Monday, May 11, 2026
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सात करोड़ का सीवेज प्लांट, फिर भी बह रही गंदगी

  • कैंट क्षेत्र में 150 लोगों ने लगवाए सीवर के कनेक्शन
  • छावनी क्षेत्र में बीमारियां फैलने का बड़ा खतरा

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: छावनी क्षेत्र में सात करोड़ से अधिक की लागत से सीवेज प्लांट लगाने के बावजूद नालियों में गंदगी को बहाया जा रहा है। छावनी क्षेत्र में मात्र 150 लोगों ने सीवर के कनेक्शन लिए। नालियों में गंदगी बहाए जाने से कैंट क्षेत्र में बीमारियां फैलने का खतरा बना है। कैंट क्षेत्र में टायलेट की गंदगी को नालियों में बहाए जाने पर बीमारियों के फैलने के खतरे से निपटने के लिए छावनी परिषद ने भैंसाली मैदान में सीवेज प्लांट लगाया था। इस प्लांट पर सात करोड़ रुपये से अधिक का खर्च हुआ। प्लांट लगाए हुए करीब डेढ़ वर्ष बीत गया, लेकिन क्षेत्र के नागरिकों ने इसके कनेक्शन नहीं लिए।

सिर्फ 150 लोगों ने सीवर के कनेक्शन लिए। इसका कनेक्शन लेने के लिए करीब चार हजार रुपये का खर्च होता है, लेकिन मात्र चार हजार के खर्च से बचने के लिए लोग इसके कनेक्शन लेने से कतराते हैं और वे टायलेट की गंदगी को नालियों में बहाते हैं। कुल आबादी के करीब पांच प्रति घरों ने ही सीवर के कनेक्शन लिए। छावनी परिषद की गत दिनों हुई बोर्ड बैठक में कैंट बोर्ड के मनोनीत सभासद डा. सतीश चंद शर्मा ने यह मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा कि सात करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो गया, लेकिन गंदगी पूर्व की तरह नालियों में बहायी जा रही है। इससे क्षेत्र में बीमारियां फैलने का खतरा है। उन्होंने लोगों को कनेक्शन देने में कुछ छूट देने का प्रस्ताव रखा था।

बोर्ड के अध्यक्ष ब्रिगेडियर निखिल देशपांडे ने मुख्य अधिशासी अधिकारी को हर वार्ड में लोगों को सीवर के कनेक्शन लेने के प्रति जागरूक करने और उन्हें प्रेरित करने के आदेश दिए थे। उन्होंने कहा था कि जिस उद्देश्य के लिए उक्त प्लांट लगाया गया, वह उद्देश्य पूरा होना चाहिए, लेकिन छावनी परिषद के अधिकारियों ने अभी तक जागरूकता के लिए कोई पहल नहीं की, जिससे समस्या जस की तस बनी है। छावनी परिषद के प्रवक्ता जयपाल तोमर का कहना है कि सीवर के कनेक्शन के लिए लोगों को जागरूक करने के लिए शीघ्र पहल की जाएगी। लोगों को गंदगी से होने वाले नुकसान के बारे में बताया जाएगा और उन्हें कनेक्शन लेने के लिए प्रेरित किया जाएगा।

जलभराव का स्थायी समाधान करेगा इंटीग्रेटेड स्टार्म वाटर ड्रेनेज सिस्टम

चाहे जितनी भारी बारिश हो जाए, आने वाले समय में जलभराव की समस्या बीते कल की बात हो जाएगी। इसके लिए प्रदेश सरकार की ओर से इंटीग्रेटेड स्टार्म वाटर ड्रेनेज सिस्टम योजना पर तेजी से काम किया जा रहा है। इस योजना को लागू करने के लिए हैदराबाद में बनाए गए ड्रेनेज सिस्टम को मॉडल के तौर पर लिया गया है। जिसकी तर्ज पर नालों का लेवल, ढलान आदि इस प्रकार बनाए जाएंगे,

जिससे महानगर के नालों और सड़कों का पानी एक स्थान पर पहुंचाने का काम किया जा सकेगा। सामान्य ड्रेनेज सिस्टम से अलग प्रणाली पर आधारित इस नई जलनिकासी व्यवस्था को मेरठ समेत प्रदेश के समस्त 17 महानगरों में लागू किया जाएगा। जिसके लिए पहले चरण में हर नगर निगम के लिए 400 करोड़ से अधिक का बजट उपलब्ध कराए जाने की बात सामने आई है।

दरअसल, इस योजना की ओर प्रदेश सरकार का ध्यान लखनऊ के गोमतीनगर में जलभराव के हालात बनने के चलते गया है। इसी प्रकार प्रदेश के विभिन्न महानगरों में बरसात के दौरान जलभराव के हालात बनने की रिपोर्ट शासन स्तर तक पहुंचती है। जिसका संज्ञान लेते हुए हैदराबाद की तर्ज पर इंटीग्रेटेड स्टार्म वाटर ड्रेनेज सिस्टम योजना का खाका तैयार कराया गया है। सूत्रों की जानकारी के मुताबिक प्रमुख सचिव नगर विकास अमृत अभिजात ने इस योजना को अमलीजामा पहनाने की दिशा में तेजी से कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।

अभी योजना को क्रियान्वित करने के लिए कार्यदायी संस्था का चयन करने की प्रक्रिया पर काम किया जा रहा है। जिसके लिए जल निगम, लोक निर्माण विभाग, प्रशासन, महानगरों में कार्यरत विकास प्राधिकरण और अन्य विभागों से रिपोर्ट मांगी गई है। सूत्रों का कहना है कि प्रदेश के सभी नगर निगमों में लागू होने वाली इस योजना में बारिश के पानी की एक साथ निकासी हो सके, और किसी भी क्षेत्र में जलभराव जैसे हालात न बन सकें, इस पर फोकस किया जाएगा। इस योजना में सीवरेज लाइन के अलावा समूचे महानगर क्षेत्र में खास लेवल तक नालों का जाल बिछाने का काम किया जाएगा।

जलनिकासी के लिए काम कर चुके एक अनुभवी अधिशासी अभियंता के अनुसार इंटीग्रेटेड स्टार्म वाटर ड्रेनेज सिस्टम बारिश के पानी की सहज निकासी के लिए बनाया जाता है। जिसके अंतर्गत सीवरेज से अलावा कॉलोनियों में सड़कों के साथ-साथ अंडर ग्राउंड नालों का निर्माण किया जाता है। इसका लेवल इस तरह से तैयार किया जाता है, जिसमें तेजी से बारिश के पानी की निकासी हो सके। इस सिस्टम से कहीं पर नाले ओवरफ्लो नहीं होते। निकासी हुए पानी को इसके बाद कहीं पर निष्पादित कर दिया जाता है।

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