Friday, March 20, 2026
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आस्था: हर साल 250 कांवड़ तैयार करते हैं सोहेल

  • हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल पेश कर रहे कारीगर
  • तिरंगा कांवड़, पहिया कांवड़, डाक कांवड़ डोला कांवड़, पालकी कांवड़ की जाती है तैयार

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: श्रावण मास के शुरू होने में एक सप्ताह शेष है। जिसके बाद से कांवड़ यात्रा शुरू हो जाएगी। सड़कों पर एक से एक सुंदर कांवड़ की झाकियां देखने को मिलेंगी। इसको देखते हुए कांवड़ बनाने की तैयारियां तेज हो चुकी है और उन्हें अंतिम रूप दिया जा रहा है। खास बात ये है कि कांवड़ शहर के मुस्लिम क्षेत्रों में हिंदू मुस्लिम एकता की मिसाल देकर तैयार कराई जा रही है। दरअसल, सावन माह में कांवड़िये हरिद्वार, गगोत्री से जल उठाकर शिवालयों की तरफ कदम से कदम मिला कर चलते हैं।

कांवड़ बांस या लकड़ी से बना डंडा होता है। जिसे रंग बिरंगे पताकों, झंडे, धागे, चमकीले फूलों से सजाया जाता है और उसके दोनों सिरों पर गंगाजल से भरा कलश लटकाया जाता है। रविवार को जनवाणी टीम मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में पहुंची। जहां विशेष संप्रदाय द्वारा कांवड़ तैयार की जा रही है। कांवड़ तैयार करने वाले सोहेल ने बताया कि हर साल 100 से 250 के बीच कांवड़ तैयार की जाती है। जिसमें 25 से 30 मुस्लिम कारीगर मिलकर कांवड़ यात्रा से दो माह पहले से कांवड़ बनाने का काम शुरू कर देते हैं। ये काम उनकी तथा अन्य कारीगरों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है।

हर साल अलग-अलग प्रकार की तिरंगा कांवड़, पहिया कांवड़, डाक कांवड़, डोले कांवड़, पालकी कांवड़ आदि तैयार की जाती हैं। एक कांवड़ को तैयार होने के लिए दो से तीन दिन का समय लगता है। कांवड़ तैयार करने के लिए बांस, ऊन, चमकीला कपड़ा, सजावट का सामान इस्तेमाल होता है। उनके यहां 15,000 रुपये से लेकर 50,000 रुपये तक की कांवड़ तैयार की जाती है। दोनों कांवड़ों में कपड़े और सामान का फर्क होता है। 50,000 रुपये वाली कांवड़ में पहिए तथा महंगा चमकीला कपड़ा लगाया जाता है।

ऐसे तैयार होती है कांवड़

सोहेल बताते हैं कि कांवड़ को तैयार करने के लिए असम से बांस मंगाई जाती है। जिसके बाद बांस की कटाई की जाती है। उसका फ्रेम काले और सफेद तारों का इस्तेमाल करके बनाया जाता है। जिसके बाद उस पर चुन्नी, रेशमी फेदर, सितारे आदि लगगकर तैयार किया जाता है। बताते हैं कि कांवड़ में लगने वाले कपड़े की खास बात ये होती है कि बारिश पड़ने पर भी यह न तो सुकड़ता, फटता है और न ही ढीला पड़ता है। यह कपड़ा सूखने पर फिर से पहले की तरह हो जाता है। शाहिद ने बताया कि हर साल खुद से ही नये-नये डिजाइन तैयार करके कांवड़ तैयार की जाती है।

जिससे भोलों को एक ही डिजाइन से निराशा न हो। भोलों को खुश करने के लिये हर डिजाइन खुद से तैयार करते हैं। साथ ही आर्डर पर भोलों द्वारा भेजा गया डिजाइन भी तैयार किया जाता है। कारीगर रेहान बताते हैं कि उनके परिवार की पांचवीं पीढ़ी चल रही है, जो इस काम में लगी हुई है। वह बताते हैं कि हिंदू भाइयों के लिए कांवड़ बनाना हमारा कारोबार है। अनस बताते हैं कि यह उनका खानदानी काम है। बाकी दिनों में डेकोरेशन का काम करते हैं तथा इन दिनों में खास तौर पर कांवड़ बनाने के काम में जुट जाते हैं।

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