- लूट के लिए यहां तो प्लेन डिमांड नोटिस पर कर दिये जाते हैं हस्ताक्षर
- नगर निगम में लूट के लिए कुख्यात हो गया है हाउस टैक्स अनुभाग
- पहले बढ़ाकर भेजते हैं बिल, फिर दबाव बनाने को देते फर्जी नोटिस
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: जब बाड़ ही खेत को खाने लगे तो किसे कसूरवार ठहरया जायेगा। कमोबेश कुछ ऐसा ही हाल नगर निगम के हाउस टैक्स अनुभाग में किया जा रहा है। जहां जनता को तो गुमराह करके पहले फर्जी बिल भेजे जाते हैं। फिर फर्जी डिमांड नोटिस भी सौंप दिये जाते हैं। बिल्कुल असलियत से दिखने वाले इन कागजातों के झांसे में आकर आम नागरिक बिल्कुल वैसा ही करता है, जैसा उसे दिखाया जाता है।
अपनी जान बचाने के लिए वह इन नगर निगम के घाघ बाबुओं के झांसे में आकर लूट का शिकार हो जाता है, और बाबुओं के कहे अनुसार सब करता रहता है। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि लूट के इस धंधे में निचले स्तर से लेकर आला स्तर तक सब का हिस्सा बंटा हुआ है। तभी तो यदि कोई भूले भटके पकड़ा भी जाता है तो यह शातिर अपने वकीलों की मदद से उसको बेकसूर साबित करवा देते हैं।
नगर निगम को सरकार ने जनता की सेवा के लिए बनाया है, लेकिन यह विभाग सिर्फ अपनी सेवा कराने के काम में मशगूल हो गया है। यहां के सभी अनुभागों में सालों से काबिज मठाधीशों को पता है कि उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। इसीलिए वह बेधड़क लूट के इस कारनामे को अंजाम देते रहते हैं।
सब कुछ हो रहा आॅनलाइन
आज के डिजिटल जमाने में लोग अपना ज्यादातर काम आॅनलाइन कर रहे हैं। डाटा ट्रांसफर या रिसीव करना हो या अन्य किसी तरह का वेरिफिकेशन करना हो सबकुछ आॅनलाइन ही हो जा रहा है। इसके लिए लोगों को अब सर्विस सेंटर जाकर घंटों लाइन नहीं लगाना पड़ रहा है।
आॅनलाइन फॉर्म भरते समय हम अपनी कई निजी जानकारी आॅनलाइन अपलोड कर देते हैं। जैसे कि पैन कार्ड की डिटेल या फोटो आदि। एक तरफ डिजिटलिकरण ने हमारे काम को आसान बना दिया है। वहीं इसकी वजह से धोखाधड़ी के मामले भी बढ़े हैं। आजकल इंटरनेट पर फर्जी वेबसाइट की भरमार पड़ी है। ऐसे में किसी भी तरह का फॉर्म भरने से पहले अगर वेबसाइट की जांच ना की जाए तो हमारी जानकारी का गलत उपयोग भी हो सकता है।
उलट चलता है निगम कानून
आजकल के डिजिटलाइजेशन के युग में अगर कंप्यूटर से काम किया तो इन कर्मचारियों के हाथ कुछ नहीं लगेगा। इसलिए नगर निगम मेरठ में दुनिया दिखावे को डिजिटल होने का भ्रमजाल दिखाया जाता है। जबकि वास्तव में हाउस टैक्स अनुभाग में सब काम मैन्युअल ही होता है।
यदि किसी नागरिक या व्यापारी को अपने हाउस टैक्स की डिटेल निकलवानी होगी तो उसे रजिस्टर में देखकर ही बकाया बताया जायेगा। कैश काउंटरों पर कंप्यूटर लगाकर सिर्फ उसी नकदी के बिल दिये जाते हैं। जो सरकारी खजाने में जमा कराना है। बाकी पैसा यह घाघ पहले ही आपस में बांट लेते हैं।
कोरे डिमांड नोटिस पर कर देते हैं साइन
नगर निगम के हाउस टैक्स अनुभाग के बाबुओं को जनता से पैसा ठगना होता है तो ठग के इस मकड़जाल को सही दिखाने के लिए कोरे डिमांड नोटिस पर साइन करके इन लुटेरों की फौज को शहर में भेज दिया जाता है। नगर निगम के इन शातिर बाबुओं द्वारा पहले तो फर्जी तरीके से नागरिक को फर्जी बिल भेजा जाता है। फिर जब नागरिक उस बिल को देखकर डर जाता है तो इसी डर को कैश करने का खेल शुरू हो जाता है।
इन बाबुओं के पास कोरी डिमांड नोटिस की पूरी बुकलैट होती है। जिसपर बाकायदा पहले ही अधिकारी के फर्जी साइन करा लिये जाते हैं। फिर मुंहमांगी मुराद पूरी होकर यही कोरे डिमांड नोटिस संबंधित नागरिक को थमा दिये जाते हैं। जबकि वास्तव में उसके खाते में सिर्फ वही रकम जमा कराई जाती है। जो वास्तव में काफी कम होती है। बाकी पैसे को यह शातिर आपस में बांट लेते हैं।
अफसरों ने भ्रष्टाचार पर मूंद ली आंखें
नगर निगम में यह सारा खेल अधिकारियों की शह पर ही किया जाता है। हर अनुभाग के मुखिया को पता होता है कि किस जोन में क्या खेल चल रहा है। यहां बाकायदा सीटों के लिए भी बोलियां लगती हैं। जो सबसे कमाऊ कर्मचारी साबित होता है। उसको उतनी बड़ी सीट दी जाती है। फिर यदि कोई पकड़ा भी जाता है तो उसको बचाने के लिए यही अधिकारी ढाल बन जाते हैं।
इसके लिए नगर निगम में बाकायदा वकीलों की भी पूरी फौज है। सरकारी खजाने से वकील की फीस दिलाने का इंतजाम होता है। जबकि उसका वास्तविक कार्य यह होता है कि फंसने वाले कर्मचारी के केस में पैरवी इस तरह से की जाये कि केस हल्का रहे तथा कोर्ट में एक-दो पेशी पर ही सब खत्म हो जाये।

