Friday, April 17, 2026
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सेठ गंगा प्रसाद माहेश्वरी सभागार में मध्य रात्रि तक चला कवि सम्मेलन

जनवाणी संवाददाता |

सहारनपुर: नगर निगम द्वारा आयोजित स्थानीय कवि सम्मेलन में कवियों ने अपनी कविताओं के जादू से रात साढे बारह बजे तक श्रोताओं को बांधे रखा। देहरादून से आये अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गीतकार डॉ.बुद्धिनाथ मिश्र ने कवि सम्मेलन की अध्यक्षता की। भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश महामंत्री रमा गुप्ता, उपाध्यक्ष वर्षा चौपड़ा, समाजसेवी राजीव अग्रवाल, यशपाल भाटिया व कुलदीप धमीजा ने मां शारदा की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्जवलित कर कवि सम्मेलन का शुभारंभ किया।

महापौर डॉ.अजय सिंह, नगर विधायक राजीव गुुंबर, भाजपा महानगर अध्यक्ष पुनीत त्यागी व मेला चेयरमैन चौधरी वीरसेन सिद्धू ने सभी कवियों को शॉल ओढ़ाकर व स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया। जबकि समारोह अध्यक्ष डॉ.बुद्धिनाथ मिश्र ने काव्य जगत की ओर से महापौर व विधायक सहित सभी आयोजकों का शॉल ओढ़ाकर अभिनंदन किया। इससे पूर्व सहसंयोजक राजेंद्र कोहली, पार्षद संजय गर्ग, विनोद सैनी, सुखबीर वर्मा कार्यक्रम संयोजक सोपिन पाल व प्रशांत राजन ने अतिथियों का माल्यार्पण कर स्वागत किया।

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कवि सम्मेलन में काव्य यात्रा की शुरुआत विनोद भृंग की सरस्वती वंदना से हुई। नरेंद्र मस्ताना ने लोकगीत-‘‘गुडगुड हुक्का बोल्ले, दिनभर म्हारे जेठ का/चौकीदारा करता दिख्खे दिन भर गेट का’’ सुनाकर खूब वाहवाही लूटी। सम्मेलन उस समय शिखर पर पहुंच गया जब मुजफ्फरनगर से पधारी कवियत्री सुशीला शर्मा ने गीत पढ़ा-‘‘माझी धीरे खेना नाव,जग की टेढ़ी पगडंडी तज, जाना उनके गांव, माझी धीरे खेना नाव’’। डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र का यह श्रंगार गीत श्रोताओं के मन को गहरे तक छू गया-‘‘जिसे चाहा नहीं तुमने कभी वह चैन पाया क्या, ये सांसे तेज चलती हैं किसी का दिल दुखाया क्या/जरुरत क्या तुम्हारे रुप को श्रंगार करने की, किसी हिरणी ने अपनी आँख में काजल लगाया क्या’’।

डॉ.वीरेन्द्र आज़म की कविता-‘‘यार शहर अब तू भी सोच कुछ अपने बारे में/बचा सकता है तो बचा ले, मयूर का नृत्य और सियार की हूक/चिड़ियां की चीं-चीं और कोयल की कूक’’ ने भी खूब तालियां बटोरी। उनकी हास्य कविता ‘‘पति मंच’’ और संदीप शर्मा की कविता ‘‘संडे’’ ने भी श्रोताओं को खूब गुदगुदाया। डॉ.संदीप मिश्र के इस गीत को भी खूब सराहा गया-‘‘ आंख के ये मोती कब धार हो गए/हँसना था चाहा पर यार हो गए।’’सुधीर प्रवाज़ के इस शेर को भी दाद मिली-ःःएक मुद्दत हो गई साथ में रहते हुए/अश्क देखे नहीं तुमने मेरे बहते हुए।’’

प्रतिभा त्रिपाठी ने पढ़ा-‘‘कोई रांझे की हीर हो जाऊं/मैं वफा की नजीर हो जाऊं’’। महेश पाल ने पढ़ा-‘‘ देखो सुनो ये जो पागल खाने हैं/कुछ को छोड़ के इनमें सब दीवाने हैं। राजेश बघेल की पंक्तियां देखिए-हिन्दुस्तानी होने का कुछ ऐसे फर्ज निभा लो/जितना शेष बचा है देश मिलकर इसे बचा लो’’। इसके अलावा डॉ.विजेंद्र पाल शर्मा, मोनिका शर्मा व जया गुप्ता ने भी काव्यपाठ किया। संचालन संयोजक प्रशांत राजन ने किया।

कवि सम्मेलन में पार्षद मंसूर बदर, पार्षद प्रतिनिधि सईद सिद्दकी, अलका शर्मा, ब्रिजेंद्र त्रिपाठी, सत्य शर्मा, रश्मि टेरेंस, संजय गुप्ता, तपेश ममगाईं, चमन चौहान, आदित्य भरद्वाज राज अरोड़ा ,काशिफ़ सिद्दीक़ी, निमिष भटनागर, योगेश शर्मा, रक्षिता पंडित, रामकिशन भारती सतनाम सिंह, मजीद खन्ना, आशीष मित्तल, रितेन भट्टाचार्य आदि मौजूद रहे।

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