ने शास्त्रीय विद्या एवं लोक विधा को समान सहयोग प्रदान किया लेकिन सम्भ्रात वर्ग का लोकगीतों के प्रति अरुचि इसके युक्तियुक्त विकास एवं लोकप्रियता में बाधक है।
-आशुतोष द्विवेदी


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