- श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ के सातवें दिन चिन्तक विचारक रमेश भाई ओझा ने भागवत के महत्व पर डाला प्रकाश
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ के सातवें दिन चिन्तक विचारक रमेश भाई ओझा ने भागवत के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि परीक्षित बनकर श्रवण करने वालों का कल्याण होता है। दोपहर बाद तीन बजे भाईश्री का पंडाल द्वार पर शंखनाद मंत्रोच्चार के साथ स्वागत हुआ। उनके व्यास पीठ पर विराजमान होने के बाद नित्य क्रियानुसार मुख्य यजमान रामकिशोर सर्राफ, बृजवाला, विपिन अग्रवाल, अल्का अग्रवाल (मीनाक्षी ज्वेलर्स परिवार) ने भागवत जी की पूजा एवं भाईश्री की माल्यार्पण कर स्वागत किया। तत्पश्चात सूर्यकांत द्विवेदी (संपादक), डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी (एमपी-राज्यसभा), अजय राय (यूपी कांग्रेस अध्यक्ष), संजय रस्तौगी दंपति, राजेश अग्रवाल (एमपी ज्वैलर्स), सुरेन्द्र मित्तल (दिल्ली), घनश्याम दास अग्रवाल, राहुल गुप्ता ने व्यासपीठ को प्रणाम कर भाईश्री से आशीर्वाद ग्रहण किया।
भाई श्री ने कथा चर्चा को आगे बढ़ाते हुये कहा कि श्रीमद् भागवत में मोक्ष-धर्म-अर्थ-काम क्या नहीं है सब कुछ है। संतों की वाणी आज भी प्रमाणिक है। श्रीमद् भागवत में राजा के पांच यज्ञ होते हैं दुष्टों को दंडित करना, सज्जनों का सम्मान करना, राज्य की तिजोरी को न्याय पूर्वक समृद्ध करना, शीघ्र और सस्ता न्याय दिलाना, राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों तक की आहुति देना शामिल है। उन्होंने कहा कि प्रजा में चेतना नहीं होगी तो अपने अधिकार कैसे जानेंगे। फिर अपने कर्तव्य का निर्वहन पालन कैसे करेंगे। 75 वर्षों से हमारा प्रजातंत्र देश को गरीबों के उत्थान के बारे में सुनाता रहा है, पर स्थिति में सुधार अब आ रहा है, जागृति आ रही है।
गरीबों के उत्थान के प्रति सजगता दिखाई दे रही है। अगर ये प्रगति चलती रही जिसका हमें विश्वास है तो गरीब को निश्चित ही भला होगा। सद्गुरु हमें सत्य असत्य परखने की दृष्टि देते है। रूप से कोई सुखी नहीं है पर फिर भी संसार से विरक्ति नहीं होती। उन्होंने कहा कि काम क्रोध लोभ नरक के द्वार होते हैं। हालांकि गृहस्थ जीवन में तीनों ही जरूरी भी हैं, लेकिन यह मनुष्य के वश में रहे तो ठीक है। अन्यथा यही नरक का द्वार बन जाते हैं। काम वंशावली को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक है, लेकिन काम को मनुष्य अगर अपने ऊपर हावी कर ले तो यही अपराध का कारण बन जाता है।

दुराचार का कारण बनता है। ऐसा मनुष्य निर्भया कांड जैसे बड़े-बड़े कांड को अंजाम देने से भी पीछे नहीं हटता। क्रोध एक सीमा तक जरूरी है, क्योंकि अगर क्रोध नहीं करेंगे तो बच्चे बिगड़ जाएंगे। व्यापार में अपने सहयोगियों के साथ अधीनस्थों के साथ सख्ती भी करनी पड़ती है तभी उन पर नियंत्रण किया जाता है, लेकिन क्रोध के वश में हो जाने से आदमी हिंसक रूप धारण कर लेता है, इसी कारण बड़े-बड़े हत्याकांड हो जाते हैं। इसी प्रकार लोभ नहीं होगा तो मुनाफा कैसे हासिल करेगा, लेकिन मनुष्य को इनका उपयोग करना चाहिए, उनके वशीभूत होकर अपना जीवन नरक नहीं बना लेना चाहिए।
कथा के दौरान शनिवार को रुक्मणी विवाह में वधु पक्ष से मुकेश गुप्ता परिवार व वर पक्ष से अमित ब्रहमानन्द अशोक कुमार रहे। रुक्मणी विवाह के विषय में चर्चा करते हुए भाईश्री ने बताया कि देवी रुक्मणी, रुक्मी, बहनभाई विधर्म राजा के संतान थे। बाल्यावस्था से रुक्मणी ने मन ही मन श्रीकृष्ण को अपना वर मान लिया। रुक्मी ने बहन रुक्मणी का विवाह चेदी नरेश शिशुपाल के साथ तय कर दिया। इसको जानकर रुक्मणी ने सात श्लोकों का एक पत्र श्रीकृष्ण को लिखा कि वो उनमें समर्पित है, हमें हर लें। आइए यदि आप नहीं आये तो मैं समझूगी मेरी साधना में कोई कमी रह गयी होगी।
इसलिये कृपा नहीं होगी। भक्त की ओर से भगवान के पाने की दृढ़ता को दर्शता है। भगवान श्रीकृष्ण का रथ जब पहुंचा तो रुक्मणी ने हरयेनम: हरयेनम: जोर से कहा भगवान ने रुक्मणी का पांच जन्मे शंख बजाकर हरण कर लिया। रुक्मी ने युद्ध के लिये श्रीकृष्ण को ललकारा। कृष्ण व रुक्मी का युद्ध हुआ। रुक्मी पराजित हुआ। श्रीकृष्ण रुक्मणी का विवाह द्वारिकापुरी में सम्पन्न हुआ। द्वाररिकाधीश भगवान की जय का जयकारा हुआ। कथा समापन पर आरती हुई। कथा अध्यक्ष सतीश सिघल, महामंत्री ज्ञानेन्द्र अग्रवाल, कोषाध्यक्ष अशोक गुप्ता, ब्रजभूषण गुप्ता, सुरेश गुप्ता, अन्नी भाई, विपिन अग्रवाल अपने कर्तव्यनिष्ठ सहयोगियों के साथ उपस्थित रहे।

