Sunday, April 26, 2026
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अनसुनी को सुनाने के लिए धमाका

Nazariya 22


PRERNAअमेरिका की न्याय-प्रणाली में सुनवाई के लिए नागरिकों की एक ज्यूरी गठित की जाती है जो न्याय तक पहुंचने में जज की मदद करती है, लेकिन सवाल है कि क्या न्याय दिल से करना चाहिए या दिमाग से? दिमाग पूर्वाग्रहों से भरा, इंसानी कमजोरियों से घिरा होता है। जब तक हम, जो न्याय करने बैठे हैं, ईमानदार और निष्पक्ष न हों तब तक हमें अपने दिल से पूछते रहना चाहिए कि सामने खड़ा व्यक्ति अपराधी है कि नहीं। गांधीजी भी कुछ ऐसा ही कहते हैं कि एक ही लाठी से हर गुनहगार को हांकना न्याय नहीं है। चोरी का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि यदि घर में चोर घुस आया है तो आप क्या करेंगे? अगर चोर आपके पिता हैं तो आप चुपचाप सोये रहेंगे; चोर आपसे तगड़ा-मजबूत कोई पठ्ठा है तो भी आप सोये रहेंगे। दोनों मामलों में सोने के कारण अलग-अलग हैं – एक में करुणा छिपी है तो दूसरे में डर! दोनों को सजा देने के पैमाने अलग-अलग होंगे। अगर आप यह जानने की कोशिश करेंगे कि चोर ने चोरी क्यों की तो हो सकता है कि करुणा में आकर आप उसकी मदद ही कर दें। तो बात यह समझने की है कि एक ही प्रकार के गुनाह की, एक ही प्रकार की सजा का आधुनिक न्यायतंत्र अधूरा है।

यह बात मैं क्यों लिख रही हूं? इसलिए कि पिछले दिनों भारत की संसद के सुरक्षा घेरे को तोड़ते हुए कुछ युवा चलती संसद में कूद पड़े और कुछ पटाखे फोड़े जिससे वहां अफरा-तफरी मच गयी। सांसद डरे-घबराए तथा भागने भी लगे। कुछ सांसद ऐसे भी निकले जिन्होंने उन दोनों युवकों को धर दबोचा और उन्हें पीटने लगे। फिर कुछ सांसद बहादुर भी बन गए और सांसदों की भीड़ चीरते हुए, अपना हाथ साफ करने कूद पड़े। किसी ने इस पर एक कार्टून भी बना दिया : एक पूछता है : इनकी हिम्मत कैसे हुई संसद में घुसने की? दूसरा जवाब देता है : हां, यहां तो चुनाव जीतने वाले अपराधी ही घुस सकते हैं!

हमारे यहां ज्यूरी जैसा कोई सिस्टम नहीं है। लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन मानी जाती है तो हम ही ज्यूरी बनकर इस केस की सुनवाई करते हैं। सबसे पहले हमें साफ दिखता है कि जिन युवाओं ने यह किया वे हमारे शहीदे-आजम भगत सिंह से प्रभावित थे। 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने इसी तरह ‘सेंट्रल स्टेट असेंबली’ में धमाका किया था तथा अपनी गिरफ्तारी दी थी। उन्होंने बम के साथ वह पर्चा भी असेंबली में बांटा था जिस पर फ्रेंच शहीद अगस्ता वैलां का यह उद्धरण छपा था : ‘बहरों को सुनाने के लिए धमाकों की जरूरत पड़ती है।’ भगत सिंह के बम का निशाना कोई इंसान नहीं था; इन बच्चों के पटाखों का भी निशाना कोई व्यक्ति नहीं था।

अब हम यह जांचने की कोशिश करें कि युवाओं ने जो किया वह कितना सही या गलत था? सबसे पहले यह देखें कि उन्होंने किया क्या? उनके पास क्या हथियार थे? उन्होंने कितनों को हानि पहुंचायी? पता चलता है कि संसद में वे वैध पास लेकर गए थे, सुरक्षाकर्मियों की जांच से भी गुजरे थे। उनके पास पीले रंग का धुआं छोड़ने वाले पटाखे भर थे। वे भागने के इरादे से वहां नहीं आए थे। तो फिर उन लड़कों ने ऐसा क्यों किया? ‘इंडियन एक्सप्रेस’ व कुछ अन्य अखबारों की जांच-पड़ताल बताती है कि इनमें से कोई भी युवा आपराधिक पृष्ठभूमि का नहीं है; हां, सभी बेरोजगार हैं – गरीब परिवारों के पढ़े-लिखे, निराश नौजवान! सरकार की जो नीतियां और कानून उन्हें गलत लगते थे, वे उनका विरोध करते थे। उनको लगता है कि भारत सरकार अब किसी की नहीं सुनती – न किसान की, न पहलवान बेटियों की, न अपने नागरिकों की। ऐसे में भगत सिंह से प्रेरणा मिली और बहरी सरकार को सुनाने के लिए उन्होंने संसद में धमाका किया !

सरकार के बारे में जैसी उनकी समझ थी, सरकार ने उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया। ऐसी संवेदनाहीन, बहरी सरकार के लिए धमाका जरूरी है, ऐसा तब भगत सिंह को लगा था; ऐसा ही इन युवाओं को लगा। अगर अंग्रेजों के राज में भगत सिंह का कृत्य सही था, तो आज गलत कैसे हो गया? भगत सिंह को तब अंग्रेज सरकार ने आतंकवादी करार दिया था; आज की सरकार ने इन युवाओं को ‘यूएपीए’ की आतंकी धाराओं में भीतर डाल दिया है। कह सकते हैं कि न युवा बदले हैं, न सरकारी मिजाज!

एक दूसरा नजरिया भी है इस घटना को देखने का। इंटरनेट की दुनिया में बड़ी-बड़ी कंपनियां और सरकारें ‘हैकर्स’ रखती हैं जो उनके बनाए सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी खोजकर बताता है, ताकि उसे सुधारा जा सके। सुरक्षा-व्यवस्था की चूक की वजह से अटलबिहारी वाजपेयी के वक्त में पार्लियामेंट पर हमला हो गया था और 7 लोगों की जान गई थी। मौजूदा समय में बहादुर जवानों ने जंग के मैदान में नहीं, अपने सुरक्षा-घेरे के भीतर जान गंवाई है। उरी में 24, पठानकोट में 12, पुलवामा में 46 जवानों की जान युद्ध लड़ते तो गई नहीं थी। उन चूकों के गुनहगारों को सजा हुई? आपको मालूम हो तो हो, देश को मालूम नहीं है।

जिस तरह सॉफ्टवेयर कंपनियां हैकर्स को पैसा देती हैं, उसी तरह इन युवाओं को बख्शीश देकर रिहा कर देना चाहिए! बगैर जान-माल के किसी नुकसान के इन्होंने इतनी बड़ी सुरक्षा की चूक को सामने ला दिया। यह कम है क्या? इनाम दिया जाएगा क्या? कोई ऐसी मांग करेगा क्या? और यदि आतंकवाद के नाम पर लोगों को डराना और वोट बटोरना ही सारा खेल हो तो इन नौजवानों का नया सूरज देख पाना भी मुमकिन नहीं लगता। हमारे देश में आज अपराध का कानून ही बदल गया है, इसलिए जनता जनार्दन ही फैसला करे कि असली अपराधी कौन है?


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