
अनंतकुमार हेगड़े, उत्तरी कर्नाटक से भाजपा के सांसद हैं और अपने विवादास्पद बयानों या नफरती वक्तव्यों के लिए अक्सर सूर्खियां बटोरते हैं। पिछले दिनों सांसद महोदय ने एक और विवादास्पद बयान दिया है। इस बार संविधान का समूचा ढांचा उनके निशाने पर रहा है, उनका कहना है कि ‘कांग्रेस के चलते संविधान में विकृतियां घुस आयी हैं’ और उन्हें दूर करना हो और संविधान बदलना हो तो मोदी के नारे 400 पार को संसदीय चुनावों में सफल बनाना होगा। भारत का संविधान-जिसका निर्माण भारत की राजनीतिक एवं सामाजिक मुक्ति के महान संघर्ष में मुब्तिला रहे अपने वक्त़ की अजीम शख्सियतों ने किया-वह बुनियाद है जिस पर भारत के जनतंत्र की समूची इमारत बुलंदी के साथ खड़ी है और जिसमें हमारे आधुनिक गणतंत्र के व्यापक एवम समावेशी विचारों को तवज्जो दी गयी है। यह अलग बात है कि उसको लेकर अपनी बेआरामी छिपा पाना, हिन्दुत्व वर्चस्ववादियों के लिए हमेशा ही मुश्किल साबित होता रहता है, और जो उसे खोखला एवं कमजोर करने के लिए वाचा एवं कर्मणा के स्तर पर आए दिन जुटे रहते हैं। जनाब हेगडे का बयान इसी विचारों को प्रतिबिंबित करता है। बताया जाता है कि भाजपा ने उनके इस विवादास्पद बयान से औपचारिक दूरी बना ली है। भाजपा यह समझाना चाह रही है कि वह हेगडे के ‘मन की बात’ थी, न कि भाजपा के ‘दिल की बात’ है। इससे बड़ा झूठ शायद ही कहीं नजर आता हो। यह दूरी उसी किस्म की थी जब आतंक की आरोपी साध्वी प्रज्ञा ने महात्मा गांधी की भर्त्सना की थी और गोडसे को सच्चा देशभक्त बताया था। उस वक्त मोदी जी ने कहा था कि -वह उन्हें कभी दिल से माफ नहीं करेंगे। वैसे इस ‘औपचारिक दूरी’ के दावों के बीच शायद भाजपा को या उसके नेताओं को याद नहीं रही, जब वर्ष 2017 में भी हेगडे ने संविधान बदलने के इरादे जाहिर किए थे-जब वह केन्द्र में मंत्री भी थे-और केसरिया पलटन के अगुआओं ने वही घिसा पीटा बयान दिया था ‘औपचारिक दूरी’ का।
इस बार औपचारिक दूरी के दावों की हवा तभी निकल गयी जब संयोग ऐसा हुआ कि एक तरफ भाजपा के प्रवक्ता संविधान बदलने के हेगडे के दावों से अपनी दूरी का ऐलान कर रहे थे, वह खुद संविधान के प्रति कितने समर्पित हैं, यह समझा रहे थे और उसी दिन केंद्र सरकार की तरफ से सीएए (सिटिजनशिप एमेण्डमेण्ट एक्ट अर्थात नागरिकता संशोधन अधिनियम) के नियमों का ऐलान हो रहा था, जो एक तरह से संविधान के सिद्धांतों और मूल्यों पर गहरा आघात करते हैं। याद करें सीएए को संसद पटल पर जब पारित किया गया था, तबसे उसे चुनौती देती हुई 250 याचिकाएं अभी भी सर्वोच्च न्यायालय में लटकी पड़ी हैं।
नए प्रस्तुत नागरिकता संशोधन अधिनियम दरअसल संविधान के इस बुनियादी उसूल को चुनौती देता है, जिसमें यह कहा गया है कि किसी के भी साथ उसकी आस्था या उसके धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होगा। दूसरी तरफ सीएए के नियम भारत के गणतंत्र बनने के 75 वें साल में नागरिकता के लिए धर्म को पैमाना मान कर इस पूरी लंबी लड़ाई में जबरदस्त खलल डाल रहे हैं । संविधान की धारा 14 का यह खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है जिसमें यह कहा गया है कि ‘राज्य किसी व्यक्ति के साथ न्याय के मामले में समानता का व्यवहार करेगा और भारत के भूभाग में उसे कानून का पूरा संरक्षण मिलेगा।’ इन नियमों का सूत्रीकरण भाजपा के पिछले पांच साल से अधिक समय से जारी कोशिशों का ही परिणाम है प्रस्तावित नागरिकता बिल में भी ऐसे प्रावधान शामिल किए जा रहे हैं जिसके तहत धार्मिक उत्पीड़न से बचने के नाम पर पड़ोसी मुल्कों के गैरमुस्लिम शरणार्थियों को आसानी से नागरिकता प्रदान की जा सके। चुनाव के ऐन पहले सीएए नियमों का ऐलान करने के पीछे एकमात्र कारण यही है कि भाजपा उसके पास मौजूद सभी ‘हथियारों’ को आजमाना चाह रही है और अब जबकि उसकी तरकश के तमाम हथियार बोथर होते दिख रहे हैं, तब वह लोगों के ध्रुवीकरण को बढ़ावा देकर अपनी चंद सीटें बढ़ाना चाह रही हैं।
अगर हम विगत कुछ माह के रेकार्ड को देखें तो पता चलता है कि भाजपा को जो जो उम्मीदें थी वह खरी उतरती नहीं दिख रही हैं। फिर चाहे विकसित भारत संकल्प यात्रा के रथ को देश भर घुमाना रहा हो या राममंदिर के उद्घाटन के बहाने पूरे मुल्क में एक नयी लहर पैदा करना रहा हो, अब वह सब खुमार उतर चुका है और देश भर की जनता महंगाई, रोजगार जैसे सवालों पर, किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य के सवाल पर और सरकार द्वारा दरबारी पूंजीतियों को दी जा रही छूट से फूट पड़ता आक्रोश हो, अब भाजपा को सबक सीखाने के मूड में दिख रही है। जनता के अंदर उठते इन आलोडनों को हम राहुल गांधी की सभा में जुटती अभूतपूर्व भीड़ से भी देख सकते हैं।
वैसे अगर हम संतुलित निगाहों से देखें तो यह भी कोई पहली मर्तबा नहीं है कि संघ परिवार/हिन्दुत्व ब्रिगेड से ताल्लुक रखने वाले लोगों में से किसी ने संविधान बदलने की ऐसी बात नहीं की हो। याद रहे संघ के मौजूदा सुप्रीमो मोहन भागवत में हैदराबाद में आयोजित अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के सम्मेलन को संबोधित करते हुए ‘‘मुल्क की मूल्य प्रणाली के अनुकूल संविधान एवं न्यायविधान में बदलाव की हिमायत की थी।’’ कोई भी महीना नहीं गुजरता जब हम ऐसे वक्तव्यों, बयानों से रूबरू न होते हों, जहां भारतीय संविधान को ‘‘पश्चिमी प्रभावों’’ से युक्त होने के नाम पर तथा ‘‘भारतीय/कहने का तात्पर्य हिन्दू/ मूल्यों की उपेक्षा करने के लिए’’ विवादों के घेरे में न लाया जाता हो। तयशुदा बात है कि ऐसे विवादास्पद कहे जाने वाले बयानों से, समग्रता में वह बात स्पष्ट नहीं होती कि किस चुपचाप तरीके से हुकूमत में बैठी जमात के लोग संवैधानिक सिद्धांतों को तिलांजलि देते या उन्हें अन्दर से खोखला कर रहे होते हैं और किस तरह समूचे मुल्क पर अपने बहुसंख्यकवादी निरंकुशता की विचारधारा को थोप रहे हैं।
अगर हम भाजपा की अपनी यात्रा को देखें तो पता चलता है कि किस सुनियोजित तरीके से वह इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। याद कर सकते हैं कि जब अटलबिहारी वाजपेयी भारत के प्रधानमंत्री थे, उन्होंने संविधान समीक्षा के नाम पर तत्काल एक आयोग का गठन किया था। जस्टिस वैंकटचलेया आयोग ने अपनी रिपोर्ट भी सरकार को सांपी थी। इस बात को मददेनजर रखते हुए कि भाजपा की अगुआईवाली तत्कालीन राष्टीय जनतांत्रिक गठबन्धन की सरकार के पास चूंकि उस वक्त पूर्ण बहुमत नहीं था इसलिए संविधान की समीक्षा के प्रस्तावों को सदन में रखने का भी वह साहस जुटा नहीं सके। उन्हीं दिनों यह बात भी रेखांकित की गयी थी कि उसके पहले सम्पन्न तीन चुनावों में भाजपा ने भारतीय संविधान की समीक्षा का एजेंडा चुनावी घोषणापत्र में बाकायदा जोड़ा था।


