
हाल ही में छठवीं वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट में दिल्ली को एक बार फिर दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी बताया गया है। दिल्ली को चौथी चार बार यह दर्जा मिला है। रिपोर्ट के अनुसार, शहरों में बिहार का बेगुसराय दुनिया में सबसे अधिक प्रदूषित है। दूसरे स्थान पर गुवाहाटी है और तीसरे स्थान पर दिल्ली है। भारत को तीसरा सबसे प्रदूषित देश बताया गया है। प्रदूषित देशों की लिस्ट में पहले पायदान पर बांग्लादेश और दूसरे पर पाकिस्तान हैं।इस कारण शंका जाहिर की जा रही है कि कही ऐसा न हो भविष्य के दिनों में शुद्ध हवा के लिए शुद्ध पानी की बोतल की तरह हमें आॅक्सीजन की बोतल खरीदने की जरुरत पड़ जाए। इसीलिए अब देश में प्रदूषण की बढ़ती मार को रोकने के लिए पूरे भारत में इसके स्तरों पर नजर रखने के लिए जरूरी नेटवर्क के विस्तार की बहुत ज्यादा जरूरत महसूस की जा रही है। इसके लिये भारी निवेश के रूप में एक बड़ी बाधा सामने है। ऐसे में कम लागत वाले स्वदेशी संवेदी उपकरण (सेंसर) एक नयी उम्मीद जगाना आवश्यक हैं।
महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीसीबी) द्वारा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर (आईआईटी-के) तथा ब्लूमबर्ग फिलांट्रोफीज के सहयोग से पिछले दिनों किए गए पायलट अध्ययन के नतीजे यह बताते हैं कि स्थानीय स्तर के स्टार्टअप्स द्वारा तैयार किए गए कम लागत वाले संवेदी उपकरणों (सेंसर्स) ने नियामक श्रेणी (रेगुलेटरी ग्रेड) वाले निगरानी उपकरणों के मुकाबले 85-90 प्रतिशत दक्षता से काम किया। यह निष्कर्ष बेहद उत्साहजनक होने के साथ-साथ भविष्य में प्रदूषण निगरानी केन्द्रों के व्यापक नेटवर्क की परिकल्पना को नया आधार भी देते हैं। इस अध्ययन के लिए चार विभिन्न स्टार्टअप्स ने 40 किफायती सेंसर तैयार किए। अध्ययन के नतीजों से पता चलता है कि तीन स्टार्टअप्स द्वारा विकसित सेंसर्स में गैर अंशांकित (अनकैलिब्रेटेड) मूल्यों (कंटीनुअस एम्बियेंट एयर क्वालिटी मॉनीटरिंग स्टेशंस ‘सीएएक्यूएमएस’ द्वारा मापे गये वास्तविक पैमानों के लिहाज से) में विचलन (एरर) 25 प्रतिशत से कम था। कैलिब्रेशन के बाद तीन प्रकार के सेंसर्स में यह एरर घटकर 15 प्रतिशत से कम रह गया, जबकि चौथी किस्म के सेंसर में यह एरर 20 फीसद रहा।
यह अध्ययन नवम्बर 2020 से मई 2021 के बीच किया गया। इसके लिए वर्तमान में स्थापित एमपीसीबी के 15 सीएएक्यूएमएस के साथ कम कीमत के 40 मॉनीटरिंग सेंसर्स लगाए गए थे। इनमें से मुम्बई में 10 तथा नवी मुम्बई, ठाणे, कल्यान, वसई-विरार, सियोन, बोरिवली, एयरपोर्ट, पवई तथा डोम्बिवली में एक-एक सेंसर लगाया गया। रेस्पिरर लिविंग साइंसेज, एयरवेदा टेक्नॉलॉजीज, पर्सनल एयर क्वालिटी सिस्टम्स (पीएक्यूएस) और ओइजोम इंस्ट्रूमेंट्स नामक स्टार्टअप्स द्वारा विकसित सेंसर्स को एमपीसीबी के रेगुलेटरी ग्रेड वाले वायु गुणवत्ता बीएएम (बेटा अटेनुएशन मॉनीटरिंग) के साथ लगाया गया। कम कीमत वाले इन स्वदेशी वायु गुणवत्ता निगरानी सेंसर पीएम2.5 (2.5 माइक्रॉन से कम आकार वाले पार्टिकुलेट मैटर) और पीएम10 (10 माइक्रॉन से कम आकार वाले पार्टिकुलेट मैटर) का एक मिनट का डेटा उत्पन्न कर सकते हैं। सौर ऊर्जा से चलने वाले ये सेंसर डेटा ट्रांसमिशन के लिये रियल टाइम कम्युनिकेशन की विशेषता से लैस हैं।
इस अध्ययन के निष्कर्षों को एक वेबिनार में पेश किया गया था। इस वेबिनार में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, नगर विकास मंत्रालय, केन्द्रीय एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड्स के प्रतिनिधियों, तकनीकी विशेषज्ञों, मीडिया तथा सिविल सोसाइटी के सदस्यों ने भी हिस्सा लिया। इस वेबिनार के आयोजन का मकसद नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (एनसीएपी) के तहत देश में वायु गुणवत्ता निगरानी केन्द्रों का विस्तार करने की योजना पर अमल के उपायों पर विचार-विमर्श करना है। आईआईटी-के में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख और नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के नेशनल नॉलेज नेटवर्क के राष्ट्रीय समन्वयक डॉक्टर एसएन त्रिपाठी ने कहा, वायु गुणवत्ता निगरानी का भविष्य उच्च अस्थायी आवृत्ति पर बेहद स्थानीय स्तर का डेटा प्रदान करने के लिए रेगुलेटरी ग्रेड मॉनिटर और सेंसर के संयोजन के एक संकर (हाइब्रिड) दृष्टिकोण में निहित है। मुंबई सेंसर प्रयोग के नतीजों से साफ जाहिर है कि देश में वायु गुणवत्ता निगरानी के लिए बड़े पैमाने पर तैनात करने के लिए स्वदेशी सेंसर तकनीक तैयार है। इस अध्ययन के नतीजों ने देश में कम कीमत पर वायु गुणवत्ता निगरानी नेटवर्क को और विस्तार देने की संभावनाओं के दरवाजे खोल दिए हैं। जहां नियामक श्रेणी वाले मानीटर की लागत 20 लाख रुपये है, वहीं स्टार्टअप्स द्वारा तैयार किए गए छोटे सेंसर की कीमत करीब 60 हजार रुपये होती है। एक अनुमान के मुताबिक भारत के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानिक, अस्थायी और सांख्यिकीय रूप से ढट2.5 प्रदूषण पर नजर रखने के लिए 4,000 अनवरत निगरानी केन्द्रों की जरूरत है। देश में इस वक्त 286 निरंतर नियामक ग्रेड मॉनिटर और 818 मैनुअल मॉनिटरिंग स्टेशन स्थित हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के 90 प्रतिशत लोग जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। भारत में एनसीएपी कार्यक्रम के तहत मॉनिटर की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। छोटे सेंसरों में रेगुलेटेड केंद्रों के अनुपूरक के तौर पर काम करने की पूरी क्षमता है। इसके बावजूद भी यदि प्रदूषण पर नियंत्रण न हो पाता है तो एक दिन हमें बोतल बंद आॅक्सीजन खरीदने के लिए तैयार रहना होगा।


